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ओपिनियनदक्षिण में नए मुख्यमंत्रियों की चुनौती

एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकारPublished By: Manish Mishra
Mon, 10 May 2021 11:45 PM
दक्षिण में नए मुख्यमंत्रियों की चुनौती

केरल और तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्रियों के लिए मानो आसमान से गिरे खजूर पर लटके जैसी स्थिति हो गई है। दोनों मुख्यमंत्री (केरल के पी विजयन और तमिलनाडु के एम के स्टालिन) एक मुश्किल चुनाव से गुजरकर आए हैं, लेकिन अपनी जीत का वे एक मिनट भी जश्न नहीं मना सके, क्योंकि उन्हें कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में उतरना पड़ा, जो कहीं अधिक कठिन हो चली है। दोनों मुख्यमंत्रियों ने सादे समारोहों में पद की शपथ ली और लॉकडाउन की घोषणा करते हुए अपने कामकाज में जुट गए। चूंकि अगले हफ्ते दिल्ली सहित देश के उत्तरी हिस्से में इस महामारी के चरम पर पहुंचने की आशंका है, इसलिए दोनों मुख्यमंत्रियों को पता है कि कुछ हफ्तों के बाद दक्षिणी राज्यों की बारी भी आ सकती है। दरअसल, पिछले साल तमिलनाडु और केरल में महामारी की चरम स्थिति देश के उत्तरी हिस्सों में कोरोना के शीर्ष पर पहुंचने के दो हफ्ते बाद आई थी। इसीलिए महामारी विशेषज्ञ इस बार भी कुछ ऐसा ही अंदेशा जता रहे हैं और संक्रमण को थामने के लिए कठोर कदम उठाने की सलाह दे रहे हैं। यही कारण है कि दोनों मुख्यमंत्रियों ने सत्ता संभालते ही सबसे पहला काम लॉकडाउन लगाने का किया। इसका मकसद जाहिर तौर पर बीमारी की चरम स्थिति को कुछ समय के लिए टालना है, ताकि अस्पतालों के दबाव को कुछ हद तक कम किया जा सके।

दोनों राज्यों में संक्रमण और मौतें पहले ही रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी हैं। केरल में रविवार को पॉजिटिविटी रेट (जांच की गई कुल संख्या में संक्रमित मरीजों का प्रतिशत) 28.88 फीसदी थी, जबकि तमिलनाडु में 15 प्रतिशत से अधिक। दोनों राज्यों में इस स्थिति की कल्पना नहीं की गई थी। बेशक, अन्य प्रदेशों की तुलना में यहां की स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा बेहतर है, लेकिन अभी संकट इतना गहरा है कि उन्हें भी जूझना ही होगा। हाल के चुनावों में दोनों राज्य शारीरिक दूरी के पालन को लेकर भी निश्चिंत से दिखने लगे थे। पी विजयन तो अपनी वही लड़ाई जारी रखेंगे, जो वह पिछले एक साल से लड़ रहे हैं। उनके पांच साल के पिछले कार्यकाल में दो चक्रवाती तूफान आए थे और दो चिकित्सा आपदा। सबसे पहले निपाह वायरस आया था, जिसे केरल ने बढ़िया से संभाल लिया, लेकिन अब कोरोना वायरस उसे भी हलकान कर रहा है। चूंकि संक्रामक बीमारियों से लड़ने का केरल का अपना अनुभव है, इसलिए जब 31 जनवरी, 2020 को यहां देश के पहले तीन कोरोना मामले सामने आए, तब इसने शानदार तरीके से काम शुरू किया। इसने संक्रमितों के संपर्क में आए लोगों का पता लगाने, उन्हें एकांतवास में रखने और शारीरिक दूरी जैसे उपाय अपनाए, जो उस वक्त शेष भारत के लिए अनसुने थे। मगर यह सूबा दूसरी लहर से निपटने के लिए संघर्ष कर रहा है। हालांकि, मुख्यमंत्री अपनी दैनिक प्रेस-वार्ता में आश्वस्त दिखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कुछ जिलों में संक्रमण काफी अधिक है। एर्णाकुलम, त्रिशूर और तिरुवनंतपुरम के प्रभावित जिलों में तो ऑक्सीजन बेड शत-प्रतिशत भर चुके हैं। केरल में उत्तरी राज्यों जैसे हालात बन रहे हैं, जो वाकई चिंतनीय है। जैसे, पठानमथिट्टा जिले में एक 38 वर्षीय युवक और त्रिशूर में 66 वर्षीया महिला की इसलिए मौत हो गई, क्योंकि उन्हें आईसीयू बेड नहीं मिल सका। इससे पूरे राज्य में खतरे की घंटी बज गई है। इसी तरह, राज्य के शवदाह-गृहों पर भी दबाव बढ़ गया है। बेशक यहां बुनियादी ढांचा मौजूद है, लेकिन वह समान रूप से सभी जगह पर उपलब्ध नहीं है। ऐसे में, अब उन सभी जगहों पर फौरन बुनियादी ढांचा खड़ा करने की चुनौती है, जहां संक्रमण फैल रहा है। इसी के साथ ऑक्सीजन बेड को भी बढ़ाने की दरकार है।

रही बात तमिलनाडु की, तो दशकों से मुख्यमंत्री बनने का सपना देखने वाले स्टालिन सावधानी से अपने कदम बढ़ा रहे हैं, क्योंकि वह जानते हैं कि शुरुआती 100 दिनों का प्रदर्शन और महामारी के प्रबंधन के उनके प्रयासों के आधार पर ही उनके कार्यकाल को सफल या विफल बताया जाएगा। काडर आधारित पार्टी होने के कारण द्रमुक की अपनी समस्याएं हैं। समाज के एक तबके में पार्टी की छवि अच्छी नहीं है और यह माना जाता है कि जब यह सत्ता में आती है, तब राज्य में ‘गुंडागर्दी’ को हवा मिलती है। स्टालिन इस धारणा से परिचित हैं और इसे तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। जिस दिन द्रमुक को चुनावी जीत मिली थी, उसी दिन पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं ने हंगामा किया था और अम्मा कैंटीन को निशाना बनाया था, जिनमें रियायती दरों पर लोगों को खाना मिलता है। ये कैंटीन दिवंगत मुख्यमंत्री जे जयललिता की देन हैं, जो गरीबों में खासा लोकप्रिय है। महामारी के दौरान भी कई लोग इन कैंटीन पर निर्भर हैं। लिहाजा, जब स्टालिन को इन घटनाओं का पता चला, तो उन्होंने तत्काल कार्रवाई की। उन्होंने न सिर्फ निशाना बनाए गए कैंटीन को दुरुस्त करवाया, बल्कि इन घटनाओं में शामिल पार्टी कार्यकर्ताओं को बाहर का रास्ता भी दिखा दिया। स्टालिन ऐसे किसी कदम से भी बचने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे यह संदेश जाए कि वह बदले की कार्रवाई कर रहे हैं, क्योंकि इससे उनके विरोधियों को मदद मिलेगी। फिर, वह उन अधिकारियों को लेकर भी संजीदा हैं, जो महामारी से निपटने में अच्छा काम कर रहे हैं। बेशक उन्होंने चेन्नई नगर निगम के प्रभारी के रूप में एक वरिष्ठ अधिकारी को नियुक्त किया है, लेकिन उन्होंने स्वास्थ्य सचिव को नहीं बदला है, जो महामारी के कुशल प्रबंधन के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने सचिवालय में भी चर्चित और कुशल अधिकारी नियुक्त किए हैं। अपने कार्यकर्ताओं को लिखे पहले खत में उन्होंने स्वच्छ और कुशल प्रशासन का वादा किया है। बहरहाल, स्टालिन एक सजग राजनेता के रूप में जाने जाते हैं। शायद यही कारण है कि वह अन्नाद्रमुक के पिछले शासन को विफल करने के प्रयास से बच रहे हैं। विधानसभा के अंदर एक राजनीतिक लड़ाई लड़ने और अन्नाद्रमुक शासन के खिलाफ जनमत बनाने के बजाय उन्होंने अदालत में जाने का रास्ता चुना है। द्रमुक काडरों के बीच यह चर्चा थी कि यदि उनके पिता एम के करुणानिधि जीवित होते, तो उन्हें कहीं आसानी से सत्ता मिल जाती। स्टालिन इन सबको नजरंदाज करते हुए अपना एक अलग राजनीतिक रास्ता बना रहे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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