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ओपिनियनसेवा के दावे पर कितना भरोसा

विजय त्रिवेदी, वरिष्ठ पत्रकारPublished By: Naman Dixit
Fri, 14 May 2021 11:53 PM
सेवा के दावे पर कितना भरोसा

कोरोना के दूसरे भयावह दौर में राजनीति में अभी चिट्ठियों का दौर चल रहा है, ‘लेटर बम’ भेजे जा रहे हैं। इंटरनेट, वाट्सएप, ट्विटर और इंस्टाग्राम के साथ मोबाइल फोन के जमाने में जब चिट्ठियां लिखना दूर की बात हो गई, तब राजनीतिक दलों को यह सबसे ताकतवर हथियार लग रहा है। राजनीतिक दल अपने विरोधी नेता को चिट्ठी लिख रहे हैं। चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों समेत देश के 12 विपक्षी दलों के नेताओं ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी है और नौ सुझाव दिए हैं। उसमें बात सिर्फ कोरोना की नहीं है, कुछ और भी राजनीतिक सुझाव है। इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री मोदी को चिट्ठी लिखी, तो उसका कड़ा-सा जवाब स्वास्थ्य मंत्री  डॉक्टर हर्षवद्र्धन ने भेजा, फिर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने लंबी चिट्ठी लिखी, तो उससे भी लंबा जवाब भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने भेज दिया। उत्तर प्रदेश में मंत्री और एमएलए मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिख रहे हैं। देश में कोरोना की इस दूसरी लहर में हरेक दिन करीब चार लाख नए संक्रमित मरीज मिल रहे हैं और करीब चार हजार लोगों की रोजाना मौत हो रही है। यह तो सरकारी आंकड़ा है, अनुमान इससे कई गुना ज्यादा मौत होने का है, वरना गंगा, यमुना और दूसरी नदियों में लाशें बहती न दिखतीं और न ही श्मशानों व कब्रिस्तानों में मुर्दों के लिए जगह कम पड़ती। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि लोकतंत्र में सरकारों से सवाल पूछना जरूरी है और विपक्ष में बैठे राजनीतिक दलों के लिए यह सबसे मजबूत हथियार है। सवाल है, क्या सबसे जरूरी काम इस वक्त सवाल पूछना भर है और वह भी तब, जब एक राज्य में कोई पार्टी सरकार में है, तो दूसरी विपक्ष में और हर जगह हाल यही है कि अपने गिरेबान में झांकने के बजाय हर कोई दूसरे पर अंगुली उठा रहा है। इस सबके बीच पिस रहा है आम आदमी, जिसके लिए अस्पताल में न बेड है, न ऑक्सीजन और न ही वेंटिलेटर और बिना इलाज के मर जाए, तो श्मशान-कब्रिस्तान में भी जगह नहीं है। जन-नाराजगी से पीछा छुड़ाने के लिए ‘पॉजिटिविटी अनलिमिटेड कैंपेन’ शुरू कर दिया गया है, पर क्या सिर्फ भाषणों और प्रवचनों से पॉजिटिविटी आ सकती है?
केंद्र और राज्यों में बैठी सरकारें तो अपनी जिम्मेदारियां पूरी नहीं ही कर रही हैं, हैरानी है कि ‘राष्ट्र को प्रथम’ और ‘समाजसेवा के लिए राजनीति’ में आए हमारे राजनीतिक दल, उनके नेता और कार्यकर्ता भी इस समय कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। साल 1950 में लोकतंत्र को अपनाने वाले इस देश में आज करीब 2,300 राजनीतिक दल हैं। इनमें चुनाव आयोग में सात राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर और 59 राज्य स्तरीय पार्टी के तौर पर पंजीकृत हैं। करीब 800 सांसद हैं, 4,120 विधायक हैं, जिनमें सबसे ज्यादा भाजपा के 1,300 और कांग्रेस के 870 विधायक हैं। इसके साथ ही, हजारों की तादाद में पार्षद, पंच और सरपंच हैं। राजनीतिक दलों के सदस्यों की तादाद देखी जाए, तो दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा के 18 करोड़ सदस्य और सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के करीब दो करोड़ सदस्य हैं। सबसे बडे़ सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक करोड़ से ज्यादा स्वयंसेवक हैं। कुल मिलाकर, 30 करोड़ से ज्यादा सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता देश में हैं, यानी औसतन हर परिवार के पीछे एक राजनीतिक कार्यकर्ता मिल सकता है और यदि देश के कुल ढाई करोड़ कोरोना मरीजों की तादाद मानें, तो हरेक मरीज की सेवा 14 राजनीतिक कार्यकर्ता कर सकते हैं, पर क्या आपको तस्वीर ऐसी ही दिख रही है? क्या राजनेता व कार्यकर्ता अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं? कुछ लोग हैं, जो काम कर रहे हैं, लेकिन पटना और बिहार में जब पप्पू यादव पीड़ितों के लिए काम करते दिखते हैं, तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी के दिलीप पांडे मरीजों को बिस्तर दिलाने की कोशिश में लगे हैं, तो उनसे क्राइम ब्रांच पूछताछ कर रही है। गुरुद्वारों के लोग लगे हैं, मस्जिदों, मंदिरों और चर्च में भी कुछ हद तक लगे हैं, लेकिन अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी को सार्वजनिक करने वाले अपने ही लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने से सरकारें नहीं चूक रहीं। ये राजनीतिक कार्यकर्ता भले ही वेंटिलेटर, बेड नहीं दे सकते, ऑक्सीजन पैदा नहीं कर सकते, वैक्सीन की खुराक नहीं बना सकते, लेकिन उनके जमीन पर उतरने से इतना तो तय है कि दवाओं और ऑक्सीजन सिलेंडरों की कालाबाजारी रुक जाती। विधायकों और सांसदों के सक्रिय होने पर अस्पताल बिस्तर भरे होने के झूठे आंकड़े नहीं दिखा पाते। लाखों के फर्जी बिल बनाने की हिम्मत नहीं कर पाते। राजनीतिक दल कोरोना पीड़ित परिवारों के लिए कम से कम दो वक्त का भोजन उपलब्ध तो करा ही सकते थे और इतनी उम्मीद तो उनसे की ही जा सकती है कि वे मरने वालों के शवों का सम्मानजनक अंतिम संस्कार ही करवा दें। साल 2019 के आम चुनाव में भाजपा के 436 उम्मीदवारों में से 303 सांसद चुने गए, तो कांग्रेस के 421 उम्मीदवारों में से 52 चुनकर लोकसभा पहुंचे, इसी अनुपात में दूसरे दलों के भी उम्मीदवार हैं। सांसदों और विधायकों की बात छोड़िए, यदि ये हारे हुए लोग ही इस संकट काल में सेवा के लिए मैदान में उतर जाएं, तो हो सकता है कि अगली बार उनकी किस्मत बदल जाए। यहां जयपुर से कई बार भाजपा सांसद और विधायक रहे गिरधारी लाल भार्गव का जिक्र जरूरी लगता है। जब भार्गव विधायक से सांसद बने, तो उन्होंने जयपुर के श्मशानों में गंगा में प्रवाहित होने के इंतजार में बरसों से पड़ी हजारों अस्थियों को प्रवाहित करने का संकल्प किया और वह हर शनिवार की रात रोडवेज की बस में बैठकर एक बोरा अस्थियां हरिद्वार लाते। अगले दिन संस्कार और सम्मान के साथ उन्हें प्रवाहित कर देते। नतीजा जब एक बार कांग्रेस ने उनके खिलाफ जयपुर के पूर्व महाराजा भवानी सिंह को उतार दिया, तब एक नारा चला, ‘जिसका कोई न पूछे हाल, उसके संग गिरधारी लाल’। उस चुनाव का नतीजा यहां लिखने की जरूरत नहीं है और यह राजनेता के लिए सबक भी हो सकता है, गर वह सीखना चाहे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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