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तमिल राजनीति और एक वीरान टापू

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के एक प्रमुख अखबार ने अपने 31 मार्च के संस्करण में बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा सन् 1974 में कच्चातिवु नामक द्वीप श्रीलंका को सौंपने का मसला लोकसभा...

तमिल राजनीति और एक वीरान टापू
Monika Minalएस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकारMon, 08 Apr 2024 11:21 PM
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राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के एक प्रमुख अखबार ने अपने 31 मार्च के संस्करण में बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा सन् 1974 में कच्चातिवु नामक द्वीप श्रीलंका को सौंपने का मसला लोकसभा चुनावों में तमिलनाडु में बड़ा मुद्दा बन सकता है। तमिलनाडु के भाजपा अध्यक्ष के अन्नामलाई से मिले दस्तावेज के आधार पर तैयार रिपोर्ट कहती है कि भारत ने श्रीलंका की हठधर्मिता को स्वीकार कर लिया और वर्षों तक दावा जताने के बाद कच्चातिवु श्रीलंका के हवाले कर दिया। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से दो ट्वीट किए गए। पहले में कांग्रेस पर हमला बोला गया और कहा गया, नए तथ्यों से पता चलता है कि कांग्रेस ने कितनी बेरहमी से कच्चातिवु श्रीलंका को दे दिया। ट्वीट में आगे लिखा गया है, कांग्रेस पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह भारत की एकता और अखंडता को कमजोर करती रही है। दूसरे ट्वीट में द्रमुक सरकार को घेरा गया और कहा गया कि इसने द्रमुक के दोहरे मानदंडों को बेपरदा किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री एम करुणानिधि को भारत सरकार के इस फैसले की पूरी जानकारी थी। 
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी कहा कि तमिलनाडु के लोगों को तत्कालीन दोनों सरकारों ने गुमराह किया। उन्होंने पत्रकारों को यह मामला समझाने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की। जाहिर है, राष्ट्रीय समाचारों में यह मुद्दा जल्द ही सुर्खियों में आ गया। हालांकि, तमिलनाडु के समाचार चैनलों ने इस खबर को संतुलित बनाने के लिए राज्य के कांग्रेस व द्रमुक नेताओं की प्रतिक्रियाएं भी दिखाईं। भाजपा नेता इस बात को लेकर भी मुखर थे कि कैसे तमिलनाडु के गरीब मछुआरों के हितों से समझौता किया गया। जाहिर है, इस मुद्दे को हवा देने का मूल कारण तमिलनाडु के मतदाताओं, खासकर तटीय इलाकों में रहने वाले मछुआरों को अपनी ओर आकर्षित करना है। 
कच्चातिवु अतीत में तमिलनाडु में एक भावनात्मक मुद्दा रहा है। रामेश्वरम के मछुआरों ने द्वीप के पास मछली पकड़ने संबंधी अधिकार और अपने जाल सुखाने व नावों की मरम्मत की सुविधा की मांग की थी। यह मुद्दा 1980 और 1990 के दशक में सूबाई राजनीति में अक्सर उठता रहा, जिसमें द्रमुक और अन्नाद्रमुक एक-दूसरे पर मछुआरों के अधिकारों को खत्म करने का आरोप लगाते रहे। पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता ने केंद्र को पत्र लिखकर कहा भी था कि इस द्वीप को श्रीलंका से वापस ले लिया जाना चाहिए।
मगर बीते एक दशक से अधिक वक्त से यह कोई मुद्दा नहीं रहा था, क्योंकि मछुआरों के पास अब बेहतर संचार सुविधा और उन्नत नावें आ गई हैं। वे अब कच्चातिवु के आसपास नहीं जाते, जहां उनके मछली पकड़ने पर प्रतिबंध है। इसके बजाय वे अब गहरे पानी में चले जाते हैं, यहां तक कि श्रीलंकाई तटों के करीब भी पहुंच जाते हैं और वहां के सुरक्षा बलों की नाराजगी मोल लेते हैं। दुर्भाग्यवश, मछुआरों की गिरफ्तारी, भारतीय नौकाओं की जब्ती और भारतीय मछुआरों पर गोलीबारी की नौबत आ जाती है, जिनसे दोनों पड़ोसी देशों में तनाव भी पैदा होता रहा है।
अजीब बात है, तमिलनाडु में मछुआरों का मुद्दा और श्रीलंकाई तमिलों के कत्लेआम भावनात्मक मुद्दे रहे हैं, लेकिन इनका कभी भी राज्य या राष्ट्रीय चुनावों पर कोई असर नहीं पड़ा। फिर भी, यह मुद्दा अनवरत राजनीतिक विमर्श में बना रहा है। वास्तव में, जो दल सिर्फ श्रीलंकाई मसले या मछुआरों के मुद्दों पर अपना जोर लगाते हैं, वे लोगों में अपनी जगह बनाने में विफल ही साबित हुए हैं।
यही कारण है कि तमिलनाडु का एक बड़ा तबका हैरान है कि भाजपा ने आखिर इस मुद्दे को अभी क्यों उठाया, क्योंकि इसका मकसद कांग्रेस और उसके क्षेत्रीय सहयोगी द्रमुक को घेरने के अलावा दूसरा कारण नहीं दिखता। भाजपा यही बताने का प्रयास कर रही है कि विपक्षी गठबंधन किस तरह से देश के राष्ट्रीय हितों से समझौता कर चुका है। भाजपा की नजर कन्याकुमारी, थूथुकुडी, नागरकोइल व रामनाथपुरम जैसे तटीय क्षेत्रों की लोकसभा सीटों पर है, जहां उसे लगता है, मछुआरों का मुद्दा प्रभावी साबित होगा।
अगर इस मामले पर नजर डालें, तो करीब 1.9 वर्ग किलोमीटर का यह द्वीप भारत और सीलोन के बीच ब्रिटिश कब्जे से मुक्त होने से बहुत पहले विवादित था। चूंकि ब्रिटिश हुकूमत इस मसले का हल नहीं निकाल सकी, इसलिए उसने दोनों पक्षों के मछुआरों को द्वीप पर जाने की अनुमति दे दी। इसीलिए, कच्चातिवु कभी भी भारत का हिस्सा नहीं था। आजादी के बाद जब यह मुद्दा फिर से उठा, तो 1974 में लंबी चर्चा के बाद भारत और श्रीलंका के बीच अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा खींच दी गई और भारत ने इस द्वीप पर अपना दावा छोड़ दिया। इसमें दोनों पक्षों द्वारा वहां मछली पकड़ने का समझौता हुआ। साल 1976 में दोनों देशों के बीच विशेष आर्थिक क्षेत्र बना, जिसकी वजह से भारत ने मछली पकड़ने का अपना अधिकार वापस ले लिया। वास्तव में, भारत ने कन्याकुमारी की ओर से ‘वाड्ज बैंक’ के लिए सौदेबाजी की। चूंकि श्रीलंका को कच्चातिवु मिल गया, इसलिए उसने इस पर कोई दावा नहीं किया। नतीजतन, भारत को समुद्र में अपेक्षाकृत बड़ा हिस्सा मिला, जो विविधता के मामले में समृद्ध है और यहां मछली भी खूब है। कुछ पर्यवेक्षक तो इसके लिए इंदिरा गांधी की सराहना करते हैं, क्योंकि यह इलाका तेल व खनिज संसाधनों से भी समृद्ध है। 
चूंकि कच्चातिवु द्रमुक और अन्नाद्रमुक, दोनों के लिए विवादास्पद है, इसलिए वे दोनों दल एक-दूसरे पर आरोप उछालकर और केंद्र को भी घेरे में लेकर तटीय इलाकों के मतदाताओं को लुभाना चाहते हैं। अभी यही सब हो रहा है। ‘वाड्ज बैंक’ कोई द्वीप नहीं है, बल्कि इको सिस्टम के लिए एक सामान्य शब्द है। दुनिया में ऐसे 20 वाड्ज बैंक हैं। भारत सरकार ने हाल ही में यहां तेल की खोज की प्रक्रिया शुरू करने का प्रयास किया था, लेकिन मछुआरों के विरोध के कारण इसे स्थगित कर दिया गया, क्योंकि उनको डर है कि इससे यहां के पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंच सकता है। 
बेशक, इस पूरे मसले में कोई कांग्रेस पर शक कर सकता है या इंदिरा गांधी को विवादों में घसीट सकता है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि वह इंदिरा गांधी ही थीं, जिन्होंने बांग्लादेश को आजाद कराया और सिक्किम का विलय भारत में कराया था।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)