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17 अक्तूबर, 2020|11:30|IST

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सीमा पर अमन-चैन की राह

भारत और चीन के बीच सातवें दौर की सैन्य वार्ता भी कमोबेश बेनतीजा रही। दोनों देशों के सैन्य कमांडरों की यह बातचीत सीमा विवाद के निपटारे के लिए हो रही है। बीच-बीच में दोनों राष्ट्रों के राजनेता और राजनयिक भी वार्ता की मेज पर बैठते रहते हैं। जैसे, पिछले दिनों भारतीय विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव, जो चीन से भली-भांति परिचित हैं, बातचीत में शामिल हुए थे। चीन की तरफ से भी ऐसा होता रहा है। मगर जिस मंशा के साथ सैन्य स्तर की वार्ता चल रही है, वह शायद ही पूरी होती दिख रही है। राजनीतिक और राजनयिक स्तर की बातचीत में भी बहुत ज्यादा प्रगति नहीं हो रही। हां, दोनों पक्ष हर बार यह एलान जरूर करते हैं कि समझौते के पुराने बिंदुओं व शासनाध्यक्षों के स्तर पर बनी सहमति के ऊपर दोनों देश तैयार हैं। इसका अर्थ है कि पुरानी संधियों से दोनों राष्ट्र पीछे नहीं हट रहे, लेकिन द्विपक्षीय बातचीत में कोई प्रगति भी नहीं हो रही है।

सवाल यह है कि ये वार्ताएं अपने अंजाम तक क्यों नहीं पहुंच पा रही हैं? इसकी बड़ी वजह चीन की गलतफहमी है। उसे लगता है कि भारत एशिया में अमेरिकी हितों का पोषण कर रहा है। चीन पहले अपनी ताकत के प्रदर्शन से बचा करता था, लेकिन अब वहां ‘चाइना ड्रीम’ की खुलकर चर्चा होने लगी है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का यह सपना, दरअसल दो आयामों को समेटे हुए है। पहला, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के 100 साल पूरे होने पर, यानी 2020 तक यहां के समाज को साधन-संपन्न बनाना, और दूसरा, 2049 तक, यानी कम्युनिस्ट शासन के 100 साल पूरे होने तक राष्ट्र को आधुनिक और ताकतवर मुल्क की कतार में सबसे आगे लाना। चीन का यह सपना तभी पूरा हो सकता है, जब अमेरिका को सुपरपावर की गद्दी से बेदखल कर दिया जाए। चूंकि उसे लगता है कि भारत एशिया में अमेरिका  का पिछलग्गू बन गया है (जो बिल्कुल सही नहीं है), वह हम पर दबाव बना रहा है।

इसी तरह, उसकी एक बेजा सोच यह भी है कि वह भारत को अपना आर्थिक उपनिवेश बना सकता है। आर्थिक विस्तारवाद की इस नीति का उसने श्रीलंका, नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे हमारे पड़ोसी देशों में खूब इस्तेमाल किया है। यही कारण है कि हमारे घरेलू मामलों में उसकी टीका-टिप्पणी बढ़ गई है और वह भारत के करीब-करीब हरेक  कदम का विरोध करने लगा है। सीमा-विवाद को बेवजह हवा देना उसकी इसी रणनीति का हिस्सा है।
मगर इसका उसे खुद नुकसान हुआ है। भारत ने कभी चीन से प्रतिस्पद्र्धा करने की नहीं सोची। भारतीय नेतृत्व का यही मानना रहा है कि आने वाले वर्षों में चीन बेशक सबसे बड़ी वैश्विक ताकत बन जाए, लेकिन शीर्ष तीन आर्थिक ताकतों में भारत भी शुमार रहेगा। इसी सोच के तहत हम आगे बढ़ते रहे हैं। हम यही कहते भी रहे हैं कि वैश्विक मंचों पर चीन की अपनी जगह है और भारत की अपनी। मगर मई-जून महीने से जिस तरह से सीमा पर तनातनी का माहौल बना हुआ है, उससे चीन के प्रति अविश्वास की भावना गहरी हो गई है। इसे बढ़ाने का काम वहां का मीडिया भी कर रहा है, जो वक्त-बेवक्त 1962 की याद दिलाता रहता है।   

एक कमजोरी हमारी भी रही है। हम बहुत आशावाद में जीते हैं। चीन के साथ जब हमारी दोस्ती थी, तब हम आजीवन अच्छे दोस्त बने रहने की कसमें खाते थे, और आज जब अमेरिका से हमारी नजदीकी बढ़ी है, तो हम ऐसे सपने देखने लगे हैं कि आने वाले दिनों में नई दिल्ली और वाशिंगटन एक-दूसरे के पर्याय बन जाएंगे। जबकि इस उम्मीद को साकार होने में काफी वक्त लगेगा। हमें यह सच मान लेना चाहिए कि अमेरिका सिर्फ अपने हितों को साधना चाहता है। ताइवान, जापान, कोरिया, ऑस्ट्रेलिया या सिंगापुर जैसे देश उसके लिए महत्वपूर्ण हैं, भारत नहीं। इन देशों के साथ उसके कई तरह के संबंध हैं, जो कूटनीतिक, राजनीतिक व आर्थिक मंशा के तहत बनाए गए हैं। यही वजह है कि क्वाड (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का संगठन) में एकजुटता दिखाने की बातें तो होती हैं, लेकिन उसका ऐसा कोई घोषणापत्र नहीं दिखता, जिसमें भारतीय हितों की वकालत की गई हो। अमेरिका दक्षिण चीन सागर में अपने पांव पसारना चाहता है, ताकि चीन पर वह दबाव बना सके। आलम यह है कि अमेरिकी कूटनीतिज्ञ भी दबी जुबान कहने लगे हैं कि यदि नई दिल्ली वाशिंगटन के करीब आना चाहती है, तो उसे अपनी घरेलू नीतियां बदलनी होंगी। 

सवाल है कि इस सूरतेहाल में हमारी रणनीति क्या होनी चाहिए? सबसे पहले तो हमें चीन की गलतफहमियां दूर करनी चाहिए। उसे बताना होगा कि भारत और अमेरिका की राहें जुदा हैं, और अगर उसकी घरेलू संस्थाएं दोनों को एक मानती हैं, तो उनको नए सिरे से भारत का अध्ययन करना चाहिए। इसी तरह, उसे यह भी संदेश देना होगा कि अगर वह भारत से मित्रता चाहता है, तो उसे दबाव बनाने की रणनीति छोड़नी होगी। चीन को यह एहसास दिलाना भी जरूरी है कि उसकी माली हालत खराब है, उसके बैंक दिवालिया होने वाले हैं, बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) की वजह से उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि को धक्का लगा है और अमेरिका से तनाव उसकी अपनी नीतियों का नतीजा है। 

इसका यह मतलब नहीं है कि वार्ता की मेज पर भारत नरम रुख अपनाए। उसे मजबूती से यह बात रखनी होगी कि भारत अपने हितों को लेकर संजीदा है और उससे कतई पीछे नहीं हट सकता। इसीलिए बीजिंग अमेरिका को निशाना बनाने के लिए भारतीय कंधे का इस्तेमाल न करे। बदलना चीन को है, और यदि उसे अमेरिका से लड़ना है, तो वह पहले अपने घरेलू हालात को सुधारे। भारत एक शांतिप्रिय देश है, लेकिन इसे उसकी कमजोरी न समझी जाए। भारत किसी भी देश से तनाव का कभी हिमायती नहीं रहा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)  

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  • Web Title:hindustan opinion column 14 cotober 2020