DA Image
हिंदी न्यूज़   ›   ओपिनियन  ›  कहीं भी ऑक्सीजन कम न हो 

ओपिनियनकहीं भी ऑक्सीजन कम न हो 

चंद्रकांत लहारिया, जन नीति और स्वास्थ्य तंत्र विशेषज्ञPublished By: Manish Mishra
Tue, 11 May 2021 11:36 PM
कहीं भी ऑक्सीजन कम न हो 

कोविड-19 की बीमारी में अब तक तीन तरीके बडे़ स्तर के निदान संबंधी परीक्षणों में खरे उतरे हैं। पहला, डेक्सामेथासॉन का इस्तेमाल, दूसरा, खून पतला करने की दवाएं देना और तीसरा, ऑक्सीजन-सपोर्ट। (हां, यह सच है कि कोविड-19 में ऑक्सीजन एक इलाज या दवा है।) इसके अलावा बाकी दवाएं जैसे प्लाज्मा थेरेपी, इवेरमेक्टिन और रेमडेसिविर अधिकतर बड़े बहुद्देशीय निदान संबंधी परीक्षणों में प्रभावकारी नहीं पाए गए हैं। अलबत्ता, कोरोना मरीजों के लिए ऑक्सीजन-सपोर्ट शुरुआत से ही एक मान्य तरीका रहा है। कोविड-19 के कुल मरीजों में से 15 से 20 फीसदी को ही अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है और उनमें से भी कुछ को ही ऑक्सीजन-सपोर्ट की जरूरत पड़ती है। इसीलिए भारत में पहली लहर में जब सक्रिय मामले बढ़ने लगे, तब चिकित्सा-ऑक्सीजन की मांग भी बढ़ी। नतीजतन, स्वास्थ्य मंत्रालय ने विशेषज्ञ समिति बनाई और स्वास्थ्य की स्थाई संसदीय समिति में इस पर चर्चा भी हुई। चिकित्सकीय-ऑक्सीजन की आपूर्ति की मांग बढ़ी, लेकिन मामला काबू में रहा।

मगर कोविड की इस दूसरी लहर में हालात हाथ से बाहर निकल गए। इसकी एक बड़ी वजह यह रही कि कोरोना की पहली लहर में सक्रिय मरीजों की संख्या 10.5 लाख के करीब थी, लेकिन दूसरी लहर में यह संख्या 3.5 गुना तक बढ़ गई। आज देश भर में 37 लाख से अधिक सक्रिय मामले हैं। फिर, यह भी देखा गया कि पिछली लहर की तुलना में इस बार आनुपातिक रूप से अधिक मरीजों को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ी है। यानी, संक्रमित मरीजों की संख्या भी बढ़ी और ऑक्सीजन-सपोर्ट पर रहने वाले मरीजों का अनुपात भी। इसका नतीजा यह हुआ कि चिकित्सकीय-ऑक्सीजन के लिए देश भर में बदहवासी का आलम पैदा हो गया। ऐसा नहीं है कि भारत में ऑक्सीजन का पर्याप्त उत्पादन नहीं हो रहा। रोजाना 7,000-8,000 मीट्रिक टन ऑक्सीजन हम बना रहे हैं। कोविड-19 महामारी से पहले 30 फीसदी से भी कम ऑक्सीजन चिकित्सा-कार्य के लिए इस्तेमाल होती थी, शेष औद्योगिक कामों में खपत होती। लेकिन जब ऑक्सीजन की मांग बढ़ी, तब दो मुख्य चुनौतियां उभरकर सामने आईं। पहली, औद्योगिक ऑक्सीजन सयंत्रों को चिकित्सकीय-ऑक्सीजन बनाने के लिए विशेष तैयारियां और समय की जरूरत थीं। और दूसरी, देश के कुछ ही राज्यों में ऑक्सीजन का उत्पादन होता है, जहां से जरूरतमंद राज्यों तक इसे लाने के लिए पर्याप्त विशेष टैंकर नहीं थे। निश्चित ही, इनसे निपटने के लिए पहले से योजना तैयार होनी चाहिए थी। मगर ऐसा नहीं हो सका। महामारी एक राष्ट्रीय आपदा होती है, इसलिए इससे निपटने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की थी। उसको इस बाबत समय पर योजना बनानी चाहिए थी और उसका बेहतर क्रियान्वयन भी करना चाहिए था। मगर राज्य सरकारें भी अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकतीं। ऑक्सीजन का वितरण सही तरीके से हो, इसके लिए जरूरी है कि राज्य अपने यहां कोरोना के आंकड़े दुरुस्त रखते और सही संख्या केंद्र को बताते। जिन-जिन राज्यों में कम मामले सामने आए, वहां नियमानुसार कम ऑक्सीजन की आपूर्ति की गई। पर चूंकि इन राज्यों में वास्तविक मरीजों की संख्या सरकारी आंकड़ों से काफी ज्यादा थी, इसलिए शत-प्रतिशत आपूर्ति होने के बाद भी, असलियत में जमीनी स्तर पर मरीजों के लिए ऑक्सीजन की कमी हो रही थी।

देश में चिकित्सकीय-ऑक्सीजन की कमी का मसला एक और बडे़ तथ्य की ओर इशारा करता है। राज्य सरकारें बेशक दावा करती हैं कि अपने-अपने अस्पतालों में वे मुफ्त में दवा और मरीजों की जांच की व्यवस्था करती हैं, मगर असलियत में ऐसा होता नहीं। मरीजों को न दवाएं मिलती हैं और न उनकी पर्याप्त जांच हो पाती है। देश भर में सरकारी अस्पतालों के बाहर निजी दवाई दुकानदार और नैदानिक केंद्रों की लंबी कतारें इसके सुबूत हैं। ऑक्सीजन भी एक दवाई है, और सरकारी अस्पतालों में ऑक्सीजन आपूर्ति में भी वे सारी बातें इस पर लागू होती हैं, जो अन्य दवाओं पर लागू होती हैं। चूंकि निजी दवा दुकानदारों के पास भी ऑक्सीजन की व्यवस्था नहीं थी, इसलिए इस मामले ने इतना तूल पकड़ लिया। अगर लोगों को आसानी से यह मिल जाता, तो शायद ऑक्सीजन की कमी का इतना हो-हल्ला नहीं मचता। इसलिए अगर हम इससे कुछ सीखना चाहते हैं, तो हमें सरकारी स्वास्थ्य-तंत्र में दवा आपूर्ति और वितरण में आमूल-चूल सुधार करने पड़ेंगे। इसके फंड बढ़ाने होंगे, आपूर्ति-शृंखला को दुरुस्त करना होगा और इससे जुड़े लोगों को नियमित तौर पर प्रशिक्षण भी देना होगा। जाहिर है, बेहतर प्लानिंग और उचित वितरण की जरूरत है। यह सही है कि तीन-चार सप्ताह पहले अपने यहां जो परिस्थितियां थीं, उनमें कुछ सुधार हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी नेशनल टास्क फोर्स गठित की है, जिसकी मुख्य जिम्मेदारी ऑक्सीजन की जरूरत, इस्तेमाल और वितरण पर सुझाव देना है। मगर हमें कोरोना की अगली लहर के लिए भी अभी से तैयार होना चाहिए। इसके लिए विस्तृत योजना बनाने की जरूरत है। हमें अपने आसपास यह देखना होगा कि स्थानीय स्तर पर किस तरह से ऑक्सीजन के वितरण को सुनिश्चित किया गया। महाराष्ट्र के नानदरबार के जिलाधिकारी ने छह-आठ महीने पहले ही अस्पतालों में ऑक्सीजन-प्लांट लगवा दिए थे। मुंबई नगर निगम ने भी लगभग यही किया, साथ ही नियंत्रण कक्ष बनाकर पूरे मुंबई को छह हिस्सों में बांट दिया व केंद्रीकृत व्यवस्था करते हुए सभी जगहों पर ऑक्सीजन की कमी को दूर किया। केरल ने भी फरवरी में ही ऑक्सीजन की कमी को भांप लिया था और अपनी तैयारी शुरू कर दी थी। नतीजतन, वहां भी ऑक्सीजन की कमी को लेकर मारामारी नहीं हुई। आने वाले दिनों में नए ऑक्सीजन-प्लांट लगने, आपूर्ति-व्यवस्था में सुधार आने, ऑक्सीजन-कंसंट्रेटर के उपलब्ध होने और नए मरीजों की संख्या में कमी आने से स्थिति में सुधार होगा। हमने कोविड-19 की दूसरी लहर में चिकित्सकीय-ऑक्सीजन आपूर्ति में जिन कठिनाइयों, चुनौतियों, परेशानियों और नुकसान का सामना किया है, उनकी भरपाई तो कभी नहीं हो सकती, लेकिन इनसे सबक लेकर अगर केंद्र और राज्य सरकारें मुफ्त इलाज, मुफ्त दवा और मुफ्त जांच योजनाओं को सुदृढ़ करती हैं और उनको शब्दश: लागू करती हैं, तो हम यकीनन एक सभ्य और नैतिक समाज गढ़ पाएंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

संबंधित खबरें