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जनादेश में शुमार सजा और संदेश

के चंद्रशेखर राव द्वारा तेलंगाना में बनाया गया साम्राज्य आखिरकार रविवार को ढह गया। हालांकि, उन्होंने एक उल्लेखनीय जन-आंदोलन का नेतृत्व किया था और साल 2014 में सत्ता में आए थे, पर उनका जादू एक दशक...

जनादेश में शुमार सजा और संदेश
Amitesh Pandeyएस. श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकारMon, 04 Dec 2023 10:54 PM
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के चंद्रशेखर राव द्वारा तेलंगाना में बनाया गया साम्राज्य आखिरकार रविवार को ढह गया। हालांकि, उन्होंने एक उल्लेखनीय जन-आंदोलन का नेतृत्व किया था और साल 2014 में सत्ता में आए थे, पर उनका जादू एक दशक तक ही चल सका। कोई शक नहीं कि तेलंगाना ने केसीआर और उनकी भारत राष्ट्र समिति या बीआरएस को भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और उन तक मुश्किल पहुंच के लिए दंडित किया है। यह धारणा बन गई थी कि वह राज्य के ग्रामीण हिस्सों की अनदेखी कर रहे हैं और लोगों ने उन्हें किनारे लगा दिया। वैसे 24 अक्तूबर को ही इस कॉलम में बताया गया था कि तेलंगाना के लोगों को कांग्रेस के रूप में विकल्प मिल गया है।
केसीआर के शासन को हटाने और उनकी जगह किसी ऐसे व्यक्ति को लाने का जनता का दृढ़ संकल्प था, जो उसे बेहतर प्रशासन दे सके। चूंकि लोगों की इच्छा पूरी करने में कांग्रेस सबसे करीब थी, इसलिए उन्होंने इस पार्टी को चुना है। रेवंत रेड्डी के नेतृत्व में कांग्रेस ने कुशलता दिखाई और एक आक्रामक चुनाव अभियान चलाया, जो अंतत: उन्हें सत्ता में ले आया। 
दरअसल, के चंद्रशेखर राव ने खुद को अपने बैरिकेड फॉर्म हाउस तक समेट लिया था और अपने चुनाव क्षेत्र की जनता व मतदाताओं से कट गए थे। इससे निश्चित रूप से आम लोग नाराज हुए और उन पर आरोप लग गया कि वह एक ‘फॉर्म हाउस मुख्यमंत्री’ हैं। वह ज्योतिष पर कुछ ज्यादा ही यकीन करने लगे थे और उन्हें ग्रहों-सितारों के कथित इशारों की बुनियाद पर फैसले लेते देखा जाने लगा था। 
ऐसा लगता है, राज्य की मुस्लिम आबादी, जिनमें से अधिकांश राजधानी हैदराबाद में केंद्रित है, ने भाजपा के साथ कथित गठजोड़ को मंजूर नहीं किया। संसद में अनेक मौकों पर विवादास्पद विधेयकों का समर्थन करके बीआरएस ने भाजपा का समर्थन ही किया था। शराब घोटाले के संदर्भ में केसीआर की बेटी कविता से प्रवर्तन निदेशालय द्वारा पूछताछ और यहां तक कि गिरफ्तार किए जाने की आशंका थी, पर ऐसा कभी नहीं हुआ। कहीं न कहीं बीआरएस और भाजपा के बीच तालमेल की संभावना दिखती रही, इससे भी तेलंगाना में बीआरएस पर लोगों का संदेह बढ़ा। इन संदेहों को तब और बल मिला, जब भाजपा के राज्य प्रमुख के पद पर आक्रामक नेता बंदी संजय कुमार की जगह पर अचानक ही ज्यादा विनम्र नेता उत्तम कुमार को बैठा दिया गया। संजय कुमार केसीआर और उनके शासन के खिलाफ मुखरता से प्रचार अभियान चला रहे थे और स्थानीय मतदाताओं का विश्वास हासिल करने में कामयाब होने लगे थे। उन्हें एक स्थानीय नायक के रूप में देखा जाने लगा था। उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जा रहा था, जो भाजपा को शीर्ष पर पहुंचा सकता था। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक रैली में घोषणा की कि केसीआर भाजपा के साथ हाथ मिलाने के इच्छुक थे, पर उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया, तब इस संदेह को और बल मिला कि बीआरएस व भाजपा के बीच कोई गुप्त समझौता है।
चूंकि एआईएमआईएम और बीआरएस के बीच करीबी संबंध है, इसलिए यह भी संदेह था कि तीनों  पार्टियों ने कांग्रेस से लड़ने के लिए मिलकर काम किया है। इसीलिए लगता है, मुसलमानों ने रणनीतिक रूप से बीआरएस को हटाने के लिए मतदान किया है। दिलचस्प बात यह है कि इन सबके परिणामस्वरूप मतदाताओं का भाजपा पर से विश्वास कम नहीं हुआ है। यह इस तथ्य से पता चलता है कि भाजपा ने न सिर्फ अपनी संख्या तीन से बढ़ाकर सात कर ली है, बल्कि अपना वोट प्रतिशत सात से दोगुना कर 14 करने में भी कामयाब रही है।
कुल मिलाकर देखें, तो तेलंगाना में कांग्रेस एक उत्साही अभियान चलाने में कामयाब रही। इसने कर्नाटक के उदाहरण का अनुसरण किया और जनता के निचले तबके, विशेषकर किसानों तक कल्याणकारी घोषणाएं पहुंचाने का फैसला किया। केसीआर की रायथु बंधु योजना किसानों के बीच बेहद लोकप्रिय थी, पर यह योजना बड़े किसानों के पक्ष में थी। इस योजना में प्रति एकड़ भूमि जोत के आधार पर सब्सिडी दी गई, जिसका अर्थ है कि जितनी अधिक भूमि होगी, उतना अधिक सब्सिडी का लाभ होगा। किरायेदार किसानों या खेतिहर मजदूरों को इस योजना से बाहर रखा गया, क्योंकि यह योजना सिर्फ भूमि मालिकों पर लागू होती थी। मौका देख कांग्रेस ने अपने घोषणा-पत्र में किरायेदार किसानों और खेतिहर मजदूरों को भी इस योजना के दायरे में लाने का इरादा जता दिया। इसके अलावा कांग्रेस ने अनेक कल्याणकारी प्रोत्साहनों की भी घोषणा की। हालांकि, केसीआर ने अपनी लोकप्रियता कई अन्य योजनाओं के आधार पर बनाई थी, पर कांग्रेस ने भी खुलकर यह वादा किया कि वह सत्ता में आने पर अच्छी योजनाओं को जारी रखेगी। इससे मतदाताओं पर असर हुआ। 
वैसे चुनाव प्रचार के दौरान ही केसीआर की घबराहट दिखने लगी थी। उन्होंने रेवंत रेड्डी की आलोचना शुरू कर दी थी। यह पहली बार हुआ कि जो केसीआर खुद को प्रधानमंत्री के बराबर देखते थे, उन्होंने खुद को एक अपेक्षाकृत अज्ञात राजनेता के बराबर माना। उन्होंने इस दावे के लिए भी कांग्रेस की आलोचना की कि वह इंदिरा गांधी या इंदिरा अम्मा की गौरवशाली परंपराओं को वापस लाएगी। केसीआर के दो चुनाव क्षेत्रों से लड़ने के फैसले ने उनकी घबराहट को और उजागर कर दिया। वह कामा रेड्डी सीट पर हार गए और भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशी के बाद तीसरे स्थान पर रहे।
तेलंगाना के नतीजों से भाजपा की दक्षिणी राज्यों में  पकड़ और मजबूत हो सकती है। तेलंगाना के नतीजों का असर पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश पर भी पड़ने की संभावना है। भाजपा के साथ मौन गठबंधन में सत्तारूढ़ पार्टी वाईएसआर कांग्रेस को अपने विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है, क्योंकि चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व वाली टीडीपी वहां सत्ता में वापस आने की कोशिश कर रही है।
भाजपा की दक्षिणी सूबों की विधानसभाओं में  सीमित मौजूदगी है और सत्ता पर कब्जा करने की उसकी कोशिशों को अब तक बहुत कम सफलता मिली है। हालांकि, भाजपा को इस हालत से बाहर निकलने का रास्ता खोजना होगा और दक्षिणी राज्यों से अच्छी संख्या में संसदीय सीटें जीतने के लिए नई रणनीति बनानी पड़ेगी। हालांकि, भाजपा का बढ़ता मत-प्रतिशत उन क्षेत्रीय दलों के लिए भी खतरे की घंटी है, जिनको राष्ट्रीय दलों- कांग्रेस और भाजपा की तुलना में बेहतर समर्थन मिलता आ रहा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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