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15 अक्तूबर, 2020|11:39|IST

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भरपूर अनाज के बावजूद भूख

देविंदर शर्मा, कृषि विशेषज्ञ

आज विश्व खाद्य दिवस है और इस साल संयुक्त राष्ट्र का संदेश है- बढ़ें, पोषण करें और साथ रहें। कोरोना वायरस के माहौल में दुनिया को समझ में आया है कि भोजन कितनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है और इसीलिए संयुक्त राष्ट्र ने ‘बढ़ें, पोषण करें और साथ रहें’ पर ध्यान केंद्रित किया है। अब हमें दुनिया में एक ऐसा तंत्र बनाना होगा, जो न केवल कृषि को संकट से निकाले, बल्कि खाद्य तंत्र को उस दिशा में ले चले, जहां सबके लिए पोषण-भोजन का प्रबंध हो सके। 
कोरोना के समय पूरी दुनिया को कृषि क्षेत्र एक आधार के रूप में नजर आया है। भारत में देखा गया है, जब इकोनॉमिक ग्रोथ माइनस 23.9 प्रतिशत था, तब कृषि ही सकारात्मक विकास दर को बरकरार रख सकी। कृषि में आपदा के समय भी 3.4 प्रतिशत की विकास दर देखी गई। इस क्षेत्र का महत्व लोगों को पता चल गया। कृषि की इस देश में सिलसिलेवार अनदेखी हुई है, जबकि यह क्षेत्र इस देश की रीढ़ है। दशकों से देश की नीति रही है कि उद्योग जगत के लिए कृषि से समझौता किया जाए। सोच की यह नाकामी आपदा के समय सामने आई है। अब जरूरी है कि हम खेती-किसानी को इतना संपन्न बनाएं कि किसानों की आय बढे़। फूड ऐंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन के डायरेक्टर जनरल क्यू डोंग्यू ने कहा है, ‘आज तक हम सोचते थे कि अमीर आदमी के पास पैसा आएगा और वह उसे नीचे पहुंचाएगा, लेकिन यह सोच नाकाम हो चुकी है। अब समय बदल गया है, हमें अपनी सोच को बदलना होगा’। 
आज बेशक, दुनिया का ध्यान कृषि क्षेत्र की ओर जाना चाहिए। इसके दो-तीन कारण हैं। भारत में अगर देखें, तो कृषि सर्वाधिक रोजगार देने वाला क्षेत्र है। 50 प्रतिशत जनसंख्या कृषि से जुड़ी है। 70 प्रतिशत ग्रामीण घर खेती से जुड़े हैं। अब समय आ गया है, हम कृषि को सबके हित में पटरी पर लाएं। कृषि क्षेत्र में इतनी क्षमता है कि उसे हम ‘पावर हाउस ऑफ ग्रोथ’ बना सकते हैं। कोरोना वायरस के समय यह संदेश साफ उभरकर सामने आया है। 
कई दशकों से हमारे देश में जो सोच रही है और जिसे विश्व बैंक और आईएमएफ ने आगे बढ़ाया है कि खेती से लोगों को निकालकर शहर में लाना है। जब लॉकडाउन हुआ, तो लाखों लोग घर वापस गए, सबको पता चला, इतनी बड़ी संख्या में लोगों को शहर लाना गलत नीति थी। अब वापस कोशिश हो रही है कि लोगों को गांव में ही रोका जाए, लेकिन यह काम झटके में संभव नहीं है। गांवों को धीरे-धीरे इस योग्य बनाना होगा कि वे अपने लोगों को संभालकर रख पाएं। इसके लिए गांवों में कृषि को मजबूत करना सबसे जरूरी है। किसी एक गांव या एक राज्य के करने से यह नहीं होगा। हमें मिल-जुलकर एक ऐसा तंत्र बनाना होगा कि हम मिलकर आगे बढ़ें और सबका पोषण करने में कामयाब हों।  
ओईसीडी अर्थात ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन ऐंड डेवलपमेंट की एक स्टडी बताती है, वर्ष 2000 और 2016 के बीच में किसानों को 45 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इससे पता चलता है, किसानों से जुड़ी अर्थव्यवस्था पर हमने जान-बूझकर प्रहार किया है। हर साल किसानों को 2.64 लाख करोड़ रुपये का नुकसान सहना पड़ता है। भारत में किसानों का रोष इसलिए भी बार-बार उभर आता है, क्योंकि किसानों की कमाई या उनका हित सुनिश्चित नहीं है। 
किसानों की आय बढ़ाना जरूरी है। दशकों से किसानों की आय कम रही है और किसानों की आय को लगातार कम रखने की कोशिश होती रही है। किसान लगातार मांगते रहे हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को अनिवार्य कर दिया जाए या इस संबंध में एक नया अधिनियम लेकर आया जाए, जिसके तहत कोई भी खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे नहीं हो, यह केवल धान और गेहूं के लिए नहीं हो। यह सभी फसलों पर लागू हो। इससे किसानों की आय बढ़ सकती है। दूसरा रास्ता है, कृषि में सार्वजनिक निवेश दशकों से घट रहा है, इसे बढ़ाने की जरूरत है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट बताती है, साल 2012-2018 के बीच कृषि में सार्वजनिक निवेश 0.3 से 0.4 के बीच में रहा है और इतनी धीमी गति से निवेश होगा, तो कृषि से चमत्कार की उम्मीद गलतफहमी ही होगी। इसे समझने के लिए यह जानना भी जरूरी है कि कॉरपोरेट को हर साल जीडीपी का छह प्रतिशत कर रियायत के रूप में दिया जाता है, यही पैसा अगर कृषि में निवेश किया जाता, तो आज हम देखते कि कृषि का रूप ही दूसरा होता। 
आज दो चीजें करनी जरूरी हैं। एक तो किसानों की आय बढ़ाने की जरूरत। दूसरी, कृषि-निवेश बढ़ाने की जरूरत। अगर ये दोनों कार्य किए जाएं, तो मुझे लगता है, ‘सबका साथ-सबका विकास’ के दरवाजे खुल जाएंगे। आत्मनिर्भर होने का रास्ता भी कृषि से होकर जाता है। 60 प्रतिशत लोगों के हाथों में पैसा होगा, तो उससे मांग बढ़ेगी, अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ेगी। भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था को कृषि आधारित बनाने की जरूरत है, ताकि अन्न या भोजन का अभाव दुनिया के किसी कोने में न रहे। यह माना जा रहा है कि कोरोना वायरस के समय में भूखे लोगों की अतिरिक्त तादाद करीब 15 करोड़ हो जाएगी। भूख के उपचार के बारे में पूरी दुनिया सोच रही है, अब केवल ऊपरी मदद से काम नहीं चलने वाला, जरूरतमंदों को निचले या बुनियादी स्तर पर ही मजबूत करना होगा। आज हाशिये पर खड़े लोगों का हाथ थामना जरूरी है। दुनिया में कोई कमी नहीं है। अगर आज दुनिया में 7.5 अरब लोग रहते हैं, तो करीब 14 अरब लोगों के लिए भोजन उपलब्ध है। यह अलग बात है कि 30 से 40 प्रतिशत के बीच भोजन हर साल बरबाद हो जाता है। अगर कहीं कमी है, तो राजनीतिक सोच या दृष्टिकोण की कमी है। 
भूख के मद्देनजर हमारे देश को ज्यादा सजग होना है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2020 बताता है कि दक्षिण एशिया के जितने भी देश हैं, वे भारत से अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। भारत 119 देशों के बीच 102वें स्थान पर है। इससे पता चलता है, भारत को अभी बहुत कुछ करना है। विडंबना है, भारत में जो अन्न भंडार हैं, धान और गेहूं, हमारी जरूरत से कहीं ज्यादा हैं। इतना अन्न होने के बावजूद हमारी रैंकिंग अगर 102 आती है, तो यह चिंता का विषय है। कहीं न कहीं भोजन का प्रबंधन खराब हो रहा है। यहां खाना भी अतिरिक्त है और दुनिया के सबसे ज्यादा भूखे भी यहीं हैं, तो हमें सोचना ही पड़ेगा। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 16 october 2020