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13 अगस्त, 2020|8:18|IST

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चाबहार में चीन का नया दांव

दो दशक से भी अधिक समय से भारत की नजर ईरान की चाबहार बंदरगाह पर रही है। इसके जरिए यही मंशा रही कि चाबहार से ईरान की सरजमीं से होते अफगानिस्तान तक कनेक्टिविटी बनाई जाए। ऐसा करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि पाकिस्तान कभी भी भारत के लिए अफगानिस्तान का रास्ता अपने पंजाब सूबे के जरिए नहीं खोलेगा। ईरान की भी यही ख्वाहिश रही है कि चाबहार बंदरगाह को विकसित किया जाए और सड़क व रेल संपर्कों के जरिए अफगानिस्तान तक एक और पहुंच  बनाई जाए। इसी वजह से भारत व ईरान में समझौते हुए और दोनों देशों ने यह तय किया कि भारत चाबहार बंदरगाह के विकास में योगदान देने के साथ-साथ ईरान के साथ मिलकर चाबहार से जाहेदान तक रेलवे लाइन बिछाने का काम करेगा।
मगर कुछ दिनों पहले ईरान ने यह इल्जाम लगाते हुए कि इस रेल परियोजना में भारत ने कोई तत्परता नहीं दिखाई और वादे के मुताबिक राशि खर्च नहीं की, उसने खुद इसे बनाना शुरू कर दिया। जाहिर है, ईरान के इस कदम से भारत के हितों को झटका लगा है। मगर इसके साथ-साथ यह खबर भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि चीन और ईरान के बीच समझौता हो रहा है, जिसके तहत दोनों देश आर्थिक व सैन्य सहयोग बढ़ाएंगे और ईरान के विकास के लिए चीन अगले बीस वर्षों तक उसकी विभिन्न परियोजनाओं पर खूब खर्च करेगा। यदि ऐसा होता है, तो इससे पश्चिम एशिया का सामरिक और आर्थिक रंग-रूप बदल सकता है। यह खबर इसलिए भी सही जान पड़ती है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेहरान पर अपना शिकंजा और कस दिया है, जिससे उसकी माली हालत पूरी तरह चरमरा गई है। ऐसे में, अब यह आशंका है कि ईरान चाहबार-जाहेदान रेलवे लाइन पर चीन से आर्थिक मदद मांगेगा।
इन खबरों की पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है। दरअसल, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने यह फैसला किया था कि परमाणु हथियार बनाने की ईरान की महत्वाकांक्षा को रोकने के लिए उसके साथ समझौता करना जरूरी है। नतीजतन, साल 2015 में दोनों देशों के बीच समझौता हुआ, जिसकी शर्तों के मुताबिक ईरान ने यूरेनियम संवद्र्धन करने की अपनी मंशा 10 वर्षों के लिए त्याग भी दी। इसके बदले में अमेरिका ने ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को धीरे-धीरे हटा लेने का भरोसा दिया। साथ ही, यह भी तय किया गया कि अमेरिकी बैंकों में जमा ईरान की धनराशि उसे वापस दे दी जाएगी। हालांकि, सुन्नी बहुल अरब देश और इजरायल इस समझौते के खिलाफ थे। 
फिर भी, बराक ओबामा ने ईरान को राहत दी थी, जिसके कारण उसकी आर्थिक स्थिति कुछ सुधरी और उसने पश्चिम एशिया में अपना दबदबा बढ़ाना शुरू किया। एक दृष्टि से ईरान ने इस क्षेत्र के शिया बहुल इस्लामिक देशों को अपने साथ मिलाया, जिससे सुन्नी और शिया की पारंपरिक दरार बढ़ती नजर आई। राष्ट्रपति ट्रंप जब सत्ता में आए, तो उन्होंने ओबामा की नीति को खारिज करते हुए इस परमाणु समझौते से अमेरिका को बाहर निकाल लिया और ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध तेज कर दिए। इसकी वजह से ईरान अपना तेल तक नहीं बेच पा रहा है। इसके अलावा, ट्रंप सुन्नी अरब देशों के साथ भी खडे़ हैं, जो कि अमेरिका की पारंपरिक नीति रही है। अमेरिका का एक उद्देश्य ईरान में विलायत-ए-फकी शासन प्रणाली को तोड़ना और सत्ता परिवर्तन भी है। ऐसी सूरत में, ईरान ने अपनी पारंपरिक विदेश नीति से, जिसमें वह हमेशा संतुलन बनाने की कोशिश करता रहा है, किनारा कर लिया। इससे चीन को एक मौका मिला है और अब वह इसका पूरा लाभ उठाता दिख रहा है।
चीन ने राष्ट्रपति शी जिनपिंग के शासनकाल में आक्रामक रुख अपनाया है। उसकी कोशिश रही है कि वह हर क्षेत्र में अमेरिका को बराबर की टक्कर दे। कोविड-19 के संक्रमण काल में जहां वाशिंगटन ने उस पर दबाव बनाने की कोशिश तेज की, तो चीन ने भी अपनी विस्तारवाद की नीति को हवा दी है। हांगकांग, ताइवान, दक्षिण चीन सागर सहित भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा तक पर इसे अनुभव किया जा सकता है। ईरान में जिस मंशा के तहत बीजिंग अपने कदम आगे बढ़ा रहा है, वह असल में अमेरिका को दिया जाने वाला साफ संकेत है कि उसे ट्रंप की नीतियों की कोई परवाह नहीं है; अमेरिका बेशक ईरान पर तमाम प्रतिबंध लगाए, पर बीजिंग उसके साथ हर क्षेत्र में अपने संबंध आगे बढ़ाएगा। जाहिर है, इसका असर पश्चिम एशिया पर तो पड़ेगा ही, दक्षिण एशिया में भी पड़ सकता है, जहां भारत के हित प्रभावित हो सकते हैं।
भारत और ईरान के ऐतिहासिक रिश्ते रहे हैं। नई दिल्ली ने हमेशा यह कोशिश की है कि उससे आर्थिक, वाणिज्यिक, सामरिक संबंध इस कदर आगे बढ़ाए जाएं कि दोनों देशों के हितों को लाभ हो। मगर अमेरिका और ईरान के रिश्तों में आई खटास का असर नई दिल्ली-तेहरान पर ही नहीं, अन्य देशों के साथ ईरान के संबंधों पर भी पड़ा है। अमेरिका द्वारा ईरान के साथ तेल व्यापार को प्रतिबंधित कर देने का असर भी नई दिल्ली-तेहरान के रिश्ते पर दिखा है। यहां गौर करने की बात यह है कि अमेरिका ने चाबहार परियोजना को अपने प्रतिबंधों से अलग रखा था। ऐसे में, अच्छा यही होता कि चाबहार-जाहेदान रेल परियोजना में आपसी सहयोग बना रहता। अगर इस मसले पर अमेरिका से बातचीत आवश्यक थी, तो की जानी चाहिए थी।
बहरहाल, अमेरिका और चीन के बीच जो राजनयिक और सामरिक खेल चल रहा है, उसमें ईरान भी एक मोहरा बनता दिख रहा है। मुश्किल यह है कि हमारे पश्चिम के पड़ोसी देशों में चीन का बढ़ता दबदबा हमारी मुश्किलें बढ़ा सकता है। पाकिस्तान में चीन का दखल जगजाहिर है और अब तेहरान भी बीजिंग के पाले में जाता दिख रहा है। अफगानिस्तान और मध्य एशिया में भी उसके हस्तक्षेप छिपे नहीं हैं। ऐसे में, भारत को अपने सामरिक हितों की रक्षा के लिए गंभीरता से विचार करना पडे़गा और राजनीतिक व कूटनीतिक वर्ग को दृढ़ इच्छाशक्ति दिखानी पडे़गी। चीन के रवैये को लेकर भारत और विश्व शक्तियों के बीच संपर्क बढ़ाना होगा, जिसमें यूरोपीय संघ की बुधवार को हुई बैठक काफी अहम है। साफ है, अगर अभी संजीदगी नहीं दिखाई गई, तो आने वाले वर्षों में भारत को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 16 july 2020