DA Image
16 फरवरी, 2020|3:59|IST

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

घाटी के अतीत में छिपी उम्मीदें

जम्मू और कश्मीर को लेकर होने वाली सभी चर्चाओं और लेखन में ‘डोगरा की भूमिका’ को कमोबेश भुला दिया जाता है। जबकि तथ्य यही है कि जम्मू-कश्मीर राज्य अस्तित्व में नहीं आता, यदि महाराजा गुलाब सिंह (1792-1858) के नेतृत्व में डोगराओं द्वारा कूटनीति और वीरता का अद्भुत प्रदर्शन न किया गया होता। महाराजा गुलाब सिंह शुरुआती दिनों में महाराजा रणजीत सिंह के पसंदीदा सेनाधिकारी थे। उन्होंने अफगानिस्तान में सिख युद्धों में अपनी वीरता दिखाई, जिसके कारण, महाराजा रणजीत सिंह ने 1822 में चेनाब के किनारे खुद राजतिलक करके उन्हें जम्मू के राजा का खिताब दिया।

महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में ही, गुलाब सिंह ने जम्मू इलाके को एकजुट किया था और हिमालय में डोगरा की बाशिंदगी शुरू करवाई। इस महान पंजाब शासक की मौत के बाद, 1846 में हुई अमृतसर की संधि ने महाराजा गुलाब सिंह का राज्य-विस्तार कश्मीर घाटी तक कर दिया। वह इलाका उपेक्षित नहीं था, बल्कि वहां के मुस्लिम गवर्नर ने डोगराओं का कड़ा विरोध किया। इसी दरम्यान, जम्मू और हिमाचल प्रदेश के डोगरा सैनिकों ने ट्रांस-हिमालय में एक महत्वपूर्ण सैन्य अभियान को अंजाम दिया और बड़ी ऊंचाई पर सफल लड़ाई लड़ी। महान डोगरा सेनापति जोरावर सिंह ने, जिनकी गिनती विश्व इतिहास में सबसे बहादुर सैन्याधिकारियों में होती है, लद्दाख को स्थानीय साम्राज्य के कड़े विरोध के बाद जीता। जनरल बाज सिंह, मेहता बस्ती राम और अन्य डोगरा जनरलों ने गिलगित-बाल्टिस्तान पर जीत हासिल की। सफलता की इस यात्रा में डोगराओं को भी भारी नुकसान हुआ, मगर जम्मू-कश्मीर के डोगरा साम्राज्य की स्थापना करने में वे सफल रहे, जो ब्रिटिश भारत में सबसे बड़ी रियासत के रूप में उभरा। गुलाब सिंह के उत्तराधिकारी महाराजा रणबीर सिंह ने हुंजा और नगर को डोगरा साम्राज्य में शामिल किया। स्पष्ट है, जम्मू-कश्मीर की अनूठी बहु-क्षेत्रीय, बहु-भाषायी, बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक विशेषता डोगराओं की देन है, जिसके लिए इतिहासकारों ने उन्हें पर्याप्त श्रेय नहीं दिया।

राज्य की स्थापना के अलावा, डोगरा ने लगभग एक सदी तक यानी 1846 से 1947 तक इस पर सफलतापूर्वक राज भी किया। 1947 में 20 अक्तूबर को मेरे पिता ने राज्य के भारत में विलय को मंजूर किया। इस पूरी सदी में यहां चार शासक हुए- महाराजा गुलाब सिंह, महाराजा रणबीर सिंह, महाराजा प्रताप सिंह और महाराजा हरि सिंह। इस सच के बावजूद कि राज्य में 80 फीसदी मुस्लिम आबादी थी, डोगराओं ने इस राज्य को एक करके रखा। उन दिनों प्रशासन चलाने में न सिर्फ प्रतिभाशाली कश्मीरी पंडितों ने मदद की, बल्कि राज्य के बाहर के जहीन लोग भी इसमें शामिल हुए। इन लोगों में सर वजाहत हुसैन, सर गोपालस्वामी आयंगर शामिल थे, जो 1933 से 1939 तक राज्य के प्रधानमंत्री रहे। भारत का संविधान तैयार करने वाले प्रमुख नामों में एक बीएन राव भी कुछ समय तक यहां के प्रधानमंत्री रहे।

डोगरा के शासन काल में कई प्रगतिशील और दूरगामी सामाजिक सुधार शुरू किए गए, विशेषकर मेरे पिता महाराजा हरि सिंह द्वारा, जो 1925 में राजगद्दी पर बैठे। यह दुखद है कि उन्हें आमतौर पर अपने शासन के आखिरी महीनों के लिए याद किया जाता है, जिसमें कबायली हमला, भारत में राज्य का विलय और बाद के युद्ध की गिनती होती है। इसने उन उल्लेखनीय सुधारों को फीका कर दिया, जो मेरे पिता ने शुरू किए थे, जैसे बेगारी (जबरन मजदूरी) का अंत, 1929 में ही हरिजन/दलितों के लिए तमाम मंदिरों के दरवाजे खोलना, जबरी स्कूलों की शुरुआत (इनमें मुस्लिम लड़कियां उस वक्त पढ़ने के लिए आती थीं, जब ऐसी कोई संकल्पना भारत में कहीं और न थी) और राज्य-संस्था द्वारा बाहरी मजबूत ताकतों से राज्य के स्थाई बाशिंदों के भूमि स्वामित्व और सेवा-रोजगार की रक्षा करना। सामंतवाद से लोकतंत्र तक के सफर का मैं किस तरह अगुवा रहा, इसकी बानगी है कि मैंने सदर-ए-रियासत और केंद्रीय कैबिनेट मंत्री, दोनों के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं।
भारतीय सेना में उत्कृष्ट योगदान के अलावा सांस्कृतिक सहयोग में भी डोगरा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, फिर चाहे वह पारंपरिक नृत्य-संगीत हो या बसोहली, गुलेर और कांगड़ा जैसी विश्व प्रसिद्ध पहाड़ी चित्रकला। डोगरी भाषा को तो संविधान की आठवीं अनुसूची में भी शामिल किया गया है। डोगरा बेशक संख्या में कम हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन के कई क्षेत्रों में वे उल्लेखनीय भूमिका निभाते हैं।

जम्मू और कश्मीर की सांविधानिक स्थिति बदलने के बाद भी वे दोनों जुड़े हुए हैं। कई मायनों में, दोनों इलाकों की अर्थव्यवस्थाएं परस्पर सहायक हैं। अमरनाथ की पवित्र गुफा में आने वाले श्रद्धालुओं का बड़ा हिस्सा जहां जम्मू होकर गुजरता है, वहीं कश्मीर के बागवानी व हस्तशिल्प के ज्यादातर उत्पाद जम्मू के बाजारों से होकर गुजरते हैं। सच है कि दोनों क्षेत्रों को एक संयुक्त केंद्र शासित क्षेत्र के रूप में समेट दिया गया है, जिसका दोनों क्षेत्रों में स्वागत नहीं हुआ है। कश्मीरियों को लगता है कि विशेष दर्जा और संविधान का आनंद लेने के बाद अब उनका रुतबा अन्य भारतीय राज्यों से कम हो गया है, जबकि डोगराओं का मानना है कि भारत की उत्तरी सीमा के विस्तार और मजबूती में उनके योगदान को देखते हुए उनकी यह अपेक्षा गलत नहीं कि दोनों इलाकों की क्षेत्रीय स्वायत्तता के साथ उन्हें पूर्ण राज्य का दर्जा मिले।

कश्मीर में लंबे समय से इंटरनेट पर रोक और कई राजनीतिक नेताओं की नजरबंदी (जिनमें तीन पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल हैं और यह अब छठे महीने में प्रवेश कर गया है) का लोगों पर नकारात्मक मनोवैज्ञानिक असर पड़ने लगा है। व्यापक राष्ट्रीय हित में यह महत्वपूर्ण है कि जल्द से जल्द राजनीतिक हालात सामान्य किए जाएं और इंटरनेट की बहाली हो। इन सबके बाद ही अगस्त 2019 के बाद से इस केंद्र शासित क्षेत्र को हो रहे हजारों करोड़ो रुपये के भारी नुकसान की भरपाई हो सकेगी और वे तमाम फायदे, जो पुनर्गठन के बाद होने का भरोसा दिया गया था, वास्तव में पूर्व के डोगरा राज्य के लोगों तक पहुंच सकेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:Hindustan Opinion Column 13th February 2020