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दक्षिण में मजबूत होता क्षेत्रवाद

एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकारPublished By: Naman Dixit
Mon, 07 Jun 2021 11:33 PM
दक्षिण में मजबूत होता क्षेत्रवाद

तमिलनाडु और केरल में क्षेत्रीय दावे उभार पर हैं। राज्यों के हक-हुकूक की आवाज बुलंद करने की तात्कालिक वजहें तमिलनाडु में ए के स्टालिन के नेतृत्व वाले द्रमुक गठबंधन की ताजपोशी और केरल में पी विजयन की अगुवाई वाले वाम मोर्चे की वापसी हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी की जबर्दस्त जीत ने भी इस भावना को मजबूत किया है। राजनीतिक मोर्चे की बात करें, तो द्रमुक की जीत द्रविड़ विचारधारा की मजबूती का प्रतीक मानी जा रही है। कई मायने में इसे उप-राष्ट्रवाद के उदय के रूप में देखा जा रहा है या फिर केंद्र सरकार के आक्रामक-राष्ट्रवाद का राज्य की जनता द्वारा दिए गए जवाब के रूप में। यहां तक कि केरल में वाम मोर्चा ने भी चुनावों से पहले अपनी सांस्कृतिक पहचान को मजबूती से सामने रखा। मसलन, अपने प्रेस-कॉन्फ्रेंस और सार्वजनिक भाषणों में पी विजयन बार-बार ‘ई नाडु’ दोहराते रहे, जिसका अर्थ है केरल की यह भूमि। इसका मकसद राज्य की सामाजिक व ऐतिहासिक विशिष्टता पर जोर देना और खुद को दूसरे सूबों से अलग हैसियत में दिखाना था कि लोग कैसे उनके शासन में शांतिपूर्वक जीवन बिता रहे हैं।
इस बात के कई कारण हैं कि दोनों राज्य दूसरों की तुलना में खुद को अलग देखते हैं। इसकी मूल वजह स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सामाजिक संकेतकों में अर्जित उनकी उपलब्धियां हैं। नीति आयोग द्वारा 2020 के लिए जारी किए गए सतत विकास लक्ष्यों में इन राज्यों को ऊपर रखा गया है। जहां तक समग्र रैंकिंग का मामला है, तो केरल को सर्वोच्च और तमिलनाडु को दूसरा स्थान मिला है। इतना ही नहीं, सूचकांक बताता है कि तमिलनाडु में गरीबी नहीं है, जबकि पड़ोसी राज्य केरल भुखमरी से जीत चुका है।गरीबी में जीने वाले सभी उम्र के स्त्री-पुरुषों व बच्चों के अनुपात को सभी आयामों में कम से कम आधा करने का मकसद वैश्विक सतत विकास लक्ष्य में रखा गया है। आंकड़े बताते हैं कि तमिलनाडु ने यह लक्ष्य हासिल कर लिया है। इसी तरह, इसने स्वास्थ्य योजना कवरेज में 64 और मनरेगा लक्ष्य में 94 प्रतिशत अंक हासिल किए हैं। हालांकि, नीति आयोग ने आय और व्यय में असमानता को मापने वाले प्रमुख संकेतक को शामिल नहीं किया है, फिर भी, ये दोनों राज्य अन्य सूबों से काफी आगे हैं। अब दोनों राज्यों की आशंका यह है कि अगर उन्हें राजस्व में पर्याप्त हिस्सा नहीं मिलता है, तो साल 2020 का उनका प्रदर्शन कमतर हो सकता है, क्योंकि वे भी महामारी से बुरी तरह प्रभावित हैं। सत्ता गंवाने वाली अन्नाद्रमुक सरकार पर अतीत में जब कभी केंद्र के इशारे पर चलने का आरोप लगा, तब वह यह कहते हुए पलटवार करती थी कि केंद्र के साथ मिलकर काम करना वास्तव में फायदेमंद है। तब उसके द्वारा इस बात पर जोर दिया जाता था कि केंद्र के साथ (दूसरे शब्दों में भाजपा गठबंधन के साथ) रहने पर राज्य को व्यापार के लिहाज से फायदा मिलेगा। भाजपा के करीबी कारोबारी समूहों की सफलता से ऐसी धारणा बनी है। मगर सत्ता संभालने के तुरंत बाद द्रमुक गठबंधन ने कई तरह से क्षेत्रीय उम्मीदों की वकालत करनी शुरू कर दी। राज्य के नव-नियुक्त वित्त मंत्री पी टी राजन ने तो जीएसटी परिषद की बैठक में केंद्र को याद दिलाते हुए यह  कहा कि ‘राज्यों के बिना कोई संघ नहीं होता’। उन्होंने महामारी के समय केंद्र से सांविधानिक दायित्वों के तहत राज्यों की उदारतापूर्वक मदद करने को कहा। वास्तव में, तमिलनाडु में विवाद तब पैदा हुआ, जब राज्य ने आधिकारिक बयानों में ‘केंद्र या केंद्र सरकार’ जैसे शब्दों से परहेज बरतते हुए ‘संघ सरकार’ कहना शुरू किया, ताकि इस बात पर जोर दिया जा सके कि भारत राज्यों का संघ है और केंद्र भी जवाबदेह है। और, जैसा कि अब तक कहा जाता है, केंद्र ही सर्वशक्तिमान नहीं है। बेशक इससे ऐसा लग सकता है कि राज्य नेतृत्व शब्दों की बाजीगरी कर रहा है, पर इसका मकसद यह बताना था कि केंद्र भी अपने कार्यों के लिए जिम्मेदार है। उल्लेखनीय है कि केरल और तमिलनाडु, दोनों इस बात पर जोर देते रहे हैं कि केंद्र राज्यों के लिए टीके खरीदे और इनका वितरण राज्यों पर छोड़ दे। विजयन ने तो सभी गैर-भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर यह कहा था। इसलिए, दोनों राज्य कामकाज में स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं और केंद्रीकरण का विरोध कर रहे हैं, पर जहां उन्हें लगता है कि केंद्र के सहयोग से समग्र दक्षता में वृद्धि होगी, वहां वे मदद की मांग भी कर रहे हैं। खैर, केंद्र सरकार अब टीका स्वयं खरीदने और राज्यों को मुफ्त देने के लिए तैयार हो गई है। दक्षिण के दोनों राज्य अब बार-बार इस ओर भी इशारा कर रहे हैं कि सामाजिक-आर्थिक संकेतकों में उनका बेहतर प्रदर्शन बताता है कि दोनों सूबों में राजनीतिक और नीतिगत ढांचा बेहतर है। उन्हें डर अब यह है कि भाजपा की ‘एक राष्ट्र-एक कर, एक बाजार और एक राशन’ जैसी पहल केंद्रीकरण को बढ़ावा देने की कोशिश है और सुशासन पर ध्यान देने के बजाय ये कवायदें केंद्र को अधिक शक्ति दे रही हैं। आर्थिक मसलों के अलावा दोनों राज्यों को यह भी लगता है कि इन दिनों उनकी सांस्कृतिक पहचान पर चोट की जा रही है। जैसे, केरल में एक तबके का मानना है कि उप-राज्यपाल द्वारा पड़ोसी लक्षद्वीप में जो कुछ किया जा रहा है, वह मूल बाशिंदों और द्वीपवासियों के आपसी सांस्कृतिक रिश्तों को कमजोर करेगा। तमिनलाडु में भी भाषा नीति, विशेष रूप से नई शिक्षा नीति में बदलाव, केंद्रीय सेवाओं में भर्ती और निर्देशक या चेतावनी संकेतकों में हिंदी के उपयोग को इन राज्यों की अनूठी संस्कृति व पहचान को बिगाड़ने के केंद्रीय प्रयासों के रूप में देखा जाता है। यही वजह है कि संघवाद ऐसा पसंदीदा शब्द बन गया है, जो इन दोनों राज्यों के शब्दकोश में लौट आया है। आने वाले दिनों में इसके अधिक इस्तेमाल होने की ही संभावना है, क्योंकि पी विजयन और स्टालिन अपना कद मजबूत करना चाहते हैं। राजनीतिक रूप से उन्हें यह लगता है कि एक मुखर राजनीति से ही उन्हें लाभ मिल सकेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

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