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नए कश्मीर का पुराना विचार 

श्रीनाथ राघवन, सीनियर फेलो, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च

जब केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 को खत्म कर दिया, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में नए युग की शुरुआत हो चुकी है। वैसे जम्मू-कश्मीर के इतिहास में यह कोशिश इतनी नई भी नहीं है। इंदिरा गांधी भी कश्मीर में यथास्थिति बदलना चाहती थीं। इस राज्य के विशेष दर्जे को खत्म करने के निर्णय को सही ठहराते हुए मोदी सरकार ने नई व्यवस्था के तहत कश्मीर के तेज विकास और राजनीतिक फायदे पर जोर दिया है। जब हम यह सोच रहे हैं कि यह नई व्यवस्था कैसे काम करेगी, तब हमें इस मोर्चे पर इंदिरा गांधी द्वारा की गई कोशिशों पर भी नजर डाल लेनी चाहिए। 

जून 1970 में श्रीनगर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था, ‘हम नए कश्मीर का निर्माण करेंगे, यदि आप सहयोग करें, तो जल्दी, यदि सहयोग न करें, तो धीरे-धीरे, लेकिन हम निर्माण करेंगे जरूर।’ वास्तव में, इस राज्य में महत्वपूर्ण बदलाव पहले से चल रहे थे। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री जी एम सादिक 1964 से पद पर थे। अपने कार्यकाल के एक वर्ष में ही उन्होंने डेमोक्रेटिक नेशनल कॉन्फ्रेंस का कांग्रेस में विलय करा लिया था। उन्होंने भारतीय संविधान के ज्यादातर प्रावधानों को वहां लागू करके राज्य के विशेष दर्जे में क्षरण का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। सादिक ने अनुच्छेद 356 भी स्वीकार कर लिया था, जो किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन के रास्ते खोलता है। उन्होंने राज्य के संविधान में भी एक महत्वपूर्ण संशोधन किया था। इसके अनुसार, राज्य में चुने हुए सदर-ए-रियासत की बजाय केंद्र सरकार द्वारा चयनित राज्यपाल नियुक्त करने की व्यवस्था लागू होनी थी। 

इन बदलावों के बाद हुए 1967 के विधानसभा चुनाव में सादिक पर्याप्त बहुमत से सत्ता में लौटे। तब भी सरकार राज्य में रोजगार और निवेश बढ़ाने के लिए संघर्ष कर रही थी। सादिक ने गौर किया कि राज्य के शिक्षित युवा अलगाववादी गुटों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इंदिरा गांधी ने अपने सिपहसालार आई के गुजराल को राज्य में निवेश लाने के काम में लगाया। गुजराल ने रिपोर्ट दी कि उद्योग जगत संघर्षग्रस्त क्षेत्र में निवेश के लिए तैयार नहीं है, ऐसे में सबसे बेहतर उपाय यही हो सकता है कि सार्वजनिक क्षेत्र के दो उपक्रमों को यहां फैक्टरी खोलने के लिए कहा जाए। 

हालांकि यहां मुख्य चुनौती दिग्गज नेता शेख अब्दुल्ला की ओर से थी। यद्यपि अब्दुल्ला 1953 में अपनी गिरफ्तारी के बाद से ही जेल आते-जाते रहे थे, लेकिन कश्मीर घाटी में वह मजबूत थे। इंदिरा गांधी भी उनका महत्व समझती थीं। हालांकि जिन बातों ने कश्मीर के संदर्भ में इंदिरा गांधी के विचार को आकार दिया, उसमें लोकनायक जयप्रकाश नारायण की एक सलाह शामिल थी। जेपी पहले तो कश्मीर के आत्म-निर्णय के पैरोकार थे, लेकिन 1965 में पाकिस्तानी हमले के बाद उनके विचार बदल गए। इस हमले के वर्ष भर बाद उन्होंने इंदिरा गांधी को एक पत्र लिखा, ‘यदि अब्दुल्ला पैरोकारी करें, तो कश्मीरी भारत के तहत स्वायत्तता पर खुश हो सकते हैं। अब्दुल्ला के विचार पहले चाहे जो रहे हों, पर अब वह असलियत समझ चुके हैं कि भारत कश्मीर के किसी हिस्से से समझौता नहीं करेगा। अत: कश्मीर को सुरक्षित करने के लिए उचित होगा कि अब्दुल्ला के साथ तालमेल बिठाया जाए।’ तब शेख अब्दुल्ला हिरासत में थे। 

अक्तूबर 1967 में इंदिरा गांधी ने विदेश सचिव टी एन कौल को काम पर लगाया कि वह निजी तौर पर अब्दुल्ला तक पहुंच बनाएं। अनेक मुलाकातों में कौल ने अब्दुल्ला के दिमाग को पढ़ा। अब्दुल्ला मानते थे कि भारत के हितों पर किसी प्रकार की चोट नहीं पड़नी चाहिए। जब कौल ने संकेत किया कि नई दिल्ली ऐसे किसी व्यक्ति के साथ बात नहीं करेगी, जो आत्म-निर्णय की मांग करता है, तो अब्दुल्ला ने जवाब दिया, ‘यह बड़ी विचित्र बात है। जब सरकार को उन नगाओं से बात करने में कोई हिचक नहीं, जो भारत सरकार के विरुद्ध खुला हथियारबंद विद्रोह कर रहे हैं, तब सरकार को कश्मीरियों द्वारा चुने गए जन-प्रतिनिधियों से बात करने से क्यों मना करना चाहिए?’

शेख अब्दुल्ला को मार्च 1968 में रिहा किया गया, लेकिन इंदिरा गांधी ने उनसे न मिलने का फैसला किया। दरअसल, वह आशान्वित थीं कि शेख अब्दुल्ला कश्मीर की नई सच्चाइयों में खुद को ढाल लेंगे। वर्ष 1971 में इंदिरा गांधी भारी बहुमत के साथ सत्ता में लौटीं। पाकिस्तान की सैन्य हार के बाद कश्मीर में कांगे्रस 74 में से 57 सीटें जीतने में कामयाब रही। शेख अब्दुल्ला के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं थी। तब प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव पीएन हक्सर की दलील थी कि एक ऐसा प्रारूप तय हो, जो दोनों पक्षों को मंजूर हो। जी पार्थसारथी और एमए बेग के बीच वार्ता हुई, नवंबर 1974 में सहमति बनी। अब्दुल्ला की सत्ता में वापसी का रास्ता साफ हुआ। कांग्रेस के समर्थन से अब्दुल्ला फरवरी 1975 में मुख्यमंत्री बने। घाटी में इसकी आलोचना हुई। उसके बाद अब्दुल्ला खुद को कांग्रेस से दूर दिखाने में लग गए। कांग्रेस चाहती थी कि नेशनल कॉन्फें्रस का उसमें विलय हो जाए, लेकिन शेख अब्दुल्ला तैयार नहीं हुए। अक्तूबर 1976 में इंदिरा गांधी ने गुजराल से कहा, अब्दुल्ला गले की हड्डी बन गए हैं। वह उन्हें हटाने के बारे में सोच रही थीं, लेकिन वह स्वयं ही मार्च 1977 में सत्ता से बाहर हो गईं। कांग्रेस ने अब्दुल्ला सरकार से समर्थन वापस ले लिया, लेकिन गठबंधन से आजाद अब्दुल्ला अच्छी जीत के साथ सत्ता में लौटे। नए कश्मीर के लिए इंदिरा गांधी के ये तमाम प्रयास कश्मीरी राजनीति के लचीलेपन की सीमाओं को ही दर्शाते हैं। 

आज कश्मीर में ऐसा नया नेतृत्व तैयार करने की चुनौती ज्यादा बड़ी है, जो केंद्र सरकार के दृष्टिकोण को आगे बढ़ा सके। अब संदर्भ बहुत बदल चुका है। फिर भी हमें जेपी की उस सलाह को याद करना चाहिए, जो उन्होंने इंदिरा गांधी को दी थी, ‘यह सोचना दरअसल खुद को बहकाना होगा कि हम लोगों को बदल देंगे और लोगों पर दबाव डालकर, कम से कम निष्क्रिय रूप से ही सही, उनसे भारतीय संघ को मनवा लेंगे। शायद ऐसा हो भी जाता, अगर  कश्मीर की भौगोलिक स्थिति अलग होती। अपनी वर्तमान स्थिति और इसके लोगों में पैदा असंतोष के मद्देनजर पाकिस्तान इन्हें कभी शांति से नहीं रहने देगा।...यदि ज्यादातर लोगों के संतोष के अनुरूप विवाद का समाधान निकाल लिया जाए, तो बाहरी गड़बड़ी फैलाने वालों को गड़बड़ी करने के लिए अनुकूल जमीन नहीं मिलेगी।’
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

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  • Web Title:hindustan opinion column 15th August