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15 सितम्बर, 2020|10:46|IST

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महामारी थामने में पिछड़ते हम 

भारत में कोरोना ने जैसी रफ्तार पकड़ ली है, वह चिंतनीय है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक संक्रमित मरीजों की संख्या 50 लाख के करीब पहुंच गई थी, और आज जब आप इस आलेख को पढ़ रहे हैं, तब मुमकिन है कि हम इस आंकडे़ को पार कर चुके हों। विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी कहना है, ‘दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में भारत, इंडोनेशिया और बांग्लादेश में संक्रमण के लगातार सर्वाधिक मामले सामने आ रहे हैं। पिछले सात दिनों में इस वायरस से जितने लोगों की जान गई है, उनमें से 22 फीसदी इसी क्षेत्र के हैं। हालांकि, यहां की सघन आबादी के लिहाज से मौत अब भी कम (प्रति दस लाख आबादी पर 46) है’। उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र के इंडोनेशिया और बांग्लादेश जैसे देश अपने यहां ‘सामुदायिक संक्रमण’ को लंबे समय से स्वीकार कर रहे हैं, जबकि  म्यांमार (2,796 मामले), मालदीव (9,052 मामले), श्रीलंका (3,204 मामले) और थाइलैंड (3,403 मामले) जैसे देशों के समान भारत भी ‘क्लस्टर ऑफ केसेज’ यानी कुछ खास-खास जगहों पर संक्रमण की बात कह रहा है।
लॉकडाउन की जब घोषणा की गई थी, तब प्रधानमंत्री ने कहा था, ‘महाभारत का युद्ध 18 दिनों में जीता गया था, लेकिन कोरोना वायरस के खिलाफ पूरे देश की यह लड़ाई 21 दिनों तक चलने वाली है।’ सवाल कई हैं, इस युद्ध में हम कितना सफल हो पाए हैं? क्या हमने संक्रमण के शीर्ष-बिंदु को छू लिया है? और संक्रमित मामलों में आखिर कब से कमी आने लगेगी, या संक्रमण की वक्र-रेखा में कब से ढलान दिखेगी? 
वक्र-रेखा मूलत: तीन तरह की होती हैं, जो समय के साथ किसी महामारी की बढ़ती स्थिति को बताती हैं। ‘प्वॉइंट सोर्स आउटब्रेक’ में महामारी का स्रोत एक होता है, जैसे दूषित खाना। इसमें संक्रमण कुछ समय तक ही रहता है। नतीजतन, इसकी वक्र-रेखा में तेजी से वृद्धि होती है, वह शीर्ष पर पहुंचती है और फिर उसमें गिरावट आने लगती है। ‘कंटिन्यूअस कॉमन सोर्स’ महामारी में संक्रमण तेजी से शीर्ष पर पहुंचता है और फिर नीचे की ओर गिरता है, मगर इसमें संक्रमण सिर्फ एक चरण में सिमटकर नहीं रह जाता, बल्कि संक्रमण का स्रोत निरंतर बना रहता है। हां, इसमें बीमारी के कारणों का अंत कर दिया जाए, तो संक्रमित मरीजों की संख्या तेजी से कम होने लगती है। ऐसा आमतौर पर इबोला में दिखता है। मगर ‘प्रोग्रेसिव सोर्स’ महामारी में संक्रमण की शुरुआत एकाध मामलों से होती है, जिसका तेजी से अन्य लोगों में विस्तार होता है। इसमें संक्रमण के कई चरण आते हैं। इस वजह से अधिक से अधिक लोग इसमें संक्रमित होते हैं। यह तब तक बना रहता है, जब तक कि अतिसंवेदनशील लोगों की मौत नहीं हो जाती या फिर बचाव के उपायों को प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया जाता। भारत में कोरोना की ठीक ऐसी ही दशा है। इसमें संक्रमण के बढ़ने-घटने का दौर आता-जाता रह सकता है।
इसी कारण से पूछा जा रहा है कि दुनिया में सबसे सख्त लॉकडाउन लगाने के बावजूद आखिर हम संक्रमण को थामने में सफल क्यों नहीं हो सके? दरअसल, लॉकडाउन का मकसद महामारी के शुरुआती चरणों में मौत को रोकना और स्वास्थ्य ढांचे को महामारी के मुकाबले में तैयार करना था। यह तब लागू किया गया, जब संक्रमित मरीजों की संख्या काफी कम थी और मौत न के बराबर। उस वक्त देश भर में 606 मामले सामने आए थे, जिनमें से 553 एक्टिव केस थे और जान गंवाने वाले मरीजों की संख्या 10 थी। मगर लॉकडाउन में ज्यादा जोर कानून-व्यवस्था पर रहा और जोखिम कम करने व तैयारी पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। आलम यह है कि हम आज भी कोविड-19 से बचने के लिए निगरानी और बचाव के उपायों को पूरी तरह से नहीं अपना रहे हैं, जो खासतौर से इसलिए जरूरी है, क्योंकि अभी तक हमने इसके खिलाफ कोई दवा या वैक्सीन तैयार नहीं की है। बेशक हुकूमतों की इसलिए आलोचना की जाती हो कि वे ‘देर से नाकाफी’ कदम उठाती हैं, लेकिन भारत में लॉकडाउन संभवत: ‘बहुत जल्दी और अत्यधिक सख्ती’ से उठाया गया कदम माना जाएगा।
सवाल यह भी है कि क्या हमारी स्वास्थ्य-सेवाएं प्रतिदिन एक लाख नए संक्रमित मरीजों को संभाल पाने के लिए तैयार हैं? सच्चाई महज इसी से पता चलती है कि ऑक्सीजन-आपूर्ति में आ रही कमी अब सुर्खियां बनने लगी हैं। बेशक पिछले छह महीने में ऑक्सीजन-उत्पादन में लगभग चौगुना वृद्धि हुई है और 750 टन प्रतिदिन से बढ़कर 2,700 टन रोजाना इसकी आपूर्ति हो रही है। फिर भी, मध्य प्रदेश, गुजरात और मुंबई की जमीनी हकीकत बताती है कि कुछ अस्पतालों में मरीजों की ऑक्सीजन-आपूर्ति कम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है, ताकि ऑक्सीजन बचाकर रखी जा सके।
विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि कोरोना के 14 फीसदी संक्रमित मामले गंभीर होते हैं और उन्हें अस्पताल की जरूरत पड़ती है, जबकि पांच फीसदी मरीज बहुत गंभीर होते हैं और उन्हें आईसीयू में रखना पड़ सकता है। मौत चार फीसदी मरीजों की होती है। फिलहाल भारत में मृत्यु-दर दो फीसदी के नीचे है, जो तुलनात्मक रूप से बेहतर माना जाएगा। मगर राज्यवार बात करें, तो पंजाब और महाराष्ट्र में यह चार फीसदी के करीब है। जिलेवार आंकडे़ तो और चिंताजनक हैं। मसलन, मुंबई और अहमदाबाद जैसे घनी आबादी वाले जिलों में मृत्यु-दर क्रमश: 5.71 प्रतिशत और 5.63 प्रतिशत है, जबकि लुधियाना जैसे औद्योगिक जिले में 4.74 फीसदी। इसी तरह, नांदेड़ और सांगली में मृत्यु-दर क्रमश: 5.3 प्रतिशत और 4.74 प्रतिशत है। जाहिर है, भारत में मृत्यु-दर को विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक से परे जाकर देखने की जरूरत है। और चूंकि यहां संक्रमण ग्रामीण इलाकों में फैलने लगा है, इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता भार साफ-साफ महसूस किया जा सकता है।
साफ है, कोविड-नियंत्रण से जुडे़ उपायों को अब इस तरह से अमल में लाना चाहिए कि उनमें जिलों और  स्थानीय स्वास्थ्य संस्थाओं की अधिक से अधिक भागीदारी हो सके और केंद्र व राज्य सरकारें तकनीकी और चिकित्सकीय संसाधनों की आपूर्ति में मदद करें। तमाम मुश्किलों को दूर करने और सामुदायिक हितों का ख्याल रखने की जरूरत है। इस समय लोगों को यह भरोसा देना ही होगा कि उनकी सुरक्षा के लिए हर मुमकिन सद्प्रयास किए जा रहे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 16 september 2020