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कश्मीर, साजिश और निशाना 

अश्वनी कुमार, वरिष्ठ पत्रकार Naman Dixit
Fri, 08 Oct 2021 11:02 PM
कश्मीर, साजिश और निशाना 

दो साल पहले 19 अक्तूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नासिक के एक भाषण में कहा था कि हम अब ‘नया कश्मीर’ बनाने जा रहे हैं। देश के 130  करोड़ भारतीयों को मिलकर कश्मीर को फिर स्वर्ग बनाना है। हर कश्मीरी को गले लगाना है। जो कश्मीर घाटी रक्त से रंगी हुई है, उसे महरम लगाकर कश्मीर को फिर स्वर्ग बनाना है। इन दिनों तो सब ठीक चल रहा था। कश्मीर घाटी में पर्यटकों की भीड़ थी। हाउस बोट और होटल भरे हुए थे। पर्यटकों की बढ़ती आमद देख लोग अपने घरों को गेस्ट हाउस में बदल रहे थे। पहलगाम, गुलमर्ग और धूधपथरी में होटल भरे हुए थे। पिछले एक सप्ताह से जम्मू-कश्मीर में केंद्रीय मंत्री हर जिला मुख्यालय पर जाकर लोगों की समस्याएं सुनने लगे थे। कश्मीर के आम आदमी को लग रहा था कि घाटी में बदलाव आ रहा है। जो विकास कार्य पिछले 70 साल से नहीं हुए थे, उनमें तेजी से काम चल रहा है।

पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी, इंटर स्टेट इंटेलिजेंस (आईएसआई) और कश्मीर में लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन को यह सब पसंद नहीं। घाटी को फिर लहूलुहान कर दिया गया। पांच दिन में सात निहत्थे नागरिकों को गोलियों का शिकार बनाया गया,जिनमें से चार अल्पसंख्यक समुदाय के हैं। श्रीनगर के ईदगाह इलाके में गवर्नमेंट बॉयज हायर सेकेंडरी स्कूल की प्रिंसिपल सुपिंदर कौर और शिक्षक दीपक चंद का स्कूल में ही कत्ल कर दिया गया। सभी टीचर ऑनलाइन क्लास ले रहे थे। आतंकियों ने सबका परिचय पत्र जांचा, दो गैर-मुस्लिमों को अलग किया और मार दिया। दो दिन पहले एक ही घंटे में आतंकियों ने श्रीनगर के ख्यात दवा विक्रेता माखन लाल बिंद्रू और बिहार के गोलगप्पे बेचने वाले वीरेंजन पासवान की गोली मारकर हत्या कर दी। 
इन हत्याओं का ढर्रा ठीक वैसा ही है, जैसे 1990 में कश्मीरी पंडितों को सड़कों पर व घरों में चुन-चुनकर मारा गया था। जिस तरह से श्रीनगर के पूर्व डिस्ट्रिक्ट व सेशन जज नीलकंठ गंजू की हत्या करण नगर इलाके में खुलेआम सड़क पर की गई थी। उनका शव घंटों सड़क पर पड़ा रहा था। किसी की हिम्मत नहीं पड़ी कि शव को हॉस्पिटल पहुंचा दे, क्योंकि आतंकियों ने धमकी दे रखी थी कि जो भी शव को हाथ लगाएगा, उसका अंजाम गंजू जैसा किया जाएगा। इस बार भी बिहार के गोलगप्पे वाले का शव सड़क पर कुछ समय तक पड़ा रहा।
हालांकि, आज 1990 जैसी स्थिति नहीं है। तब सोशल मीडिया नहीं था। अब खबर आग की तरह फैलती है और कश्मीर की ताजा खबर हर जगह पहुंच गई है। आज देश भर में गुस्सा है। आतंकी कश्मीर में एक बार फिर से दहशत फैलाना चाहते हैं, हालांकि सरकार ने भी कमर कस रखी है। 
दरअसल, इन हत्याओं के कुछ बडे़ कारण हैं, जिन पर गौर करना चाहिए। हाल ही में जम्मू-कश्मीर सरकार ने फैसला लिया है कि विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए छह हजार नौकरियां होंगी और उनके लिए छह हजार फ्लैट भी बनाए जा रहे हैं। फ्लैटों के निर्माण का काम तेजी से चल रहा है और नौकरियों के लिए भर्तियां भी शुरू हो गई हैं, लेकिन यह बात पाकिस्तान को पसंद नहीं कि कश्मीरी पंडितों की घर वापसी हो। 
सरकार ने एक खास वेब पोर्टल बनाया है। जिन कश्मीरी विस्थापितों की जमीन, मकान और दुकान पर गैर-कानूनी तरीके से कब्जा किया गया है, वे दुनिया में कहीं से भी इस वेब पोर्टल पर अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। उल्लेखनीय है कि इसके तहत करीब 1,000 से भी ज्यादा शिकायतें दर्ज हुई हैं। श्रीनगर जिले में ही करीब 700 शिकायतें जिला मजिस्ट्रेट के पास आई हैं और इनमें से लगभग 90 प्रतिशत मामले उन्होंने सुलझा भी दिए हैं। कई लोगों को अपनी संपत्ति वापस मिल गई है। इसी तरह, कई सारे मंदिरों की जमीन पर भूमि माफिया ने कब्जा कर रखा है या फिर उसे बेच दिया है। श्रीनगर के प्रसिद्ध गणपत्यार मंदिर की लगभग180 कनाल जमीन पर भूमि माफिया ने कब्जा कर रखा है। मंदिर का प्रबंधन इस वक्त श्रीनगर में जमीन वापस लेने गया हुआ है, लेकिन ताजा हत्याओं के बाद वह भी सहम गया है। अलगाववादियों और आतंकियों का मकसद भी यही है और वे घाटी में न्याय की हर कोशिश को बाधित करने की साजिश रच रहे हैं। वे नहीं चाहते कि कश्मीर अपने पुराने सद्भावी दौर में लौटे। 
लोग भूले नहीं हैं, सन 1990 में जब कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया गया था। 18 और 19 जनवरी की रात करीब चार लाख कश्मीरी पंडित जम्मू, उधमपुर, दिल्ली, मुंबई, पुणे, बेंगलुरु व पंजाब जाने को मजबूर हो गए थे। तब कश्मीरी अलगाववादियों, राजनेताओं, बुद्धिजीवियों ने अपने बचाव में यह बताया था कि एक सोची-समझी चाल के तहत पूर्व राज्यपाल जगमोहन ने घाटी से अल्पसंख्यकों को यहां से निकाला है, एक बड़ा ऑपरेशन शुरू करना है। लेकिन अब तो जगमोहन इस दुनिया में नहीं हैं। फिर अब क्यों अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है? 
साफ है, आतंकी फिर सीमा पार के इशारे पर 1990 की तरह पलायन कराना चाहते हैं। उन्हें डर है कि अगर कश्मीरी पंडित लौट आते हैं, पर्यटकों की संख्या बढ़ जाती है, और विकास कार्य तेजी से चलते हैं, तो जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो जाएगी, लोकतंत्र की सीधी बहाली हो जाएगी, तो उनके पास कोई मुद्दा नहीं रह जाएगा। आतंकियों के आका को यह मालूम पड़ चुका है कि कश्मीर में वह हार चुका है। उन्हें शायद यह नहीं मालूम कि जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी मुसलमानों के साथ-साथ पंडित, डोगरे, शिया, पहाड़ी, गुज्जर बकरवाल के साथ पंजाबी भी रहते हैं। आज कश्मीर के बमुश्किल 10 प्रतिशत इलाकों में दहशतगर्दी की स्थिति है, बाकी इलाकों में रोजमर्रा की जिंदगी आगे बढ़ चली है। जम्मू में भी शांति है। ऐसे में, कुछ मुट्ठी भर अलगाववादी हैं, जो कश्मीरी अवाम का भयादोहन कर रहे हैं। 
आखिर क्या गलत किया था सिख महिला प्रिंसिपल सुपिंदर कौर ने, जो एक अनाथ  मुस्लिम बच्चे की पढ़ाई का पूरा खर्च उठा रही थीं? स्कूल में पढ़ने वाले गरीब बच्चों को अपने वेतन से किताबें व दवाइयां देती थीं। क्या उन्हें इसलिए मारा गया, क्योंकि उनके स्कूल में तिरंगा लहराया था? आज कश्मीरी अवाम को भी सोचना होगा, यह 1990 नहीं, 2021 है। कब तक चलेगी तबाही, कब तक होगी बेकसूर लोगों की हत्या? 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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