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महंगाई से जारी जंग में हमारी मजबूती 

महंगाई की मार आसानी से पीछा छोड़ती नजर नहीं आ रही है। साल 2024 की शुरुआत में एक बार फिर यूं लगने लगा है कि भारत ही नहीं, दुनिया की करीब-करीब सारी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं इस साल भी महंगाई की चुनौती से...

महंगाई से जारी जंग में हमारी मजबूती 
Pankaj Tomarआलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकारSun, 07 Jan 2024 11:45 PM
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महंगाई की मार आसानी से पीछा छोड़ती नजर नहीं आ रही है। साल 2024 की शुरुआत में एक बार फिर यूं लगने लगा है कि भारत ही नहीं, दुनिया की करीब-करीब सारी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं इस साल भी महंगाई की चुनौती से जूझती ही दिखेंगी। भारत के लिए यह बड़ी चिंता का कारण बन सकती है, क्योंकि अब तो इस बात में कोई शक नहीं रह गया है कि आर्थिक मोर्चे पर 2023 भारत के लिए एक अच्छा साल रहा। इसके बाद 2024 से उम्मीदें बढ़ना स्वाभाविक है। 
मुश्किल हालात से जूझती दुनिया में भारत एक प्रकाश पुंज की तरह उभरकर आया, तो यह उम्मीद बेजा भी नहीं है। आम चुनाव भी बहुत दूर नहीं हैं। ऐसे में, स्वाभाविक है, सरकार और सत्ताधारी पार्टी विकास की गाड़ी को पूरी गति से दौड़ाकर दिखाना चाहेगी। राजनीति को अलग रख दें, तो देश में कौन होगा, जो भला ऐसा नहीं चाहेगा? इसीलिए विशेषज्ञ यह हिसाब जोड़ने में जुटे हैं कि वे कौन से कारक हैं, जो इस सपने को असलियत में बदलने का आधार देते हैं। सबसे बड़ा आधार तो पिछले साल की विकास दर है। लंबी कसरत और सरकार की तरफ से बुनियादी ढांचे में भारी निवेश के बाद अब उसका नतीजा भी दिख रहा है। निजी क्षेत्र की तरफ से नए कारखानों और मशीनों में पैसा लगाने की रफ्तार सरकार के मुकाबले तेज हो गई है। ‘सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी’ यानी सीएमआइई के मुताबिक, पिछले साल के आखिरी तीन महीनों में 2.10 लाख करोड़ रुपये के नए प्रोजेक्ट्स का एलान हुआ है, जो पिछली तिमाही से 15 प्रतिशत ज्यादा था। हालांकि, यह आंकड़ा पिछले साल की इसी तिमाही के मुकाबले काफी कम है, पर दो तिमाही की नरमी के बाद यह माहौल में फिर उत्साह बढ़ने का संकेत है। खास बात यह है कि जहां सरकारी निवेश में 60 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दिखती है, वहीं निजी क्षेत्र का निवेश उससे कुछ ज्यादा का उछाल दिखा रहा है। शेयर बाजार में निवेशक जैसा उत्साह दिखा रहे हैं, उससे भी शायद निजी कंपनियों को हौसला मिल रहा है कि नए निवेश के लिए उन्हें पैसा जुटाने में मुश्किल नहीं होगी। बावजूद इसके कि रिजर्व बैंक ब्याज दरों को दिशा दिखाने वाले पॉलिसी रेट को चार प्रतिशत से बढ़ाकर दस महीनों में साढ़े छह प्रतिशत तक पहुंचा चुका है। कंपनियों के लिए ब्याज पर कर्ज लेना महंगा होता जा रहा है। बाजार में महंगाई पर काबू पाने के लिए रिजर्व बैंक को ब्याज दरें बढ़ानी ही पड़ती हैं। उसका असर केवल बड़ी कंपनियों को ही नहीं, बल्कि घर, कार या दूसरी जरूरतों के लिए कर्ज लेने वाले आम लोगों पर भी पड़ता है, जिनकी ईएमआई तुरंत बढ़ जाती है। हालांकि, दूसरी तरफ, जमा रकम पर ब्याज बढ़ाने में बैंक काफी वक्त लगाते हैं। डिपॉजिट की कमी से जूझ रहे कुछ छोटे-मंझोले निजी बैंक तो काफी तेजी से दरें बढ़ाकर ग्राहकों को खींचने की कोशिश करते हैं, पर बड़े बैंकों के ग्राहकों को इसके लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। हालांकि, अब लगता है कि रिजर्व बैंक की सख्ती रंग दिखा रही है, क्योंकि दिसंबर के अंत में स्टेट बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा जैसे बड़े बैंकों ने भी एफडी पर ब्याज दरों में 0.1 प्रतिशत से 1.25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी का एलान किया है। 
हालांकि, महंगाई पर सरकार और रिजर्व बैंक के नजरिये से देखें, तो वहां भी 2023 एक अच्छी जमीन छोड़ गया है। साल की शुरुआत में महंगाई का आंकड़ा 6.52 प्रतिशत पर था और जुलाई में यह 7.44 प्रतिशत तक पहुंच गया। तब तक ज्यादातर विशेषज्ञ मानने लगे थे कि शायद रिजर्व बैंक अब महंगाई को चार प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य छोड़ चुका है। वह इसे बर्दाश्त की ऊपरी सीमा यानी छह प्रतिशत तक पहुंचाकर ही संतुष्ट रहेगा, ताकि ग्रोथ पर भी बुरा असर न पड़े। 
लेकिन रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने पिछले दिनों कई बार यह बात साफ-साफ कही है कि उनका लक्ष्य महंगाई दर को चार प्रतिशत पर पहुंचाना ही है और ऐसा होने तक वह हार नहीं मानेंगे। जाहिर है, आरबीआई के गवर्नर का यह रुख आम आदमी के लिए राहत की खबर है। इसके बावजूद यह बात ध्यान में रखना भी जरूरी है कि महंगाई रोकने के लिए ब्याज दरें बढ़ानी पड़ती हैं और उसके बाद ब्याज कम करने का फैसला भी आसान नहीं होता। दरअसल, विकास और महंगाई के बीच तालमेल बैठाना बहुत विकट काम है।
मामला इस बात से और पेचीदा हो जाता है कि ब्याज दरों का फैसला करते वक्त रिजर्व बैंक को न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया का हाल देखना होता है। मसलन, इस वक्त अमेरिका का केंद्रीय बैंक ब्याज दरें घटाता है या नहीं, और घटाता है, तो कब और कितना, इसका सीधा असर भारत के बाजार पर भी पड़ेगा और इसीलिए रिजर्व बैंक को भी इसी हिसाब से कदम उठाना पड़ेगा। 
हालांकि, सिद्धांत में विकास की जिम्मेदारी सरकार की है और महंगाई रोकना रिजर्व बैंक का काम है, पर इन दोनों को ही एक-दूसरे का ख्याल रखना होता है। रिजर्व बैंक महंगाई रोकने के लिए विकास को ठप करने का जोखिम नहीं ले सकता और सरकार अगर विकास तेज करने के चक्कर में कुछ ऐसा कर बैठी, जिससे महंगाई बेकाबू हो जाए, तो उसका खमियाजा उसे चुनाव में भुगतना पड़ सकता है। 
अब लोकसभा चुनाव सामने हैं, इसलिए भी महंगाई पर काबू रखना जरूरी है। हालांकि, सरकार पिछले दिनों कई ऐसे कदम उठा चुकी है, जिससे उपभोक्ता को राहत मिल सके। खासकर खाने-पीने की चीजों की महंगाई रोकने के लिए। चीनी के दाम थामने के लिए इथेनॉल उत्पादन पर लगाम कसने का फैसला हो या पीली मटर के ड्यूटी फ्री आयात की इजाजत। सूत्रों के हवाले से ताजा खबर आई है कि महंगाई थामने के लिए सरकार पांच लाख टन चावल सस्ते भाव पर बाजार में उतारने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। इसे भारत चावल का नाम दिया जा सकता है। प्रस्ताव के मुताबिक, सरकारी एजेंसियां बाजार भाव से काफी कम दाम पर इसे बेचेंगी और घाटे की भरपाई सरकार करेगी। निस्संदेह, आम उपभोक्ता के लिए तो यह खुशखबरी है। चुनाव आते-आते ऐसी कुछ और खुशखबरियां भी आ सकती हैं। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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