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12 जनवरी, 2021|12:27|IST

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जिंदगी और जीविका के लिए जंग

इधर कुआं, उधर खाई। जान बचाएं या रोजी-रोटी? यह सवाल मध्य वर्ग के सामने अभी नहीं खड़ा है, इसीलिए वह दिल्ली के आनंद विहार या मुंबई के बांद्रा स्टेशन पर जमा हुई भीड़ की लानत-मलामत कर रहा है। मगर सरकार सिर्फ मध्य वर्ग की नहीं है। वह भी यह समझती है कि अगर लॉकडाउन चलता रहा और सारे काम-धंधे बंद रखे गए, तो न सिर्फ गरीबों और मजदूरों का हाल बुरा होगा, बल्कि इसकी आंच मध्य वर्ग और फिर उच्च वर्ग तक पहुंचने में देर नहीं लगेगी। काम-धंधे चलेंगे नहीं, तो लोग तनख्वाह कब तक दे पाएंगे? तनख्वाह नहीं मिलेगी, कट जाएगी या नौकरी चली जाएगी। ये सारी बातें सिर्फ आशंका नहीं हैं। अपने आस-पास देखिए, यह सच्चाई दिखेगी। हो सकता है कि आपके घर के दरवाजे पर भी इसकी दस्तक सुनाई पड़ रही हो। 
यही वजह है कि राज्य सरकारों ने लॉकडाउन बढ़ाने का समर्थन करते हुए प्रधानमंत्री के सामने यह चिंता रखी कि ऐसे में लोगों की रोजी-रोटी का इंतजाम जरूरी होगा। उन्हें यह फिक्र भी है कि अगर सब कुछ ठप रहा, तो सरकार को टैक्स कहां से मिलेगा? और कमाई नहीं होगी, तो सरकारें वे जरूरी खर्च कहां से और कब तक करेंगी, जो इस भयानक बीमारी से लड़ने के लिए जरूरी है? 
जाहिर है, प्रधानमंत्री ने जान भी और जहान भी का नया नारा देते हुए यह सब जरूर सोचा होगा। सरकार पर कई तरफ से दबाव भी हैं और बात में दम भी है। गांवों में किसानों का कहना था कि घर के अंदर रहने या गांव के दायरे में रहने में क्या फर्क है? अगर एक परिवार अपने खेत में जाकर फसल काटता है, उसे खलिहान तक लाता है, दाने साफ करके बेचने लायक तैयार करता है, तो इसमें हर्ज क्या है? खतरा क्या है, और इससे सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कैसे नहीं हो रहा? 
इसीलिए न केवल गांवों के लोग, बल्कि खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ भी सलाह दे रहे थे कि गांव के भीतर का कामकाज पूरी तरह खोल देना चाहिए। सिर्फ उन लोगों को छोड़कर, जो बाहर से गांव में           आ रहे हैं। बुधवार को नए नियमों के एलान के साथ ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि गांव जाने के इच्छुक जिन लोगों की जांच हो चुकी है, वे आइसोलेशन में रह चुके हैं और उनके अंदर बीमारी का वायरस नहीं पाया गया है, ऐसे लोगों को उनके गांव तक पहुंचाने के लिए बसों का इंतजाम किया जा रहा है। 
गांव हो या शहर, हर इंसान को अपनी जान की फिक्र तो है ही। लेकिन शहरों में रहते हुए, खासकर गरीब लोगों के लिए किसी से दूरी बनाकर रहना बहुत मुश्किल है। एक कोठरी में आठ-दस लोग रहते हैं। अब वे भीतर रहें, तो कैसी सोशल डिस्टेंसिंग? और बाहर निकलें, तो जाएं कहां? खासकर झुग्गी बस्तियों या जेजे कॉलोनी या एसआरए की इमारतों में रहने वाले लोगों के लिए बाहर यानी बिल्डिंग-कंपाउंड में भी इतनी जगह नहीं होती कि वे एक-दूसरे से बचकर निकलते रह सकें। 
इस स्थिति का सबसे आसान इलाज यही दिखता है कि हर जगह कुछ न कुछ ऐसे काम शुरू हो जाएं, जिनसे इन लोगों को राहत मिल सके। और इन्हें राहत मिलने का अर्थ होगा, तमाम तरह की चीजों की सप्लाई का काम दोबारा शुरू होना। बड़ी फैक्टरियां अमूमन शहरों के बाहर ही होती हैं। लेकिन शहर बढ़ने के साथ वे उसके बीच में पहुंच जाती हैं। ऐसी जगहों पर जरूरी है कि इस वक्त कम कामगारों के साथ काम शुरू किया जाए और जितने लोग काम पर बुलाए जाएं, उनके सोने, खाने और नहाने का इंतजाम वहीं आसपास किया जाए, ताकि इन्हें बाहर किसी और से मिलने की जरूरत न पडे़। 
लॉकडाउन से अर्थव्यवस्था पर जो असर होने वाला है, उसके अभी तक जितने अनुमान आए हैं, वे सभी रोंगटे खडे़ कर देने वाले हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्र्रा कोष का कहना है कि भारत की विकास दर के गिरकर 1.9 फीसदी रहने की आशंका है। इससे भी बड़ा डर यह है कि दुनिया में मंदी आने वाली है और यह 1930 की महामंदी के बाद का सबसे बड़ा संकट है। बार्कलेज का तो कहना है कि इस साल दिसंबर तक भारत की विकास दर शून्य रहेगी। लेकिन अभी इन आंकड़ों और अनुमानों का कोई अर्थ नहीं है। जब तक दुनिया से महामारी खत्म नहीं होगी, तब तक सही-सही हिसाब नहीं लगाया जा सकता कि इससे नुकसान कितना हुआ है और कितना होगा? इसलिए यह जानना जरूरी है कि मुद्राकोष 1930 की जिस महामंदी का जिक्र कर रहा है, उसमें हुआ क्या था? उसमें दुनिया की जीडीपी 26 परसेंट से ज्यादा गिर गई थी, और करीब-करीब एक चौथाई लोगों का रोजगार चला गया था। 
यहां इरादा आपको डराने का नहीं है, लेकिन पिछले महीने तक ज्यादातर लोग कह रहे थे कि मानवता के सामने यह दूसरे विश्व युद्ध के बाद का सबसे बड़ा खतरा है। अब सब मान रहे हैं कि यह उससे कहीं बड़ा खतरा है। इसलिए जरूरी है कि महामारी के खतरे का मुकाबला करते हुए महामंदी की आशंका से निपटने की तैयारी भी साथ-साथ की जाए। सरकार ने जो फैसला किया है, वह एकदम इसी राह पर है। हां, बेहद सावधानी बरतनी पड़ेगी। लोगों को जागरूक करना पडे़गा। खासकर बड़े शहरों में ढील की बजाय और अधिक कड़ाई बरतनी होगी। इस वक्त लॉकडाउन के बावजूद हॉटस्पॉट बन चुके इलाकों में जो गतिविधियां हैं, वे खतरनाक हैं। 
दूसरा जो काम बेहद जरूरी है, वह है घबराए हुए, परेशान लोगों को उनके घर पहुंचाने का इंतजाम। सूरत में मजदूरों का प्रदर्शन और बांद्रा की भीड़ तो बस नमूना है। देश के अलग-अलग शहरों में ऐसे हजारों लोग बेहाल फंसे हुए हैं। इनके सब्र का बांध कभी भी टूट सकता है। राज्य सरकारें जांच के बाद असंक्रमित लोगों को उनके घर वैसे ही भेजें, जैसे उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा है। इससे शहरों में भीड़ भी घटेगी और गांवों में ये ज्यादा सुरक्षित माहौल में भी होंगे।
इतिहास गवाह है कि जब भी भारत की अर्थव्यवस्था संकट में रही, तो खेती और गांव से पैदा होने वाली मांग ने ही उसे सहारा दिया है। वक्त है कि अब इस फॉर्मूले को पूरे जोर-शोर से लागू किया जाए। यही वह रास्ता है, जो आगे चलकर बड़े उद्योगों को चलाने और मध्य वर्ग के रोजगार को बचाने की जमीन तैयार कर पाएगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 16 april 2020