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टीके से जुड़े कई किंतु-परंतु

चंद्रकांत लहारिया, जन नीति और स्वास्थ्य तंत्र विशेषज्ञPublished By: Naman Dixit
Tue, 08 Jun 2021 11:38 PM
टीके से जुड़े कई किंतु-परंतु

कोविड-19 टीका खरीद और आपूर्ति नीति में सरकार ने जो आंशिक बदलाव किए हैं, उनसे यह आशा जगी है कि देश में चल रहा टीकाकरण अभियान अब कुछ हद तक पटरी पर लौट आएगा। चुनौतियों की शुरुआत 1 मई से हुई, जब 18 से 44 उम्र के वयस्कों के लिए टीकाकरण शुरू किया गया। उस दिन से मूल्य-निर्धारण को उदार बनाते हुए एक नई कोविड-19 टीकाकरण नीति लागू की गई। नए आयु-वर्ग को टीकाकरण से जोड़ने से लक्षित आबादी तीन गुना बढ़ गई, जबकि टीके की आपूर्ति पहले जैसी रही। केंद्र, राज्य और निजी क्षेत्र के लिए टीके की तीन अलग-अलग कीमतंर तय की गईं। उत्पादन में से आधे टीकों की खरीद की जिम्मेदारी राज्यों और निजी क्षेत्र को सौंप दी गई। टीका बनाने वाली कंपनियों द्वारा केंद्र, राज्य और निजी क्षेत्र के लिए 50-25-25 प्रतिशत का फॉर्मूला बनाकर टीके की आपूर्ति की जाने लगी। 18 से 44 वर्ष आयु-वर्ग के टीकाकरण के लिए स्लॉट बुक करने हेतु ‘को-विन’ एप पर रजिस्ट्रेशन अनिवार्य बना दिया गया। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और राज्य सरकारों ने फौरन ही नई रणनीति में कई तकनीकी खामियां बताईं। पहला तर्क दिया गया कि दशकों से चल रहे बच्चों के टीकाकरण अभियान से लेकर पोलियो उन्मूलन तक केंद्र सरकार ही हमेशा टीके खरीदती रही है। चूंकि राज्यों को खरीद का कोई अनुभव नहीं है, इसलिए महामारी के मध्य में यह प्रयोग सही नहीं होगा। बाजार आधारित दृष्टिकोण अपनाने और राज्यों को एक-दूसरे से टीके खरीदने में प्रतिस्पद्र्धा करने का मतलब यह था कि केंद्र द्वारा इकट्ठे खरीद की तुलना में टीकों पर कुल सरकारी खर्च करीब तीन गुना बढ़ जाएगा। इससे टीकों की उपलब्धता भी प्रभावित होगी, क्योंकि गरीब प्रदेशों की तुलना में संपन्न राज्य टीकों को अपने लिए कहीं अधिक सुरक्षित रख सकते हैं। इन्हीं सारी वजहों से विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि महामारी में सभी नागरिकों के लिए टीके मुफ्त होने चाहिए और दुनिया के तमाम देशों की तरह भारत में भी टीकों की खरीद की जिम्मेदारी केंद्र सरकार को निभानी चाहिए।
बहरहाल, 1 मई को नई नीति के लागू होते ही टीकाकरण अभियान लगभग बेपटरी हो गया। सभी आयु-वर्ग के लिए टीके की कमी हो गई और अपनी दूसरी खुराक की प्रतीक्षा करने वाले लोगों का इंतजार लंबा होता गया। टीके की आपूर्ति एक बड़ी चुनौती थी। इस चुनौती से पार पाने के लिए करीब 12 राज्यों ने ग्लोबल टेंडर, यानी वैश्विक निविदाएं जारी कीं, पर टीका बनाने वाली कंपनियों की तरफ से उन्हें यही जवाब मिला कि वे केंद्र सरकार से ही खरीद संबंधी समझौता करेंगी। इसके बाद, कई मुख्यमंत्रियों ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर उनके लिए टीके खरीदने और सामान्य दर पर या मुफ्त में उन्हें मुहैया कराने को कहा। नई नीति से निजी अस्पतालों के पास भी जरूरत से अधिक टीके हो गए, जबकि सरकारी अस्पतालों में इसकी कमी हो गई। नतीजतन, टीकाकरण अभियान धीमा पड़ता गया, और कई राज्यों ने 18-44 वर्ष वालों के लिए टीकाकरण बंद कर दिया। ऐसे में, सर्वोच्च न्यायालय ने खुद इस मामले का संज्ञान लिया और टीकाकरण नीति को ‘मनमाना व तर्कहीन’ बताया। ‘को-विन’ पर अनिवार्य रजिस्ट्रेशन भी एक चुनौती थी, जिसने इंटरनेट सुविधा वाले मोबाइल या कंप्यूटर न रखने वाले एक बडे़ तबके को टीकाकरण की पूरी प्रक्रिया से बाहर कर दिया था।
आखिरकार 7 जून को केंद्र ने टीकाकरण नीति में बदलाव किया। अब केंद्र सरकार ही टीके की कुल उपलब्धता का 75 फीसदी हिस्सा खरीदेगी और उसका मूल्य चुकाएगी। राज्यों को टीकाकरण के लिए जिम्मेदार बनाया गया है। सरकारी अस्पतालों में पहले की तरह टीके मुफ्त में मिलेंगे, जबकि निजी अस्पतालों में भी सेवा-शुल्क को अधिकतम 150 रुपये तय कर दिया गया है। हालांकि, ऐसा नहीं है कि मुफ्त टीकाकरण करके सरकार ने कोई उदार रवैया दिखाया है। भारत में हमेशा से सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में टीकाकरण सहित सभी रोग-निरोधी स्वास्थ्य सुविधाएं नि:शुल्क रही हैं। इसीलिए, केंद्र का मुफ्त में कोविड-19 टीकाकरण का दावा गले नहीं उतरता। अतीत की तरह इस बार भी उसने टीकाकरण की अपनी जिम्मेदारी ही स्वीकार की है। इस समय देश में सक्रिय कोविड-19 टीकाकरण केंद्रों की कुल संख्या में निजी क्षेत्र की भागीदारी महज चार फीसदी है, जबकि उसे 25 फीसदी टीका आवंटित किया गया है। इस वजह से निजी केंद्रों पर टीकाकरण की उपलब्धता जरूरत से अधिक है और सरकारी केंद्रों पर लोग टीकों के लिए भटक रहे हैं। चूंकि आने वाले हफ्तों में टीके का उत्पादन बढ़ने की पूरी संभावना है, इसलिए अच्छी रणनीति यही होगी कि सभी टीकाकरण केंद्रों के अनुपात के अनुसार (लगभग पांच प्रतिशत) निजी क्षेत्र को टीके आवंटित किए जाएं। ऐसा करने पर सरकारी  केंद्रों पर टीके की उपलब्धता और रफ्तार, दोनों में पर्याप्त सुधार आ सकता है। दुनिया भर के तमाम देशों में लोगों को कोविड टीके के लिए एक पैसा भी नहीं देना पड़ता, चाहे वे निजी केंद्र से ही क्यों न अपने टीके लगवाएं। अगर भारत भी अपने अभियान को वास्तव में मुफ्त कहना चाहता है, तो इसे भी वही रणनीति अपनानी चाहिए। केंद्र सरकार को टीका बनाने वाली कंपनियों से शत-प्रतिशत खरीदारी करने और निजी क्षेत्र के साथ उसे साझा करने के बारे में भी सोचना चाहिए (जैसा कि जनवरी से अप्रैल तक किया गया था), साथ ही, निजी केंद्रों के सेवा-शुल्क का भुगतान भी आम लोगों के बजाय सरकार करे, तभी ये टीके वास्तव में नि:शुल्क कहे जा सकेंगे। बेशक टीके की आपूर्ति और नीतियों से जुडे़ कुछ मसलों को हल कर दिया गया है, लेकिन यह समय केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा टीके के वितरण और टीकाकरण की प्रक्रियागत दिक्कतों को दूर करने का भी है। हमें अपने देश में अगले छह-आठ महीने के लिए कोविड-19 टीकाकरण का एक विस्तृत रोडमैप बनाना होगा और टीके की आपूर्ति-शृंखला को भी दुरुस्त करना होगा। वैक्सीन की कमी से निपटने के लिए साक्ष्य-आधारित संचार रणनीति बनाने और उसे लागू करने की जरूरत है। टीकाकरण नीति में बदलाव सही दिशा में उठाया गया कदम है, लेकिन अब भी काफी कुछ किया जाना शेष है। सरकारों को यह सुनिश्चित करना ही होगा कि बिना किसी मुश्किल के हर नागरिक को टीका लग पाए। भारत ऐसा पहले कर पाया है, इस बार भी जरूर कर पाएगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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