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हर कदम पर याद किए जाएंगे नेहरू

आज देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिवस है। बड़े-बड़े लोग शांतिवन जाकर उन्हें श्रद्धांजलि देंगे और अच्छी-अच्छी बातें कहेंगे। हालांकि, उनकी विचारधारा और वैचारिक प्रतिबद्धता पर...

हर कदम पर याद किए जाएंगे नेहरू
Pankaj Tomarमनोज कुमार झा, राजद नेता व राज्यसभा सांसदMon, 13 Nov 2023 11:31 PM
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आज देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिवस है। बड़े-बड़े लोग शांतिवन जाकर उन्हें श्रद्धांजलि देंगे और अच्छी-अच्छी बातें कहेंगे। हालांकि, उनकी विचारधारा और वैचारिक प्रतिबद्धता पर कोई चर्चा नहीं होगी, क्योंकि देश के सामाजिक-राजनीतिक मौसम का मिजाज बहुत बदल चुका है। 
आज से तकरीबन तीन दशक पहले मैंने साहित्यकार राही मासूम रजा का साहित्यकार कमलेश्वर के नाम एक खुला खत पढ़ा था। खत का शीर्षक, या यूं कहें कि शुरुआती पंक्ति कुछ ऐसी थी, ‘यार, कमलेश्वर, ये मौसम बदलने का नाम क्यों नहीं ले रहा है?’ तब परिप्रेक्ष्य यह था कि रजा और कमलेश्वर, दोनों ही राम जन्मभूमि आंदोलन के बरक्स समाज में तेजी से बढ़ते ध्रुवीकरण से व्यथित थे। विभाजन के बाद बड़ी मुश्किल से रिश्तों का दोबारा ताना-बाना बुनने वाले समाज के लिए 1980 के दशक का धार्मिक ध्रुवीकरण एक बड़ी आबादी के लिए परेशानी का सबब बन रहा था। जिन सिद्धांतों और मूल्यों पर एक स्वाभिमानी, आधुनिक और प्रगतिशील देश की बुनियाद रखी गई थी, उनको बढ़ती दक्षिणपंथी और सांप्रदायिक राजनीतिक प्रवृत्तियां लगातार ललकार रही थीं।  भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू विविध और बहु-धार्मिक समाज में सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के अपने प्रयासों के लिए जाने जाते थे। आज बहुत कम लोग हैं, जो भारत में एकता और विविधता के महत्व का उसी शिद्दत से प्रचार व अभ्यास करेंगे, जिसके लिए नेहरू जाने जाते थे। उन्हेें बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता, दोनों की चिंता थी। वह सांप्रदायिक हिंसा की निंदा और आलोचना में ‘किंतु’, ‘परंतु’ नहीं करते थे। 
नेहरू जीवन भर दोहराते रहे कि भारतीय राज्य किसी भी धर्म के प्रति निष्पक्ष है और रहेगा। विभाजन के ठीक पश्चात ‘गरम हवा’ वाले उस माहौल में भी भारतीय संविधान ने धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी दी और न सिर्फ दक्षिण एशिया, बल्कि पूरी दुनिया में एक मिसाल बना। उन्होंने अंतर-सामुदायिक संवाद को अलग-अलग स्तर पर बढ़ावा दिया, ताकि भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक विविधता को हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत के स्रोत के रूप में पूरी दुनिया में प्रस्तुत किया जाए। 
नेहरू जब नियोजित आर्थिक विकास की बात करते थे, तब यह उनके लिए सिर्फ एक प्रतीक या दिखावा नहीं था। वह जानते थे कि देश की क्या स्थिति है, जहां आधुनिक शिक्षा का ऐसा निम्न स्तर था कि हम सुई तक नहीं बना पाते थे। अगर देश में नियोजित आर्थिक विकास नहीं होता, तो पड़ोस के अनेक देशों की तरह हमारे यहां भी असमानता का स्तर इतना बढ़ जाता कि हम राजनीतिक रूप से न सही, आर्थिक रूप से एक उपनिवेश या कॉलोनी बने रह जाते। आज जिस आत्मनिर्भरता की बात खूब हो रही है, उसकी नींव पंडित नेहरू ने ही रखी थी। आईआईटी, आईआईएम जैसी संस्थाओं का निर्माण हुआ। दुनिया में अन्य देशों के नेता आगे का रास्ता जब सोच भी नहीं पा रहे थे, तब नेहरू ने विविध उपयोगी संस्थानों, संस्थाओं की मदद से देश का निर्माण शुरू किया था। तब अनेक लोगों को यह लगता था कि नेहरू कर क्या रहे हैं, इसकी अभी क्या जरूरत है, मगर धीरे-धीरे लोगों तक समृद्धि पहुंचने लगी और उन्हें नेहरू की नीतियों का मतलब समझ में आने लगा।
युवाओं की दृष्टि से यह बात बहुत रेखांकित करने योग्य है कि पंडित नेहरू ने वैज्ञानिक प्रवृत्ति को बहुत बल दिया। वह जानते थे कि दकियानूसी, पाखंड, अंधविश्वास जैसी चीजें इस देश को लील सकती हैं, इसलिए नेहरू ने बार-बार गांव-देहात के मंच से भी यह संदेश दिया कि वैज्ञानिक सोच के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं है। एक मिला-जुला हिन्दुस्तान तभी बेहतर बनेगा, जब हम वैज्ञानिक उन्नति के लिए प्रतिबद्ध होंगे। भारत को अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखते हुए अपनी अलग आवाज को भी जिंदा रखना होगा। 
आज अगर हम संयुक्त राष्ट्र में फलस्तीन के पक्ष में आवाज उठा पा रहे हैं, आज अगर हम इस पक्ष में हैं कि इजरायल किसी भी स्थिति में फलस्तीन को कॉलोनी न बनाए, तो इसके पीछे वही मानवीय व गुटनिरपेक्ष सोच है, जो गांधीजी से 1938 से शुरू हुई थी और नेहरू ने जिसे व्यापक आयाम दिया। 
नेहरू युवाओं को राष्ट्र के विकास में भागीदार मानते थे। एनसीसी, एनएसएस जैसे प्रयास बहुत नेताओं की कल्पना में भी नहीं थे, पर नेहरू युवाओं को यह समझाने में कामयाब हुए कि देश-सेवा के लिए वयस्क होने का इंतजार जरूरी नहीं है, उससे पहले भी देश के विकास में योगदान दिया जा सकता है। पंडित नेहरू ने राष्ट्र-निर्माण में बच्चों की भूमिका के बारे में भी संस्थागत रूप से सोचा और किया। उन्होंने बताया कि बच्चे देश की संस्कृति और शांति में अपना योगदान दे सकते हैं। नेहरू युवा केंद्र का विचार भी उनके साये में आगे बढ़ा और देश भर के नौजवानों को विविधता के बावजूद एक मंच पर लाने में कामयाब हुआ। 
इसमें कोई दोराय नहीं कि नेहरू और उनके  साथियों ने बिना लाग-लपेट के हिन्दुस्तान के हर युवा व हर नागरिक को बुनियादी रूप से याद दिलाया कि हिंसा देश और उसके लोगों को सिर्फ नुकसान पहुंचाती है और इसे कभी भी आपसी शिकायतों को दूर करने का साधन नहीं बनाना चाहिए। उनका पुख्ता यकीन था कि सांप्रदायिकता की राजनीति सामाजिक न्याय के सरोकार को भी प्रभावित करती है। उनके दौर की ‘गरम हवा’ आज भयानक ‘लू’ में तब्दील हो चुकी है और दुख इस बात का है कि यह लू समाज की एक हकीकत बनती जा रही है। इसके पक्ष में खड़े लोगों की बढ़ती संख्या सिर्फसामूहिक चिंता नहीं, बल्कि हमारे समाज में बढ़ रही रुग्णता का भी संदेश दे रही है। काश, वह आज के नामचीन लोगों के नफरत भरे रोजमर्रा के बयान देख पाते, ऐसे तोड़ने वाले बयान, जो आज करोड़ों मोबाइल फोन पर आगे बढ़ते चले जाते हैं। 
तीन दशक पहले, जो रजा और कमलेश्वर का वक्त था, उसमें अवसाद और मायूसी वाले लोगों की एक बड़ी आबादी थी और एक छोटा सा वर्ग ही सांप्रदायिक आधार पर समाज के विभाजन पर तालियां बजा रहा था। वह छोटा सा वर्ग आज बड़ा आकार ले चुका है।
खैर, एक फसल बर्बाद हो जाने के बाद भी किसान अगली फसल फिर लगाता है। उसे मौसम के बदलने पर हम सबसे ज्यादा विश्वास होता है। देश, दुनिया पर वर्तमान उदासीनता के बादल स्थायी नहीं हैं। नेहरू को याद करते हुए लगता ह, यह घृणा और द्वेष का मौसम फिर जल्द ही छंट जाएगा। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)