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आज भी साकार रामलीला परंपरा

राममोहन पाठक, पूर्व कुलपति, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई Naman Dixit
Thu, 07 Oct 2021 12:05 AM
आज भी साकार रामलीला परंपरा

शरद ऋतु को लीला काल माना गया है। ‘रघुबर की सुधि’ को जीवंत करती रामलीला हो या श्रीकृष्ण के प्रेम-भक्ति भाव की प्रतीक कृष्णलीला इनका काल शरद ऋतु का काल है। श्रीमद्भागवत  में वर्णित है, भगवानपिता रात्रि: शरदोत्फुल्ल मल्लिका, वीक्ष्यरन्तुं मनश्चक्रे परमानंद माधवम्।  शरद ऋतु के इसी काल को तुलसी ने वर्षा विगत शरद ऋतु आई कहकर जीवन के उल्लास से जोड़ा है। 

वर्तमान डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक संचार एवं मनोरंजन युग में भी लोकधर्मी उत्सव के रूप मं् रामलीला का आकर्षण यद्यपि बरकरार है, पर रामलीलाओं के अस्तित्व पर नए प्रश्नचिन्ह उद्वेलित करने वाले हैं। कोविड-19 के दो दौर या लहरें रामलीलाओं के सामाजिक-धार्मिक जन आयोजन के लिए घातक सिद्ध हुईं। रामलीलाएं नहीं आयोजित की जा सकीं। पाबंदियों के कारण केवल प्रतीक अनुष्ठान संपन्न किए गए। जन-भागीदारी के बिना लीला प्रांगण सूने ही रहे। इसी के साथ लीला पात्रों की भयावह समस्या लीला आयोजनों के लिए चुनौती बनकर उभरी है। पात्र आसानी से नहीं मिल रहे। पात्रों की सज्जा के सामान, आभूषण, मुकुट-मुखौटे तथा धन का अभाव बड़ी समस्याएं हैं। भावनाओं से पूरित आयोजन है रामलीला। निर्बल के बल राम के जिस भरोसे व भाव के साथ रामचरितमानस का छोटा-मोटा गुटखा लेकर गिरमिटिया मजदूर विदेश गए, उसी राम के चरित्र का निरूपण करती रामलीला के आयोजन की किंवदंती बताती है कि जब त्रेता युग में राम वन गए थे, तब अयोध्यावासियों ने राम की स्मृति को याद रखने के लिए रामलीलाओं की संकल्पना कर उसे मूर्त रूप दिया था। किंतु उपलब्ध प्रमाणों से स्पष्ट है कि रामलीला के प्रेरक गोस्वामी तुलसीदास स्वयं थे। उन्होंने अपने मित्र भक्त मेघा भगत के माध्यम से रामलीलाओं की प्रस्तुति-मंचन की शुरुआत कराई। स्वप्न-दर्शन में प्राप्त ‘प्रभु’ की प्रेरणा से मेघा भगत ने काशी में 478 साल पहले चित्रकूट रामलीला के नाम से तथा सन 1783 में काशी के तत्कालीन राजा उदित नारायण सिंह ने विश्व प्रसिद्ध हो चुकी रामनगर की रामलीला का श्रीगणेश किया। लीला से जुड़ी चमत्कार की कथा आज भी लोगों की जुबान पर है। काशी नरेश के पुत्र गंभीर रूप से बीमार थे। रामनगर कस्बे के पास अदलहाट में होने वाली ग्रामीण रामलीला के राम की पुष्प माला प्रसाद में पाकर लौटे राजा ने किले में बीमार पुत्र के मस्तक पर स्पर्श कराया और सिरहाने रख दिया। अगले दिन राजकुमार स्वस्थ हो गए। तभी महाराज ने रामनगर की लीला प्रारंभ कराई।
काशी के दोनों ही ऐतिहासिक लीला आयोजन आज लाखा मेला (लाखों दर्शकों वाले आयोजन) का रूप ले चुके हैं। काशी की इन रामलीलाओं से प्रेरणा ग्रहण करते हुए देश-विदेश में सैकड़ों लीला आयोजन शुरू हुए और चल भी रहे हैं। मान्यता है, चित्रकूट रामलीला के प्रसिद्ध नाटीइमली भरत मिलाप के दिन स्वप्न में भगवान से प्राप्त वरदान या आश्वासन के अनुरूप ही अस्ताचलगामी सूर्य की किरणों से दीप्त चारों भाइयों की छवि के बीच मेघा भगत को प्रभु के दर्शन हुए थे। भरत मिलाप व रामनगर की लीला के नेमी-प्रेमी प्रभु की आरती के दर्शन का संकल्प लेकर पूरी लीला का दर्शन ही नहीं करते, बल्कि लीला काल (रामनगर - 31 दिन, चित्रकूट रामलीला- 22 दिन) में अपनी पूरी सात्विक दिनचर्या पूर्ण भक्ति भाव से आराध्य राम को समर्पित कर देते हैं। ऐसी रामलीलाएं जीवन में सात्विकता के प्रतिरोपण का सशक्त स्रोत हैं।
सात्विक जीवन शैली, भरत-राम-लक्ष्मण-शत्रुघ्न के भाईचारे का आज भी प्रासंगिक संदेश देती रामलीलाएं प्रतिवर्ष जीवन में अनुकरणीय बन जाती हैं। सिर्फ भारतीय जनजीवन में ही नहीं, बल्कि अनेक देशों में रामलीलाएं आज पारंपरिक सांस्कृतिक-धार्मिक आयोजनों का रूप ले चुकी हैं। गिरमिटिया मजदूर संस्कृति वाले देशों, मॉरीशस, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिडाड, फिजी, कंबोडिया (कंपूचिया), थाईलैंड आदि की रामलीलाएं एक स्थापित मंच-संचार कला का रूप ले चुकी हैं। केवल भारत के रामनगर की रामलीला या अयोध्या की लीला में ही लीला के पात्रों के मुखौटे व राक्षस आदि के विशालकाय पुतले बनाते पुश्तैनी मुस्लिम कारीगर ही नहीं, बल्कि इंडोनेशिया जैसे 90 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले देश में मुस्लिम अभिनेताओं द्वारा मंचित रामलीलाओं से भी लीला का सर्वसमावेशी स्वरूप मुखर होता है। इस्लामी गणतंत्र इंडोनेशिया में तो लोग राम को अपना पूर्वज मानते हैं। राष्ट्रपति सुकर्णो का यह कथन आज भी प्रासंगिक माना जाता है, ‘इस्लाम हमारा धर्म है, रामायण हमारी संस्कृति।’ यहां रामायण ककविन  के आधार पर होने वाली रामलीला का सामाजिक जीवन में विशेष सम्मान है। इसी प्रकार कंबोडिया (कंपूचिया) में राजा नोरोदम सिंहानूक की राजकुमारी फुफ्फा (पुष्पा) द्वारा सीता का अभिनय इतिहास में दर्ज है। उनके चित्रों की आज भी उस देश में जबर्दस्त मांग है।
थाईलैंड में तो पूरे साल रामलीलाओं के आयोजन की परंपरा व विशेष परिपाटी है। यहां रामलीला को ‘रामकेयन’ थाई भाषा- का नाम दिया गया है। यहां की प्रसिद्ध लीला मंडलियों को निजी घरेलू आयोजनों सहित सामाजिक-धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों के अवसर पर पूरे वर्ष कभी भी आमंत्रित करके रामलीला के आयोजन की विशेष परंपरा सामाजिक जीवन की विशिष्टता है।
विख्यात इतिहासकार जेम्स प्रिंसेप ने वाराणसी की रामलीलाओं की लोकप्रियता का वर्णन करते हुए लीला का प्रारंभ सन 1830 से माना और इसे एक ‘अद्भुत लोक आयोजन’ की संज्ञा दी। काशी की लीला परंपरा की प्रेरणा से प्रारंभ लीलाओं में 477 साल पुरानी काशी की लाटभैरव की लीला, गोस्वामी तुलसीदास की कर्मस्थली अस्सी (तुलसी घाट) की रामलीला सहित दिल्ली, मध्य प्रदेश, मुंबई और उत्तराखंड की रामलीलाओं की सुदृढ़ ऐतिहासिक परंपरा है। उत्तराखंड की पहाड़ी, कुमाउनी, गढ़वाली, चामी रामलीलाओं ने रामलीला परंपरा को काफी समृद्ध किया है। आजादी से पहले तो लाहौर, कराची, इस्लामाबाद आदि में भी रामलीलाएं होती थीं। बहादुरशाह जफर के दरबार में उर्दू में अनूदित रामायण का पाठ, मूक अभिनय होता था। काशी की रामलीला में साधारण दर्शक भी लीला के पात्र होते हैं। राम वनगमन के समय बिलखते दर्शक, धनुष यज्ञ के उल्लास के बाद  बाराती दर्शक, भरत मिलाप में आपस में गले मिलते दर्शक अपने को धन्य समझते हैं। उनकी आंखों में राम के सुख-दुख के आंसू व भाव  दिखते हैं, तब वे कुछ पलों के लिए राममय हो जाते हैं। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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