DA Image
2 अक्तूबर, 2020|10:55|IST

अगली स्टोरी

एक बड़े फैसले के अनेक पहलू 

फैसला नया है, लेकिन कई जरूरी पुरानी यादें ताजा हो गई हैं।16वीं सदी में मुगल बादशाह बाबर के दौर में बनी बाबरी मस्जिद को 6 दिसंबर, 1992 को ढहाने के बाद पूरे देश में सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया था। तब इस घटना के संबंध में दो प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हुई थीं। पहली रिपोर्ट में कारसेवकों को आरोपी बनाया गया था। दूसरी रिपोर्ट में रामकथा पार्क मंच से भाषण दे रहे भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन महासचिव अशोक सिंघल, बजरंग दल के नेता विनय कटियार, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, मुरली मनोहर जोशी, गिरिराज किशोर और विष्णु हरि डालमिया नामजद किए गए थे।
6 दिसंबर, 1992 की घटना से पहले अक्तूबर 1990 में हजारों रामभक्तों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी नीतियों के विरोध में अयोध्या में घुसकर विवादित ढांचे पर भगवा ध्वज फहरा दिया था। इस पर तत्कालीन राज्य सरकार ने कारसेवकों पर गोली चलाने के आदेश दिए थे। इस कार्रवाई के विरुद्ध काफी विरोध प्रदर्शन होने पर मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था।
दो साल बाद 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद  ढहा दी गई। एक अस्थाई श्रीराम मंदिर का निर्माण किया गया। 16 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस की जांच के लिए एमएस लिब्रहान आयोग का गठन हुआ। रामलला की दैनिक सेवा पूजा की अनुमति दिए जाने के संबंध में अधिवक्ता हरिशंकर जैन और इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में याचिका दायर की गई, जिसमें 1 जनवरी, 1993 को रामलला की दैनिक सेवा पूजा की अनुमति प्राप्त हुई। तब से वहां दर्शन-पूजन का क्रम निर्बाध रूप से जारी रहा है। तत्कालीन नरसिंह राव सरकार रामलला की सुरक्षा के लिए लगभग 67 एकड़ जमीन अधिगृहीत करने के संबंध में एक अध्यादेश लेकर आई, जिसे संसद ने 7 जनवरी,1993 को कानून के रूप में मान्यता दे दी। 
इस मामले में एक दिलचस्प मोड़ आया, वर्ष 1993 में, जब तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एक प्रश्न किया कि क्या जिस स्थान पर ढांचा खड़ा था, वहां बाबरी मस्जिद के निर्माण से पहले कोई मंदिर या धार्मिक इमारत थी? इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की पीठ में दो न्यायाधीशों ने कहा था कि इस प्रश्न का उत्तर तो तभी दिया जा सकता है, जब पुरातत्व विभाग एवं इतिहासकारों के विशिष्ट साक्ष्य उपलब्ध हों। इस प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से अपना रुख स्पष्ट करने को कहा। जवाब में तत्कालीन सॉलिसिटर जनरल ने 14 सितंबर,1994 को अदालत में अयोध्या मसले पर सरकार का नजरिया रखा था कि सरकार धर्मनिरपेक्षता और सभी धर्मावलंबियों के साथ समान व्यवहार की नीति पर कायम है। अयोध्या में जमीन अधिग्रहण कानून 1993 और राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष रखा गया प्रश्न भारतीय नागरिकों में भाईचारा बनाए रखने के लिए है।
24 अक्तूबर, 1994 को सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्देशित किया था कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ विवादित स्थल के स्वामित्व का निर्णय करेगी और राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए प्रश्न का जवाब देगी। तीन न्यायमूर्तियों की लखनऊ  खंडपीठ की पूर्ण पीठ ने वर्ष 1995 में मामले की सुनवाई शरू की। लखनऊ   खंडपीठ ने सही तथ्यों का पता लगाने के लिए विवादित स्थल की खुदाई करने के निर्देश दिए। साथ ही, यह भी कहा कि खुदाई में पूरी पारदर्शिता और दोनों समुदायों की मौजूदगी व सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाए। 
जनवरी 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा अपने कार्यालय में एक अयोध्या विभाग गठित किया गया, जिसका काम राम जन्मभूमि विवाद को सुलझाने के लिए दोनों संप्रदायों से बातचीत करना था। वर्ष 2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्देश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में खुदाई की। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का दावा था कि मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष होने के प्रमाण मिले हैं। आखिरकार लंबी जद्दोजहद के बाद नवंबर 2019 में अदालत ने विवादित स्थल के स्वामित्व का फैसला सुना दिया था और अब अयोध्या में शांतिपूर्वक मंदिर एवं मस्जिद का निर्माण जारी है।
इसके बाद सभी को बाबरी विध्वंस मामले पर फैसले का इंतजार था और सीबीआई की विशेष अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 32 आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया है। 28 साल बाद हिन्दुस्तान के एक सबसे बडे़ मुकदमे का न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार निर्णय हुआ है। न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि जितने भी वीडियो कैसेट और फुटेज सीबीआई ने विवेचना के दौरान दिए, वे सीलबंद अवस्था में नहीं थे। किसी भी वीडियो कैसेट और फुटेज को विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजकर यह जांच नहीं कराई गई कि उनके साथ छेड़छाड़ हुई है या नहीं। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 के अस्तित्व में आने के बाद 17 अक्तूबर, 2000 को भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा-3 में संशोधन करते हुए इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों को भी अब साक्ष्य की परिभाषा में शामिल कर लिया गया है, लेकिन विध्वंस से जुड़े फोटो के नेगेटिव साक्ष्य में दाखिल नहीं किए गए थे। इसके कारण ये फोटो भारतीय साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों के तहत साक्ष्य के रूप में नहीं माने गए। इसके अलावा, विशेष अदालत ने यह भी कहा कि समाचार पत्रों/ पत्रिकाओं में छपी खबरें मात्र अनुश्रुत साक्ष्य की श्रेणी में आती हैं, जिनके आधार पर दोष सिद्ध करना विधिपूर्ण नहीं माना जा सकता। 
यह गौर करने वाली बात है कि बाबरी मस्जिद को ढहाने की किसी पूर्व नियोजित योजना को अभियोजन पक्ष न्यायालय में साबित नहीं कर सका। सर्वोच्च न्यायालय पहले कह चुका है कि संदेह कितना भी गहरा क्यों न हो, वह साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकता। साथ ही, आपराधिक षड्यंत्र का भी कोई साक्ष्य नहीं पाया गया। जाहिर है, न्यायालय के निर्णय से सभी पक्षकार संतुष्ट हो जाएं, ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि दोनों पक्षों के विरोधाभासी हित होते हैं। अब इस मामले में सीबीआई अगर महसूस करती है कि पेश किए गए साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों द्वारा अपराध किया जाना साबित हो रहा था, तो वह उच्च न्यायालय में अपील कर सकती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:hindustan opinion column 1 october 2020