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28 अक्तूबर, 2020|5:14|IST

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कोरोना से जंग में राह दिखाता केरल

कोविड-19 के विरुद्ध लड़ाई में भारतीय राज्य पहली कतार में हैं, और प्रदेशों के मुख्यमंत्री खुद आगे बढ़कर इस संघर्ष का नेतृत्व कर रहे हैं। लेकिन सबकी कामयाबी एक समान नहीं है। दक्षिण भारत के दो पड़ोसी राज्य- केरल और तमिलनाडु भी इस महामारी से मजबूती से लोहा ले रहे हैं, पर इन दोनों की सफलता की डिग्री में भारी अंतर है। सूबे में कोरोना के पहले मामले के सामने आने के 100वें दिन केरल जब यह एलान कर रहा था कि उसने वायरस संक्रमण के प्रसार पर नियंत्रण पा लिया है, तो ठीक उसी समय तमिलनाडु देश में एक दिन के सर्वाधिक संक्रमण का रिकॉर्ड दर्ज करा रहा था। 
ऐसा क्यों है कि लगभग समान सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि वाले इन दोनों प्रदेशों में से एक महामारी को नियंत्रित करने में सबसे आगे है, जबकि दूसरा काफी पिछड़ता दिख रहा है? दोनों के पास सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा का मजबूत जमीनी ढांचा मौजूद है, दोनों ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में काफी निवेश किया है, दोनों ही प्रांतों के पास काफी प्रतिबद्ध व अनुभवी मेडिकल स्टाफ हैं और दोनों स्वास्थ्य सेवा के मद में पर्याप्त आवंटन भी करते रहे हैं। लेकिन दोनों में कुछ असमानताएं भी हैं। केरल की साक्षरता दर जहां 94 फीसदी है, वहीं तमिलनाडु इस मामले में उससे 14 फीसदी पीछे है। केरल में स्त्री-पुरुष अनुपात स्त्रियों के पक्ष में झुका है, जबकि तमिलनाडु में पुरुषों की तरफ। केरल में प्रति 1,000 पुरुष पर स्त्रियों की संख्या 1,084 है, जबकि तमिलनाडु में यह 995 है। केरल में 54.5 प्रतिशत हिंदू हैं, जबकि मुस्लिम व ईसाई धर्मावलंबियों की संख्या लगभग बराबर है, वहीं तमिलनाडु की 87 फीसदी आबादी हिंदू है। साफ है, उच्च साक्षरता दर वायरस से जंग में काफी सहायक साबित हुई है। कोरोना महामारी औरतों के मुकाबले मर्दों को अधिक संक्रमित करती दिख रही है, क्योंकि महिलाएं बेहतर सामाजिक आचरण की आदी होती हैं। फिर धार्मिक आबादी के मिले-जुले रूप के कारण भी केरल को सामाजिक विभेद को संभालने में मदद मिल रही है।
केरल की आबादी जहां 3.48 करोड़ है, वहीं तमिलनाडु में 6.8 करोड़ लोग रहते हैं, लेकिन जनसंख्या घनत्व के मामले में दोनों प्रदेशों में काफी अंतर है। तमिलनाडु में जहां प्रति किलोमीटर 555 लोगों की बसावट है, तो वहीं केरल में यह संख्या 859 है। गौर करने वाली बात यह है कि कोविड-19 के प्रसार में जनसंख्या घनत्व एक अहम भूमिका निभाता है, क्योंकि अधिक जनसंख्या घनत्व वाले इलाकों में फिजिकल डिस्टेंसिंग के लिए कम जगह होती है। ऐसे में, विपरीत स्थिति के बावजूद केरल ने शानदार प्रदर्शन किया है। उसकी इस अद्भुत सफलता के क्या कारण हैं? दरअसल, इस प्रदेश ने किफायती व सरल उपायों को अपनाकर बेहतर रोग प्रबंधन के जरिए महामारी को नियंत्रित करने में कामयाबी हासिल की है, और ये उपाय हैं- त्वरित जांच, संक्रमितों व संभावितों की लगातार तलाश, उनका सावधानी के साथ आइसोलेशन और लगातार इलाज। 
एक साल पहले निपाह वायरस से निपटने का अनुभव और सबक भी केरल सरकार के काफी काम आया है और उसने बगैर कोई वक्त गंवाए कोविड-19 के खिलाफ मोर्चा संभाल लिया। देश भर में लॉकडाउन तो 24 मार्च को घोषित किया गया था, लेकिन केरल ने फरवरी में ही अपने कई जिलों में इसे लागू कर दिया था। शुरुआती दिनों में देश के कुल संक्रमित मरीजों का पांचवां हिस्सा अकेले केरल से था, लेकिन बीते 8 मार्च तक वहां 505 लोग इससे संक्रमित पाए गए थे, जिनमें से 485 तो ठीक होकर अपने घर भी लौट चुके हैं। चार रोगियों की मौत हुई है।
केरल के उलट तमिलनाडु में इसी अवधि में 6,535 लोग वायरस से संक्रमित हुए, जिनमें से 1,824 को अस्पतालों से छुट्टी मिली है, जबकि 44 लोगों को जान गंवानी पड़ी। फिर मई के पहले हफ्ते में तमिलनाडु में लगभग रोज ही 500 नए मरीज बढ़ते पाए गए। आखिर ऐसा कैसे हुआ, क्योंकि इसने भी शुरुआत में अच्छा प्रदर्शन किया था? तमिलनाडु में संक्रमण के आरंभिक तमाम मामले तबलीगी जमात से जुडे़ थे। लिहाजा दिल्ली से लौटे इसके प्रतिनिधियों की पहचान और जांच आसानी से हो गई और पुष्ट मामलों में आइसोलेशन व इलाज का काम भी सरलता से निपट गया। इस कामयाबी से प्रेरित मुख्यमंत्री ने राज्य के जल्द ही ‘शून्य’ मामले वाला प्रदेश बनने का एलान कर दिया। लेकिन मुख्यमंत्री की नाक के नीचे राजधानी में ही हालात बदतर होते गए। राज्य के कई जिले जब ग्रीन जोन में तब्दील हो रहे थे, तब चेन्नई के बीचोबीच का इलाका हॉटस्पॉट बनकर उभर आया। यह महानगर का सब्जी व मीट-मछली का थोक बाजार वाला इलाका है। राज्य सरकार फिजिकल डिस्टेंसिंग का लगातार प्रचार करती रही है, पर इस बाजार की उसने सख्त निगरानी नहीं की। इसलिए संक्रमितों में एक बड़ी संख्या इस बाजार में आने वालों की है। चूंकि यह थोक बाजार है, यहां आने वाले भिन्न इलाकों में वायरस ले गए।
बहरहाल, प्रभावशाली प्रबंधन के अलावा केरल अपनी जन्मजात शक्तियों के कारण भी भाग्यशाली साबित हुआ है। यहां तक कि 1911 में भी, जब इसके इलाके कोचीन और त्रावणकोर रजवाड़ों द्वारा शासित थे, यहां का स्वास्थ्य-ढांचा काफी अच्छा था, और फिर केरल में विकेंद्रित पंचायती राज व्यवस्था भी काफी अच्छी तरह से लागू है। यही कारण है कि जो लोग आइसोलेशन या क्वारंटीन में थे, उनके घर तक प्रशासन ने तमाम जरूरी चीजें मुहैया कराईं।
केरल की नई चुनौती विदेश में रह रहे इसके नागरिक हैं। लगभग आठ फीसदी केरलवासी बाहरी मुल्कों में रहते हैं, और वे प्रदेश की अर्थव्यस्था के मजबूत स्तंभ रहे हैं। अब खाड़ी के देशों में काम करने वाले राज्य के काफी सारे लोगों की नौकरी जाने का अंदेशा है। वहां से पहला जत्था आ भी चुका है, जिसमें से दो को पिछले हफ्ते कोरोना पॉजिटिव पाया गया था। ऐसे मे, राज्य ने अपने 50 हजार प्रवासियों के लिए व्यवस्था कर ली है। 
लेकिन केरल की इस कामयाबी का सबसे बड़ा कारण यहां के चौकस मतदाता हैं। इस सूबे के नागरिकों ने हमेशा अपने लोकतांत्रिक अधिकारों पर जोर दिया है, उन्होंने राजनीतिक वर्ग को कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। इससे वहां पर एक परिपक्व लोकतंत्र वजूद में आया है। इसीलिए सरकार की तीखी आलोचना के बावजूद संकट के समय में सरकार और विपक्ष एकजुट चेहरा पेश करते हैं। तमिलनाडु समेत देश के किसी भी अन्य सूबे में इसी की कमी दिखती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 12 may 2020