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28 अगस्त, 2020|1:16|IST

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घाटी में बदलाव को स्थाई बनाएं

कश्मीर के जमीनी यथार्थ को बदले एक वर्ष हो गया और अब समय है कि हम ठहरकर देखें कि इन 12 महीनों में क्या-क्या बदला है? कुछ बदला भी है या सब कुछ वैसे ही चल रहा है, जैसे राज्य से केंद्र शासित प्रदेश बनने से पहले था? एक फर्क तो यह हुआ कि प्रशासन के मुखिया लेफ्टिनेंट गवर्नर गिरीश चंद्र मुर्मू को बदलकर अनुभवी राजनीतिज्ञ मनोज सिन्हा को उनकी जगह भेज दिया गया है। मुर्मू की नियुक्ति के पीछे के तर्क को ढूंढ़ने में असमर्थ हमें उन्हें हटाने के समय के पीछे के कारण नहीं तलाशने चाहिए। उन्हें उप-राज्यपाल बनाया ही गया था इसलिए कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वासपात्र थे और हटाने का समय भी तभी आया, जब उनको समायोजित करने के लिए एक सम्मानजनक पद भारत सरकार में खाली हो गया। नए उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा की नियुक्ति के कुछ निहितार्थ हो सकते हैं।

श्रीनगर में शीर्ष स्तर पर फेरबदल के थोड़ा पहले राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला का एक इंटरव्यू छपा, जिसमें बहुत सी शिकवा-शिकायतें थीं, पर अनुच्छेद 370 या 35-ए का कोई जिक्र नहीं था। एक महत्वपूर्ण मांग यह थी कि जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस कर दिया जाए। इसमें तो सरकार को भी खास दिक्कत नहीं होनी चाहिए, गृह मंत्री अमित शाह पहले ही कह चुके हैं कि उचित समय पर पूर्ण राज्य का दर्जा लौटा दिया जाएगा। तो क्या वह समय आ गया है? नेशनल कॉन्फ्रेंस आज भी घाटी में एक मजबूत उपस्थिति रखती है और अगर वह अनुच्छेद 370 पर लचीला रुख अपना ले, तो दिल्ली को मुंहमांगी मुराद मिल जाएगी। बहरहाल, देखना यह है कि क्या मनोज सिन्हा इसी मिशन पर भेजे गए हैं, और यदि हां, तो वह किस हद तक सफल होंगे?
पिछले एक वर्ष में कश्मीर में कुछ ऐसा हुआ, जिसकी उम्मीद कम लोगों को थी। 5 अगस्त, 2019 को हुए बडे़ परिवर्तनों के फौरन बाद संयुक्त राष्ट्र की महासभा को संबोधित करते हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपने भावुकतापूर्ण भाषण में यह भविष्यवाणी की थी कि कफ्र्यू हटते ही कश्मीरी नौजवान खुदकुश हमलावरों में तब्दील हो जाएंगे और भारत को उन्हें संभालना मुश्किल होगा। उनकी यह इच्छा गलत साबित हुई। यह जरूर हुआ कि जितने विशाल सशस्त्र बलों और कठोर नियंत्रण से भारत ने किसी बडे़ प्रतिरोध को टाला, उससे उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि पर जरूर असर पड़ा है, पर कश्मीर में पहले भी ऐसी सख्ती होती रही है।

इस बार जो खास हुआ, वह यह कि प्रतिरोध की धार कुंद थी। लोगों ने शुरू में तो घरों से बाहर निकल विरोध करने की कोशिश की, पर धीरे-धीरे उनका जोश ठंडा पड़ने लगा। मुझे इसके पीछे दो कारण नजर आ रहे हैं- एक तो उनके सार्वजनिक समर्थकों के प्रति सरकार का सख्त रुख और दूसरा, कश्मीर पुलिस का बढ़ता हुआ खुफिया तंत्र। पिछले वर्षों में सक्रिय आतंकियों के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियां सख्ती तो दिखाती थीं, मगर उनके सार्वजनिक समर्थकों के खिलाफ  फर्ज अदायगी के लिए कुछ दिनों तक घर में नजरबंद करने के अलावा शायद ही कोई प्रभावी कार्रवाई की जाती थी। इस बार हुर्रियत और दूसरे भारत विरोधी संगठनों से जुडे़ लोगों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की गई है।  

इस एक साल में सबसे निर्णायक रहा जम्मू-कश्मीर पुलिस का प्रदर्शन। पूरी दुनिया का अनुभव बताता है कि नागरिक विद्रोहों से निपटने में सबसे प्रभावी भूमिका समुदाय के भीतर से आए लड़ाके निभाते हैं। इसमें उन तक सीधी पहुंच वाली स्थानीय पुलिस का निर्णायक रोल होता है। भारत में भी इसका अनुभव पंजाब में 1980 और 1990 के दशकों में किया जा चुका है। केपीएस गिल के नेतृत्व में पंजाब पुलिस द्वारा लड़कर ही खालिस्तानी आतंकियों को निर्णायक रूप से हराया जा सका। पिछले एक वर्ष में जितनी बड़ी उपलब्धियां घाटी में सुरक्षा बलों को मिली हैं, उन सब में खुफिया जानकारियों के पदचिह्न स्पष्ट दिखाई देते हैं और यह बिना स्थानीय पुलिस की सक्रिय भागीदारी के संभव नहीं है। कुछ ही महीनों पहले दूसरा पुलवामा होते-होते बचा था, जब एक निर्जन स्थान पर विस्फोटकों से भरी एक कार बरामद कर ली गई थी। यह बरामदगी स्थानीय पुलिस को मिली खुफिया जानकारी पर ही हुई होगी। उसके प्रयासों से ही धीरे-धीरे स्थानीय आतंकियों की सक्रियता की उम्र कम हो रही है।

आवश्यकता है, पिछले एक वर्ष की उपलब्धियों को सुदृढ़ करने की। इसके लिए सबसे जरूरी है, जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली हो। हर कश्मीरी नौजवान आतंकियों का समर्थक नहीं है। उन्हें शिक्षा और रोजगार जैसे बुनियादी अधिकार चाहिए ही चाहिए। घाटी में बहुत कुछ ऐसा भी हुआ है, जिससे हमारी अंतरराष्ट्रीय छवि को ‘डेंट’ लगा है। पिछले दिनों अमेरिकी कांग्रेस द्वारा प्रायोजित एक थिंक टैंक ने अपनी रिपोर्ट में सलाह दी है कि भारत-पाकिस्तान को अटल बिहारी वाजपेयी और परवेज मुशर्रफ के बीच लगभग सहमति तक पहुंचे चार सूत्री फॉर्मूले को पुनर्जीवित करने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। इस थिंक टैंक ने यह भी मानने से इनकार किया है कि कश्मीर सिर्फ भारत का आंतरिक मामला है। इस साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में विजय के प्रबल दावेदार जो बिडेन ने भी लगभग यही लाइन ली है। एक आर्थिक महाशक्ति होने के कारण हम कई इस्लामी मुल्कों समेत दुनिया के बडे़ हिस्से को इस मामले से कुछ दिनों तक दूर तो रख सकते हैं, पर कभी न कभी बातचीत के लिए मेज पर बैठना ही होगा।

इन बारह महीनों जैसी मजबूत स्थिति भारत की कभी नहीं थी। लेकिन यह कब तक रहेगी, कहा नहीं जा सकता। एक खराब घटना सब किए-कराए को मटियामेट कर सकती है। मीर वाइज की हत्या या बुरहान वानी का एनकाउंटर ऐसे ही चंद उदाहरण हैं, जब शांत होती घाटी एकदम से सुलग उठी थी। फिर ऐसा न हो, इसलिए जरूरी है कि भारत सरकार सारे ‘स्टेक होल्डर्स’ को बिठाकर बातचीत का सिलसिला एक बार फिर शुरू करे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 11 august 2020