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बचाव की मुद्रा में नौजवान 

विवान मारवाह, शोधकर्ता एवं उद्यमी Published By: Manish Mishra
Tue, 14 Sep 2021 11:50 PM
बचाव की मुद्रा में नौजवान 

साल 2018 में मैंने अपनी किताब के लिए आज के नौजवानों की आर्थिक आकांक्षाओं, उनके सामाजिक विचार और राजनीतिक नजरिये पर शोध करना शुरू किया। मेरा मकसद साफ था। मैं उन लोगों को समझना चाहता था, जिनको हमने बहुत ज्यादा नहीं सुना है। आखिर देश के छोटे कस्बों और  शहरों में रहने वाले युवा भारत के भविष्य में अपनी जगह कहां देखते हैं?
वाकई, अपने देश में काफी ज्यादा विविधता है और नौजवान भी इसके अपवाद नहीं हैं। हालांकि, भाषायी, सांस्कृतिक-धार्मिक और क्षेत्रीय आधार पर खासा अंतर होने के कारण इस पीढ़ी का एकजुट समूह के रूप में अध्ययन काफी मुश्किल हो सकता है, पर एक सामान्य सूत्र जो भारत के नौजवानों को एक करता है, वह है अपने भविष्य को लेकर उनकी चिंता।
अपनी पुस्तक लिखते समय मैंने 13 राज्यों में 900 से अधिक नौजवानों से बात की। मैंने बेशक उनमें परस्पर विरोधी विचार और अनुभव देखे, लेकिन जिस एक बात से मैं खासा प्रभावित हुआ और जिसने मेरे उत्तरदाताओं को एक-दूसरे से जोड़ा, वह बात है अपने आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक विकल्पों को लेकर महत्वाकांक्षी होते हुए भी वे इधर-उधर भागने के बजाय स्थिरता को तवज्जो देना चाहते हैं।
अच्छी तनख्वाह वाली निजी क्षेत्र की नौकरियों की कमी के कारण उनकी आर्थिक चिंता न सिर्फ उनकी अपनी सफलता की राह में बड़ी बाधा है, बल्कि देश के सुखद भविष्य के लिए भी ठीक नहीं है। बेरोजगार युवा पांच या दस ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की राह में राष्ट्र-निर्माता साबित नहीं होंगे। कोविड-19 से पहले देश में बेरोजगारी दर 45 साल के अपने उच्चतम स्तर पर थी, और हमने तकरीबन हरेक सप्ताह खबरों में देखा था कि किस तरह लाखों उच्च शिक्षित युवा रेलवे में चपरासी स्तर या सरकारी कार्यालयों में चतुर्थ श्रेणी के पदों के लिए आवेदन कर रहे थे। इनमें से कई तो पीएचडी, एमबीए या बीटेक पास थे और उन पदों के लिए वे आवेदन कर रहे थे, जिनके लिए दसवीं पास आवेदकों की दरकार थी।
‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज’ (सीएसडीएस) के एक युवा सर्वे में हर तीन में से दो भारतीय नौजवानों ने रोजगार के लिहाज से सरकारी नौकरी को तवज्जो दी है। अपने शोध के दौरान मैं भी अनगिनत ऐसे नौजवानों से मिला, जिन्होंने अपने जीवन का अच्छा-खासा वक्त संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं या राज्य-स्तरीय प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी में खर्च किया है। कई तो जैसे-तैसे कोई भी सरकारी नौकरी हासिल करना चाहते थे, क्योंकि यह स्थिर और टिकाऊ होती है। जाहिर है, भारतीय अर्थव्यवस्था निजी क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में सुरक्षित रोजगार पैदा नहीं कर रही है, और कई नौजवानों को टिकाऊ रोजगार की तलाश में सरकारी क्षेत्र की ओर मुंह तकने को मजबूर किया जा रहा है। 1991 के उदारीकरण ने एक मजबूत सेवा क्षेत्र का निर्माण जरूर किया है, लेकिन यह हर साल देश के श्रम-बल में शामिल होने वाले लाखों युवाओं का बहुत मामूली हिस्सा भी नहीं संभाल पा रहा। 
आर्थिक निश्चिंतता न होने के कारण भारतीय युवा अपने निजी जीवन को स्थिर बनाना चाहते हैं। 21वीं सदी में भी ‘अरेंज्ड मैरिज’, यानी माता-पिता द्वारा तय शादी का एक मजबूत संस्था के रूप में बने रहना इसकी पुष्टि करता है। सीएसडीएस युवा सर्वे में पाया गया है कि 10 में से आठ से अधिक (84 फीसदी)  विवाहित भारतीय युवाओं ने अरेंज्ड मैरिज की थी, जबकि प्रेम विवाह करने वालों की संख्या महज छह प्रतिशत थी। हिंदी फिल्में भले ही कुछ और कहानी बयां करें, लेकिन ज्यादातर भारतीय युवा खुद अपना जीवनसाथी नहीं तलाशते। इनमें से कुछ तो सामाजिक दबाव के कारण ऐसा नहीं करना चाहते, जबकि अधिकांश अच्छे वेतन व टिकाऊ रोजगार की कमी और आर्थिक अस्थिरता के कारण खुद को इतना सक्षम नहीं पाते कि प्यार की खोज कर सकें।
स्थिरता की यह इच्छा अंतत: ईवीएम में व्यक्त होती है। मतदान के आंकडे़ बताते हैं कि भारतीय नौजवान भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सबसे अधिक समर्थन करते हैं। आर्थिकी को तवज्जो देने वालों को संभवत: यह बात गलत लगेगी, लेकिन सच यही है कि जो नेता ऐसे मजबूत भारत का वादा करते हैं, जो अपने दुश्मनों (आंतरिक और बाहरी) के खिलाफ मजबूती से खड़ा होगा, उसके छोटे शहरों और गांवों में चुनाव जीतने की संभावना बढ़ जाती है।

साल 2019 का आम चुनाव इसको समझने का एक ज्वलंत उदाहरण है। यह बढ़ती बेरोजगारी और पाकिस्तान के साथ सीमा पर झड़प के बीच आयोजित किया गया था। युवा भारतीयों को यह बताने पर कि कौन उनको अच्छी सुरक्षा देगा और बाहरी दुनिया से बचाएगा, नौकरियों की कमी का मुद्दा कमजोर पड़ता गया। चुनाव बाद के सर्वे बताते हैं कि 18 से 35 आयु वर्ग के लगभग 40 फीसदी मतदाताओं ने भाजपा का साथ दिया, जो पार्टी के राष्ट्रीय वोट शेयर से लगभग चार अंक अधिक है। अपने साक्षात्कारों में मैंने पाया कि इनमें से कई युवा मतदाता मोदी के व्यक्तित्व से प्रभावित थे। उनके लिए वे पिता समान आदरसूचक शब्द बोल रहे थे, जो एक अस्थिर दुनिया में निजी तौर पर उनकी देखभाल करेंगे। वास्तविक आर्थिक तरक्की, जिसके जाहिर होने में कई साल लग जाते हैं, उतनी महत्वपूर्ण बात नहीं लग रही थी, जितनी स्थिरता की खोज। स्पष्ट है, भारतीय नौजवान अभी रक्षात्मक मुद्रा में हैं। वे एक ऐसी अर्थव्यवस्था में अपने पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं, जो पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं कर रही है, पर उनके रहन-सहन का खर्च लगातार बढ़ा रही है। नतीजतन, वे 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था और विश्व व्यवस्था का फायदा उठाने के बजाय बैकफुट पर लड़ रहे हैं। यह एक दुश्चक्र है, जहां युवाओं का कीमती समय अधिकतम क्षमता व भविष्य का फायदा उठाने के बजाय बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में जाया हो रहा है। यदि यही स्थितियां बनी रहीं, तो भारत के लिए अपनी युवा जनसांख्यिकी, जिसे जनसांख्यिकीय लाभांश भी कहा जाता है, का फायदा उठाना और पांच से दस ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना कठिन हो जाएगा। आर्थिक अनिश्चितता का असर व्यापक हो गया है, जो एक पूरी पीढ़ी के विकास और उसकी क्षमता को प्रभावित कर सकती है। हमें ऐसा नहीं होने देना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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