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बाधाएं बहुत, पर आगे बढ़े हैं लोग

बदलाव को समझना हो तो देखना होगा कि 72 साल पहले आज के दिन हम कहां थे और अब कहां पहुंच चुके हैं। आजादी के सात दशकों में भारत बहुत बदला है। लोगों की मानसिकता बदली है। भारतीय अब भयभीत नहीं है। किसी से नहीं डरता। अपना हक मांगने से बिल्कुल नहीं हिचकता। बड़े से बड़े आदमी को धता बताने से नहीं चूकता। रोटी, कपड़ा और मकान को अपना अधिकार मानता है, न कि भगवान की देन या किसी राजनेता का आशीर्वाद। सरकार से अपेक्षा करता है कि वह इन सब जरूरतों को पूरा करेगी। 

अपने देश और संस्कृति के बारे में आज लोग कहीं ज्यादा सहज हैं। आज का भारतीय मानकर चलता है कि उसका देश बहुत पुराना है, संस्कृति काफी महान है, और उसमें अनेकानेक बुराइयां हैं, जिनसे निपटे बिना देश आगे नहीं बढ़ने वाला। सबसे बड़ी बात तो यह है कि लोग आज अपने आप को बदलाव लाने में सक्षम मानते हैं, न कि अक्षम। आज वे खुद बदलाव लाने की कोशिश करते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण खुले में शौच से मुक्ति है। एक समय था, जब देश के अधिकतर राज्यों में सवेरे-शाम आप लोगों को लोटा परेड पर जाते देख सकते थे। बस कुछ साल की कोशिश से ही इससे मुक्ति मिल गई। सरकार ने थोड़ा-सा धक्का जरूर दिया, पर इसे खत्म करने का काम मूल रूप से तो लोगों ने ही किया। हालांकि स्वच्छता की लड़ाई इसके आगे भी बहुत लंबी है। 

जाति के नाम पर एक-दूसरे को नीचा दिखाना अभी भी जारी है। हर दूसरे को ओछा साबित करने की फिराक में लोग अभी भी उलझे रहते हैं। पर साथ ही साथ बदलाव भी आ रहा है। आज देश की ज्यादातर व्यवस्थाओं में हर जाति के लोग ऊंचे-नीचे पदों पर मिल जाते हैं। राजनीति में तो ब्राह्मण-बनिया-ठाकुरों का वर्चस्व पूरी तरह से खत्म हो चुका है। सफलता की सीढ़ियां चढ़ने के लिए नए रास्ते खुल गए हैं। महज किसी का बेटा या बेटी होना काफी नहीं है। हुनरमंद की कद्र पहले से थोड़ी बढ़ी है। सफल उद्योगपतियों की लिस्ट देखें, तो पाएंगे कि अधिकांश नाम वे हैं, जिनका 30 साल पहले तक उद्योग जगत से कोई वास्ता नहीं था और जिन्हें 20 साल पहले तक कोई जानता भी न था। सभी अपने ही बलबूते पर बढ़े, न कि मां-बाप की कमाई पर। पुराने उद्योग घराने, राजा-महाराजाओं की तरह लुप्तप्राय हैं। 

जातीय पूर्वाग्रहों का बड़ा नुकसान एक अजीब से निकम्मेपन में आज भी महसूस किया जा सकता है। देश के कई इलाकों में नौजवान आज भी काम-धंधा करने को ओछा मानते हैं। कई इस फिराक में रहते हैं कि किस तरह से कोई ऐसा काम मिल जाए, जिसमें कि लोगों पर धौंस जमाने का ज्यादा से ज्यादा मौका मिले, जबर्दस्ती उगाही करने का अवसर मिले। इसके रहते आज भी कई लोग सरकारी नौकरी की धुन में अपनी जवानी गंवा देते हैं। इस अभिशाप से देश कैसे मुक्ति पाता है, यह देखना अभी शेष है।

आज यह सामान्य मान्यता है कि देश के नेताओं और सरकार की जिम्मेदारी है कि वे कोई ऐसा काम न करें, जिससे देश की नाक कटे, काम करने में दिक्कत हो और जो ऐसा करने से बाज न आएं, उन्हें कानून की मदद से रोका जाए, कानून-सम्मत सजा हो। इसे चाहे आप नवजागृत राष्ट्रीयता कहें, आज लोग अपने देश पर गर्व करते हैं। गर्व करने में शर्म महसूस नहीं करते। साधारण जनता ऐसे लोगों को दरकिनार करने से नहीं हिचकती, जो आज भी देश को नीचा दिखाने पर आमादा रहते हैं, धर्म और जाति के नाम पर लोगों को बांटना चाहते हैं। 

सरकार अब माई-बाप सरकार नहीं रही। अब लोग सरकार से याचना नहीं करते। मांग करते हैं। आज जब सरकार लोगों को थोड़ा भी बोलने से रोकती है, तो लोग सरकार को डांटने-फटकारने से हिचकते नहीं हैं। थोड़ी सी भी आर्थिक मंदी आ जाए तो सरकार को खूब कोसा जाता है। आखिरकार सरकार की ड्यूटी है कि वह लोगों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करे, देश को बाहरी हमलों से सुरक्षित रखे और चतुर्दिक आर्थिक विकास बरकरार रखे।

कुछ ही साल पहले लोग हंसते हुए कहते थे, ‘सौ में से निन्यानबे बेईमान, फिर भी मेरा देश महान’। आज लोग चाहते हैं कि बेईमानों को न्यायोचित सजा मिले। पहले मान्यता थी कि भगवान गलत करने वाले को सजा देगा। आज मान्यता है कि अदालत और न्याय-व्यवस्था को यह सब करना चाहिए। 

बीस साल पहले तक में देश में केवल पांच आईआईटी, एक एम्स और एक जेएनयू था। विश्वविद्यालय कोई 250 थे। सभी आईआईटी में मिलाकर उस वक्त हर साल लगभग 800 छात्र दाखिल होते, एम्स में 70 और जेएनयू में 700। उच्च शिक्षा सचमुच में बहुत ही इलीट किस्म की चीज थी। ये इलीट छात्र समाजवाद के सपने देखते। पिछले दो दशक में उच्च संस्थानों की संख्या इससे कई गुना बढ़ी है। कहीं ज्यादा लोगों को उच्च शिक्षा पाने का मौका मिला है। इनसे निकलने वाले छात्रों ने अपनी आंखों में कहीं ज्यादा बड़े सपने संजो रखे हैं। 

एक समय था, जब इक्के-दुक्के अमीर परिवारों के लड़के इंग्लैंड रिटर्न होते थे। आज हर साल कोई साढ़े सात लाख लड़के-लड़कियां विदेश पढ़ने जाते हैं। अब जरूरत यह है कि देश इस तरह से बदले कि ये सभी, देश-विदेश में पढ़े छात्र बेहतर से बेहतर काम-धंधा कर सकें। फिलहाल देश की तरफ से काम-धंधे को बढ़ावा देने के लिए कुछ नहीं किया गया है। बल्कि, ऐसा लगता है, मानो देश अभी भी धनार्जन को चोरी-डकैती के समान बुरा मानता है। व्यापार करने, और मुनाफा कमाने पर अभी भी लोग नाक-भौं सिकोड़ते हैं। यदि देश युवाओं के सपनों को सच बनाने में मदद कर सके, तो क्या कहने।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

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