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14 अक्तूबर, 2020|11:02|IST

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रणनीति बदलकर मुकाबला जरूरी 

कोविड-19 से जंग में खुश होने के साथ-साथ हमें चिंता करने की भी जरूरत है, खासकर आगामी त्योहारों को देखते हुए। लगभग एक महीने से रोजाना के नए मामलों में कमी आ रही है और यह अब 50-60 हजार तक पहुंच गई है। पॉजिटिविटी-रेट (प्रति 100 टेस्ट में पॉजिटिव मामलों की दर) भी घटकर 6.4 प्रतिशत आ गई है, जो जुलाई के तीसरे हफ्ते में 12 फीसदी के करीब थी। महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में हालात कहीं अच्छे दिखने लगे हैं, जहां कभी रोजाना सबसे अधिक मामले सामने आ रहे थे। मगर केरल हमारे लिए चिंता का विषय बन गया है। 
केरल में पहले स्थिति नियंत्रण में लग रही थी, उसे आदर्श माना जा रहा था, लेकिन अब प्रति दस लाख की आबादी में रोजाना संक्रमण के मामले में वह सभी सूबों से आगे है। वहां हर दिन प्रति दस लाख की आबादी पर 166 नए मामले सामने आ रहे हैं, जबकि महाराष्ट्र में 57 और गुजरात में यह संख्या 18 है। कुछ यही हाल कर्नाटक का है, जहां प्रति दस लाख की आबादी पर हर दिन 112 नए मामले सामने आ रहे हैं। 
बहरहाल, केरल को लेकर विशेष अध्ययन की जरूरत है, ताकि हम सीख सकें। संभव है, वहां संक्रमण की दूसरी लहर आ गई हो। वहां कोरोना वायरस का एक अलग रूप भी दिख रहा है, जो कहीं ज्यादा संक्रामक है। राज्य का स्वास्थ्य ढांचा मजबूत होने के बावजूद वहां की पॉजिटिविटी-रेट देश की 6.43 फीसदी के मुकाबले 14 फीसदी है। हो सकता है, दूसरे राज्यों और विदेश से वापस लौटने वाले लोगों (खासकर खाड़ी के देशों से वहां पांच लाख लोग लौटे हैं) की वजह से संक्रमण बढ़ा हो। वैसे भी, केरल में प्रति वर्ग किलोमीटर 750 लोग रहते हैं। इसकी बसावट सघन है। देश में यह आंकड़ा 460 ही है। रही-बची कसर स्थानीय त्योहारों ने पूरी कर दी है। 
हालांकि, केरल में समुद्री तटों को छोड़कर पर्यटन की अनुमति दे दी गई है और अर्थव्यवस्था भी धीमे-धीमे गति पकड़ने लगी है। जांच में सक्रियता दिखाने और कोमोर्बिडिटीज यानी सह-रुग्णता वाले मरीजों (एक साथ कई बीमारियों का शिकार इंसान) की विशेष देखभाल करने की रणनीति का भी खूब फायदा मिला है, जिसके कारण वहां मृत्यु-दर देश में सबसे कम 0.51 प्रतिशत है। यह काफी उल्लेखनीय बात है, क्योंकि सरकार ने पहली बार सह-रुग्णता और कोविड-19 से मौत के आपसी संबंधों की पुष्टि वाला आंकड़ा जारी किया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, कुल मृत्यु-दर में सह-रुग्णता वाले मरीजों की मृत्यु-दर 17.9 प्रतिशत है, जबकि उन लोगों की मृत्यु-दर 1.2 फीसदी है, जो पहले से किसी बीमारी से पीड़ित नहीं थे। दूसरे शब्दों में कहें, तो पूर्व में किसी बीमारी की गिरफ्त में न रहने वाले लोगों की तुलना में बीमार लोग 15 गुना ज्यादा मर रहे हैं। इसी तरह, 60 वर्ष से अधिक उम्र के कोरोना मरीजों में पहले से बीमार रोगियों में से 24.6 फीसदी की जान गई है, जबकि बिना किसी अन्य रोग वाले मरीजों में से 4.8 प्रतिशत की मौत हुई है। 45 से 60 वर्ष आयु वर्ग के मरीजों की मृत्यु-दर में भी पहले से बीमार मरीजों की मृत्यु-दर 13.9 प्रतिशत है, जबकि बिना पूर्व बीमारी वाले मरीजों की मृत्यु-दर 1.5 फीसदी है।
रही बात टीके की, तो इसका तीसरा चरण महत्वपूर्ण है, जिसमें हजारों व्यक्तियों पर इसे लगाकर देखा जाएगा कि यह कैसा काम कर रहा है और कितना सुरक्षित है? सच यही है कि सार्स और मर्स जैसे कोरोना वायरस पर दशकों से अध्ययन हो रहे हैं, लेकिन इनके खिलाफ भी कोई प्रभावी टीका अब तक तैयार नहीं हो सका है। अगर यह उम्मीद भी पाल लें कि अगले कुछ महीनों में सुरक्षित टीका स्वास्थ्य केंद्रों पर पहुंचना शुरू हो जाएगा, तब भी बड़ा सवाल इसकी आपूर्ति का है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मंशा स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, 65 साल से अधिक उम्र के लोगों और सह-रुग्णता वाले मरीजों को पहले टीका लगाने की है, क्योंकि इनमें मृत्यु-दर अधिक है। हालांकि, मंगलवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने घोषणा की कि 2021 की शुरुआत में देश में टीका आने की उम्मीद है और इसे किस तरह देश भर में बांटा जाएगा, इसकी योजना बनाई जा रही है। इससे पहले प्रधानमंत्री भी लाल किले से अपने संबोधन में कह चुके हैं कि कम से कम समय में अधिक से अधिक लोगों तक टीका पहुंचाने का लक्ष्य है। मगर प्राथमिकता किन्हें दी जाएगी, इस पर दुविधा कायम है? इसके लिए स्वाभाविक तौर पर नैतिकता व अर्थशास्त्र, बौद्धिक संपदा अधिकार व समाज सेवा, और निजी उत्पादन व सरकारी वितरण में संतुलन बनाने की आवश्यकता पडे़गी।
इन सबके बीच केंद्र सरकार ने एक जन-आंदोलन अभियान की शुरुआत की है, जिसका मकसद कोविड-19 से निपटने के लिए लोगों के व्यवहार को सुरक्षित बनाना है। इस अभियान को तीन मोर्चों पर जूझना होगा- त्योहार, पिछले आठ-नौ महीनों की ऊब और भाग्यवाद। इंसानी व्यवहार पर हुए एक हालिया सर्वेक्षण ने बताया है कि सर्वे में शामिल 90 फीसदी लोगों को सरकारी निर्देशों का पता था, लेकिन सिर्फ 44 प्रतिशत उनको मान रहे थे। सबसे कम अमल करने वालों में कमजोर सामाजिक-आर्थिक हैसियत वाले लोगों के साथ-साथ 26-35 आयु-वर्ग के नौजवान ज्यादा थे। ऐसा लगता है कि जन-आंदोलन अभियान के तहत सरल व आसानी से समझने योग्य संदेशों को सभी मीडिया प्लेटफॉर्म से प्रसारित किया जाएगा। मगर अलग-अलग समूहों के मुताबिक इसका  अलग-अलग लक्ष्य यदि निर्धारित नहीं किया गया, तो इसका पूरा फायदा हमें शायद ही मिल सके। जाहिर है, खासतौर से कमजोर समूहों में जोखिम की धारणाओं को समझने के लिए समाज विज्ञान के शोध-कार्यों में पर्याप्त निवेश की जरूरत है। और इनसे जो नतीजे आएंगे, उसी के आधार पर जोखिम में कमी व जन-भागीदारी संबंधी रणनीतियों को आकार देना कारगर होगा।
साफ है, यह वक्त कुछ क्षण ठहरकर अपनी नीतियों पर विचार करने का है। आने वाले महीनों में केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ आम लोगों की जिम्मेदारियों को भी परिभाषित किया जाएगा। अर्थव्यवस्थाओं के  बुरी तरह सिकुड़ने की वजह से दुनिया की तमाम हुकूमतों पर अपनी आर्थिक गतिविधियों को तेज करने का भारी दबाव है। संभव है, इसके लिए उन्हें वैज्ञानिक सलाहों को भी दरकिनार करना पडे़। सभी को संतुष्ट करना व्यावहारिक राजनीति व विज्ञान के लिए आसान भी नहीं। लिहाजा, हमें संचार की एक मजबूत संस्कृति विकसित करनी होगी। एक ऐसा खुला वातावरण बनाना होगा, जिसमें दोतरफा संवाद हो, ताकि समन्वय बन सके।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 15 october 2020