DA Image
हिंदी न्यूज़   ›   ओपिनियन  ›  अब बेहतर बौद्धिक समझ बने
ओपिनियन

अब बेहतर बौद्धिक समझ बने

सिद्धार्थ मल्लवरापु, प्रोफेसर, शिव नाडर विश्वविद्यालयPublished By: Naman Dixit
Tue, 15 Jun 2021 11:14 PM
अब बेहतर बौद्धिक समझ बने

विश्वविद्यालय अमूमन ऐसे क्षेत्र माने जाते हैं, जो कम से कम राजनीतिक और सामाजिक बुराइयों की रोजमर्रा की कालिख से दूर हैं, जबकि वे अक्सर इन बुराइयों के चरित्र और प्रकृति का गंभीर अध्ययन करते हैं। यह दूरी उन्हें एक खास सुविधा भी देती है। वे गुबार के शांत होने और यह बताने के लिए कुछ इंतजार कर सकते हैं कि इतिहास के एक खास वक्त में उस दौर का क्या मतलब था? घरेलू और वैश्विक स्तर पर अभी जो हालात हैं, ये दरअसल वही निर्णायक क्षण हैं।
यकीनन, इस त्रासद अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपदा पर काफी कुछ लिखा जाएगा। उनमें से कुछ निर्विवाद रूप से इस वैश्विक महामारी के इतिहास के रूप में प्रतिष्ठित भी होंगे। मगर बतौर शैक्षणिक संस्थान हमारी भूमिका और उद्देश्य क्या होने चाहिए, इसके बारे में विमर्श की दरकार है। मैं यहां कुछ प्रस्तावों की चर्चा कर रहा हूं, जो चीजों को व्यापक नजरिये से देखने की बेहतर बौद्धिक समझ विकसित करने को प्रेरित करते हैं। पहला, हमें यह समझना होगा कि किस प्रकार का ज्ञान मूल्यवान है? बेशक यह बहुत हल्का सवाल माना जाएगा, लेकिन बतौर विचारशील समाज हमें पीछे नहीं हटना चाहिए। अभी तो हमारी पहली प्राथमिकता देश-दुनिया को हलकान करने वाले कोरोना वायरस का एक विश्वसनीय इलाज ढूंढ़ना है। इसमें वैज्ञानिक ज्ञान हमारी खासा मदद कर सकता है। सार्वजनिक विचार-विमर्श में इसकी शुचिता फिर से कायम की जानी चाहिए। भले ही, व्यावहारिक ज्ञान की अपनी एक खास प्रतिष्ठा होती है, लेकिन हमें मौलिक अनुसंधानों में निवेश का महत्व कतई नहीं भूलना चाहिए। रोम एक दिन में नहीं बना था। वैज्ञानिक उद्यम की इमारत तैयार होनी चाहिए और बेरोकटोक शोध एवं अनुसंधान को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी संसाधनों का निर्माण व पोषण किया जाना चाहिए। हमें यह भी याद रखना होगा कि महामारी का सार्वजनिक स्वास्थ्य पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ता है। गंभीर सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक असर के साथ इस प्रभाव का विस्तार हमारी राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर और बाहर होता है। इन पहलुओं को प्रभावी ढंग से समझने के लिए हमें ज्ञान के विविध रूपों को समझने की जरूरत है। मानविकी और सामाजिक विज्ञान का व्यापक प्रसार यहां विशेष रूप से प्रासंगिक है। खास परिवेश और स्थानीय भाषाओं में लिखी गई मानवीय कहानियों (जो हमें अच्छे साहित्य से मिल जाती हैं) का कोई विकल्प नहीं है। सेवादारों और सेवा लेने वालों के बीच प्रकट होने वाली जटिलता को चिकित्सा मानवविज्ञानी मानवविज्ञान के रूप में जाहिर करते हैं। अर्थशास्त्री इंसान द्वारा अदा की जाने वाली उस कीमत को तौलते हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य में पूर्व में पर्याप्त निवेश न किए जाने के कारण इंसान को चुकानी पड़ती है। शासन की विफलताएं कई राजनीतिक गड़बड़ियों की जड़ हैं। यदि हम यह याद रखते हैं कि महामारी एकबारगी नहीं आती, तो हमारे इतिहासकारों को दीर्घकालिक परिपे्रक्ष्य में अपनी बात रखने को कहा जा सकता है। लोगों का मानसिक स्वास्थ्य मनोवैज्ञानिकों के लिए तत्काल चिंता का विषय है। लिहाजा, इन क्षेत्रों में ऊंचे दर्जे की समझ विकसित करने के मूल्य को पहचानना आवश्यक है। जो समाज इन समझदार विकल्पों को तैयार करता है, उसके अल्पावधि व दीर्घावधि, दोनों में बेहतर होने की संभावना है। मैं यह कतई नहीं मान सकता कि भारत इस मामले में कोई अपवाद है।दूसरा, नागरिक भावना और नागरिकता के उन मॉडलों पर ध्यान देने की जरूरत है, जिनको हम बढ़ावा देना चाहते हैं। भारत की बात करें, तो यहां जब बुनियादी मानदंडों और स्वास्थ्य प्रोटोकॉल को लागू करने की वकालत की जाती है, तब आमतौर पर नागरिक भावना या अनुशासन की कमी का विलाप होने लगता है। बेशक विश्वविद्यालय में आने से पहले के तमाम आयाम (परिवार, स्कूल और कॉलेज) अपनी जिम्मेदारी का ठीक-ठाक निर्वहन करते हैं, मगर विश्वविद्यालय मानवोचित नागरिकता विकसित करने के लिए एक अलग मंच मुहैया करा सकते हैं। सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता इस कार्य के अभिन्न अंग हैं। यहां यह कतई न समझा जाए कि मैं विश्वविद्यालयों के राजनीतिकरण की दलील दे रहा हूं। बल्कि यह नागरिकों में सहानुभूति का निर्माण करने और उनको सीखने व विस्तारित समुदायों में कमजोर लोगों को शामिल करने के लिए समग्रता व संवेदनशीलता के साथ काम करने की दलील है। तीसरा, अकादमिक स्पष्टता अपरिहार्य है। हमारा अनुभव भी कहता है कि यह जीवन और मृत्यु का मामला भी हो सकता है। मौजूदा संदर्भ में ही देखें, तो जब वायरस की उत्पत्ति के संबंध में एक स्पष्ट राय बनाने, या सार्वजनिक मंचों पर उपलब्ध आंकड़ों का यर्थाथवादी मूल्यांकन करने, या वायरस के तमाम म्यूटेशन (चरित्र बदलने) पर चर्चा करने की बात आती है, तब हमें अवश्य सच और झूठ की पहचान करना सीख लेना चाहिए। इसका मतलब यह भी है कि सिर्फ सच को जान लेना काफी नहीं है, बल्कि उसकी विश्वसनीयता को जांचने के आवश्यक रास्तों से भी हमें अवगत होना चाहिए। एक सतर्क नागरिक को इन सबके प्रति सचेत रहना चाहिए। और आखिरी बात, व्यापक लोगों के लिए प्रभावी संवाद करने में विश्वविद्यालयों को गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ता है। इसके लिए प्रासंगिक क्षेत्रों में प्रतिस्पद्र्धात्मक विकास को साझा करने की दरकार है। नए-नए शोध से महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि मिल सकती है। हालांकि, इसे सबके लिए समान रूप से प्रभावकारी और सुगम बनाया जाना चाहिए। जाहिर है, इसके लिए आधिकारिक तौर पर संवाद करने की आवश्यकता है, जिसमें निष्पक्षता अनिवार्य है। हालांकि, संचार एकतरफा रास्ता नहीं है। हमें दूसरे सिरे पर ऐसे लोगों की जरूरत होगी, जो अपने पास मौजूद ज्ञान का लाभ उठा सकें। कई अन्य महत्वपूर्ण कारक भी यहां काम करते हैं, जैसे, राजनीतिक नेतृत्व की प्रकृति, संस्थाओं का चरित्र, राष्ट्र की क्षमता आदि। इनमें से प्रत्येक पर भी तत्काल ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

संबंधित खबरें