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14 सितम्बर, 2020|11:09|IST

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मीडिया के घटाटोप में हमारा विवेक

बद्री नारायण, निदेशक, जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान

भारतीय गांवों में एक कहावत कही-सुनी जाती है, ‘जैसा हम देखते हैं, वैसा ही हो जाते हैं।’ अर्थात कहने-सुनने से ज्यादा ‘देखने’ का हम पर असर होता है। संगत, पंगत और दूसरों की देखा-देखी हमारा व्यवहार बनता-बिगड़ता है। ‘आंखन देखी’ वैसे भी हमारी सामाजिक संस्कृति में सदा से महत्वपूर्ण है।
आज हम जिस ‘मीडिया परिदृश्य’ में जी रहे हैं, वहां देखने-सुनने से ही हमारा मन बनता है। आज भारत के शहरी क्षेत्रों में तो घर-घर टेलीविजन मौजूद है, ग्रामीण  इलाकों में भी लगभग 50 प्रतिशत घरों में टेलीविजन पहुंच गया है। याद कीजिए, पहले जहां एकमात्र ‘दूरदर्शन’ इन टेलीविजन सेट्स से होकर हमारे घरों में पहुंचता था, वहीं अब निजी टीवी चैनल का संजाल हमारे घरों में फैल गया है। भारत में लगभग 350 से ज्यादा टीवी चैनल इस समय देखे और दिखाए जा रहे हैं, साथ ही, 100 से ज्यादा आने के इंतजार में हैं। इनमें अनेक 24 घंटे चलने वाले न्यूज चैनल हैं, जिनके माध्यम सें हम ‘बे्रकिंग न्यूज सिंड्रोम’ के आगोश में आ गए हैं।
न्यूज चैनल के नैतिक पक्ष को अगर देखें, तो ये हमें खबरों, सूचनाओं और जन-संवादों से लैस करके एक सजग व गतिमान नागरिक बनाने के माध्यम के रूप में जाने जाते हैं। ये समाज में घटनाओं को तत्काल दिखाने और उनकी व्याख्या करके राज सत्ता, समाज सत्ता व जन, तीनों को एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील और जागरूक बनाने के लिए बने हैं। सिद्धांतत: अपनी खबरों के प्रति वे लोगों में विश्वास पैदा करते हैं। कई बार तो यह भी देखने में आता है कि हम टेलीविजन की खबरों के प्रति अविश्वास करते-करते भी विश्वास करने लगते हैं। लोकप्रिय लहजे में अगर कहें, तो नहीं-नहीं करके भी हम हां कर बैठते हैं।
घटनाएं तो सच ही होती हैं, किंतु जब वे टीवी चैनल की खबरों में बदलती हैं, तो उतनी निर्दोष या सहज नहीं रह जातीं। सरकारी टेलीविजन की खबरें हों, तो उनमें राज सत्ता की छवि दिखती है। निजी चैनल हों, तो बाजार और पूंजी की वाणी खबरों की पृष्ठभूमि में चलती रहती है। आग्रह, पूर्वाग्रह, रोमांच, उत्तेजना, हिंसक बर्ताव, ड्रामा, ऐक्शन आदि खबरों का हिस्सा बनकर हमारे व्यवहार, बर्ताव, मन और सोच की दुनिया में सक्रिय हो जाते हैं। टेलीविजन के परदे पर जहां तर्क-तथ्य की व्याख्या से पूर्ण बहस होनी चाहिए, वहां हिंसा, रोमांच, ड्रामा और एक्शन से भरे विवाद का स्तर इतना बढ़ जाता है कि कई बार लाइव डिबेट में भाग लेने वालों की जान तक चली जाती है। दर्शक और समाज इन ड्रामा से भरे विमर्शों पर अनेक बार विश्वास करने लगता है। विश्वास करने वाले और विश्वास पैदा करने वाले के बीच शक्ति और पूंजी का एक अदृश्य व रहस्यमय संसार सक्रिय रहता है। 
न्यूज चैनलों के ही साथ है सोशल मीडिया, जिसे पहले विकल्प के रूप में देखा गया था, पर आज दोनों एक-दूसरे की जकड़न में हैं। न्यूज चैनल केसाथ सोशल मीडिया की जुगलबंदी चलती रहती है। कई बार सोशल मीडिया न्यूज चैनल की खबरों को और कई बार चैनल की खबरें सोशल मीडिया को रचती हैं, बल्कि कई बार वे एक-दूसरे के समाचार को चीर-फाड़कर अपने ‘ट्रस्ट बेनिफिट’ को भी बढ़ाते हैं। यह सब बाजार के खेल का हिस्सा होता है। डर यह है कि एक दिन टीवी खबरों पर जनता का अविश्वास हद से ज्यादा न बढ़ जाए। न्यूज चैनल कई बार जनता की रुचि को रचते हैं, फिर कहते हैं कि समाज ऐसी ही खबरों में दिलचस्पी रखता है, इसलिए हम इन्हें दिखाते हैं। न्यूज चैनलों की दुनिया में मृत्यु, आत्महत्या, प्रतिरोध सब एक भाव से खबर के बाजार में बेचे जाते हैं।
कई समाज विज्ञानी अध्ययनों से जाहिर होता है कि लोगों के मन में टीवी चैनलों की खबरों की तुलना में अखबारों की खबरों पर ज्यादा विश्वास होता है, लेकिन न्यूज चैनलों द्वारा दिखाई गई खबरें पढ़ी गई खबरों से ज्यादा प्रभावी ढंग से मन-मस्तिष्क में बैठती हैं। कहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र में 1990 के दशक में एक जागरूक व आलोचनात्मक चेतना से लैस जो ‘नागरिक समाज’ बना था, उस नागरिक समाज की धार लगभग खत्म हो गई है। इसकी धार को खत्म करने में एक तो राज सत्ता की भूमिका रही, और दूसरी 24 घंटे दिखाए जा रहे न्यूज चैनलों की। नागरिक के रूप में हमारी सोच शायद रहस्य, रोमांच व ड्रामा से भरी खबरों में कहीं तिरोहित हो गई है।
यह भी ठीक है कि उच्च वर्ग व मध्य वर्ग की तुलना में समाज के निम्न वर्ग और दूरस्थ के सामाजिक समूहों पर टीवी खबरों के संजाल का असर कम है। कई बार समाज में बेहतर काम करने वालों की ‘सक्सेस स्टोरी’ न्यूज चैनलों के जरिए प्रसारित हो कई के लिए सामाजिक प्रेरणा का काम करती है। वैसे अधिकांश न्यूज चैनलों में सामाजिक खबरों के लिए जगह बहुत कम बची है। 
राष्ट्रीय न्यूज चैनलों की दुनिया राजनीतिक दलों के लिए धारणा निर्माण में भी कहीं न कहीं भूमिका निभाती है। ये चैनल भारतीय जनता की सियासी तरजीह या चाहत तय करने के लिए माहौल बनाते हैं। यह ठीक है कि चैनलों द्वारा बनाई गई धारणा मतदान केंद्रों पर पूरी तरह से वोटों में नहीं बदल पाती, लेकिन चार-पांच प्रतिशत भारतीय मतदाता, जिनका पक्ष पहले से बहुत निश्चित नहीं होता, और जिन्हें ‘शिफ्टिग वोट’ भी कहते हैं, उनकी चुनावी पक्षधरता निर्मित करने में न्यूज चैनलों की एक भूमिका होने लगी है। 
शायद भविष्य में भारतीय जनतंत्र इतना जागरूक हो जाए कि जिसकी धूम न्यूज चैनलों पर जरूरत से ज्यादा दिखे, वह चुनावों में प्राय: हार जाए, लेकिन पता नहीं, ऐसा कब होगा? पश्चिमी जनतंत्रों में तो ऐसा कई बार होता है। भारतीय जनतंत्र में भी ऐसा हुआ है, लेकिन इसे भारतीय जनतंत्र में ‘मुख्य चलन’ बनने में काफी वक्त लग सकता है।
भारतीय लोकतंत्र या भारतीय समाज की आज एक बड़ी चुनौती यह है कि न्यूज चैनलों की घटाटोप में उसका विवेक कैसे जिए? भारतीय जनमन का आलोचना-बोध खबरों की राजनीति, बाजार, सत्ता और शक्ति की आक्रामक राजनीति में भी आंधी में दीये की तरह जलता रहे। अगर हमारे यहां के न्यूज चैनल और जनता का विवेक, दोनों एक-दूसरे को प्रखर बनाते रहते, तो टीवी सेट्स की ‘आंखन देखी’ भारतीय समाज की जीवनी शक्ति बन सकती थी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 15 september 2020