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कहीं लिखने से न कर लें तौबा

विभूति नारायण राय, पूर्व आईपीएस अधिकारीPublished By: Naman Dixit
Mon, 14 Jun 2021 11:28 PM
कहीं लिखने से न कर लें तौबा

यह 1980 के दशक की बात है। मैं हिंदी के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार श्रीलाल शुक्ल के पास एक सलाह लेने गया था। वह उत्तर प्रदेश के एक मझोले दर्जे के नौकरशाह भी थे। कुछ ही वर्षों पहले उनका उपन्यास राग दरबारी साहित्य अकादेमी सम्मान पाकर देश भर में चर्चित हुआ था। मेरी समस्या छोटी-सी थी, लेकिन एक नवोदित लेखक को, जो सरकारी नौकरी कर रहा था, बड़ी भी लग सकती थी। मेरा पहला उपन्यास घर  लिखा जा चुका था और छपने के लिए तैयार था। मेरी उनसे जिज्ञासा थी, ‘क्या मैं उसकी पांडुलिपि छपने के पहले सरकार के पास इजाजत के लिए भेजूं या सीधे प्रकाशक को दे दूं?’ श्रीलाल जी ने एक मजेदार संस्मरण सुनाया। राग दरबारी  छपने के बाद वह कवि, कथाकार अज्ञेय के पास गए, जो उन दिनों देश के एक प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक का संपादन कर रहे थे और उनसे निवेदन किया कि वह उनके लिए अपने अखबार में एक अदद नौकरी का इंतजाम करके रखें, क्योंकि सरकार कभी भी उन्हें सेवा से बर्खास्त कर सकती है। राग दरबारी  तत्कालीन भारतीय राजनीति की गंदगी और विद्रूप का बखूबी बयान करता है और उन्हें आशंका थी कि उस समय का राजनीतिक नेतृत्व उनके लेखन के लिए उन्हें दंडित करेगा। पर ऐसा कुछ हुआ नहीं, मैंने राजनेताओं को ही रस ले- लेकर राग दरबारी  के प्रसंग उद्धृत करते सुना। कहीं ऐसा तो नहीं कि उन दिनों समाज और राजनीति में सहनशीलता कुछ ज्यादा थी? सरकारी सेवाओं से जुड़े लोग इसी सहनशीलता का फायदा उठाया करते थे। सभी सेवाओं की अपनी नियमावलियां थीं और उन सबमें लिखने वालों के लिए कुछ खास छूटें थीं। मसलन, साहित्यिक, शैक्षणिक या वैज्ञानिक विषयों पर लिखे को छपवाने के लिए सरकार से पूर्व अनुमति की जरूरत नहीं थी। इसका फायदा उठाकर राग दरबारी जैसी कृतियां लिखकर बचा जा सकता था और किसी असहिष्णु तंत्र का कोपभाजन भी बना जा सकता था। मुझे यह अपमानजनक लगता था कि मैं अपनी कोई पांडुलिपि बाबुओं के पास भेजूं और वे तय करें कि वह छपने लायक है या नहीं, इसलिए मैंने कभी सरकारी इजाजत लेने की कोशिश नहीं की। कई मित्रों ने अपनी पांडुलिपियां शासन के पास भेजीं और वर्षों तक बाबुओं के हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण सवालों को सुन-सुनकर वे अपने सिर धुनते रहे।
हाल ही में केंद्र सरकार ने एक नया प्रयास किया है, जिसके तहत रिटायर हो चुके पेंशनयाफ्ता नौकरशाहों को भी कुछ विषयों पर कलम चलाने के पहले अपने पूर्व विभागों के प्रमुखों से इजाजत लेनी पडे़गी। ऐसा न करने पर उनकी पेंशन रोकी जा सकती है। इसके लिए अवकाश प्राप्त करते समय कर्मियों से एक बॉण्ड भरवाने की व्यवस्था की जा रही है। शुरुआत में तो नियम सुरक्षा से जुडे़ विभागों पर लागू होगा, पर कोई नहीं कह सकता कि कब किसी तरह की आलोचना को बर्दाश्त न करने वाली कोई सरकार दूसरे क्षेत्रों में भी इसे लगाने की सोचने लगे। इस तरह का विचार सबसे पहले साल 2008 में मनमोहन सिंह सरकार के दौर में आया था, जब रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग या रॉ के एक असंतुष्ट अधिकारी ने किताब लिखी, जिसकी अंतर्वस्तु पर सरकार को आपत्ति थी। लंबे विमर्श के बाद प्रस्तावित कानून को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और अब जिन्न फिर बोतल के बाहर आ गया है। राष्ट्रीय सुरक्षा एक ऐसा क्षेत्र है, जिसकी कभी भी एक निर्विवाद और सर्वमान्य परिभाषा नहीं दी जा सकती। इसकी आड़ पर सरकारें हमेशा नागरिकों के अभिव्यक्ति के अधिकारों को नियंत्रित करने की कोशिश कर सकती हैं। मसलन, जिन संगठनों पर रोक लगाने की योजना है, उनमें कई पुलिस से जुडे़ हैं। पुलिस राज्य की सबसे दृश्यमान बल प्रयोग करने वाली संस्था है, जो अक्सर नागरिकों के अधिकारों का हनन करती दिख सकती है। खासतौर से हाशिये से जुडे़ अल्पसंख्यकों, आदिवासियों या फिर महिलाओं के खिलाफ हम उन्हें अक्सर खड़े पाते हैं। अपवाद स्वरूप ही सही, मगर हमें ऐसे पुलिस अधिकारी भी मिल जाते हैं, जो इन ज्यादतियों के खिलाफ लिखते रहते हैं। इस तरह तो पुलिस सुधारों पर लिखने वाले पुलिसकर्मी देशद्रोही ठहराए जा सकते हैं। कितनी रोचक स्थिति होगी कि पंजाब में पृथकतावादियों को सफलतापूर्वक कुचलने वाले जूलियस रिबेरो आज इसलिए देशद्रोही ठहरा दिए जाएं कि वह पुलिस तंत्र की कमियों को रेखांकित करते हुए, उसमें व्यापक सुधारों की बात कर रहे हैं और अब 92 साल की उम्र में सरकार उनकी पेंशन रोकने की नोटिस दे दे। दुनिया भर में सरकारों ने सैकड़ों सालों की जद्दोजहद के बाद ही जनता के जानने के अधिकार को स्वीकार किया है। इसी जानने के अधिकार को सुरक्षित रखने का एक तरीका यह भी है कि तंत्र के अंदर रहे और सूचनाओं तक पहुंच रखने वाले सक्षम अधिकारी अपने अनुभवों को लिखकर साझा करें। उनमें ऐसे कम ही लेखक होंगे, जो रचनात्मकता या सूझ-बूझ के साथ ऐसे तथ्य सामने लाएंगे, जो वस्तुपरक भी होंगे और संस्थाओं को अपनी कमियों को समझने में भी मदद करेंगे, लेकिन दुर्भाग्य से सरकार इन्हें अवांछनीय मानकर इनकी आवाज दबाने की कोशिश कर रही है। प्रस्तावित नियमों का यह प्रावधान कि छपने के पहले पांडुलिपि संबंधित विभागाध्यक्ष को पूर्वानुमति के लिए भेजी जाए, जमीनी यथार्थ के अनुभव के विपरीत है, क्योंकि नौकरशाही में सबसे बड़ी दिक्कत ही यह है कि कोई जोखिम नहीं लेना चाहता। कोई यह नहीं चाहेगा कि उसके द्वारा हरी झंडी दिखाई पुस्तक पर छपने के बाद कोई विवाद हो और वह भी जवाबदेह बन जाए। मैंने ऊपर उल्लेख किया है कि कई बार अपनी पांडुलिपि शासन के हवाले करने के बाद सालों तक कई लेखक बाबुओं के हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण सवालों से उलझे रहे और कइयों ने तो लिखने से ही तौबा कर ली। यहां अपना एक अनुभव दर्ज करना अप्रासंगिक न होगा। मुझे 1994 में राष्ट्रीय पुलिस अकादमी, हैदराबाद से सांप्रदायिक दंगों के दौरान पुलिस की निष्पक्षता की पड़ताल करने के लिए एक फेलोशिप दी गई, पर बाद में अकादमी ने ही मेरे शोध प्रबंध को छापने से इनकार कर दिया, क्योंकि मेरे अध्ययन का निष्कर्ष था कि ज्यादातर सांप्रदायिक दंगों के दौरान पुलिस का रवैया पक्षपातपूर्ण रहा। यह बहुत स्वाभाविक ही था कि पुलिस अकादमी नौकरशाही की किसी अन्य संस्था की तरह आईना देखने में गुरेज कर रही थी। प्रस्तावित कानून तरह-तरह की न्यायिक समीक्षाओं में उलझकर अलाभकारी ही सिद्ध होगा। ज्यादा उचित तो यह है कि सरकार एक प्रौढ़ संस्था की तरह व्यवहार करे और जनता के जानने के अधिकार को बाधित करने का अपना हालिया प्रयास छोड़ दे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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