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स्थितियां न सुधरीं तो जारी रहेगा संरक्षण

श्रीमान, मैं चार ही संशोधनों के विषय में कुछ शब्द कहना चाहता हूं। ...मैं देखता हूं कि यद्यपि इस सदन में जो प्रतिवेदन पेश किया गया था, उसमें आंग्ल भारतीयों को मनोनयन द्वारा प्रतिनिधित्व देने के...

स्थितियां न सुधरीं तो जारी रहेगा संरक्षण
Amitesh Pandeyबी आर आंबेडकर, संविधान निर्माताFri, 03 Nov 2023 10:39 PM
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श्रीमान, मैं चार ही संशोधनों के विषय में कुछ शब्द कहना चाहता हूं। ...मैं देखता हूं कि यद्यपि इस सदन में जो प्रतिवेदन पेश किया गया था, उसमें आंग्ल भारतीयों को मनोनयन द्वारा प्रतिनिधित्व देने के विषय में कोई कालावधि नहीं रखी गई थी, मगर मैं देखता हूं कि उस प्रतिवेदन पर बाद में जो वाद-विवाद हुआ, उसमें मेरे मित्र पंडित भार्गव ने एक संशोधन पेश किया था, ... उनका वह संशोधन सदन द्वारा पहले ही स्वीकृत हो गया था, इसलिए अब मैं उनके इस संशोधन को स्वीकार करने के लिए बाध्य हूं।
आगे नजीरुद्दीन अहमद द्वारा उठाए गए प्रश्न के विषय में मेरा ख्याल है कि उसके एक भाग की मंशा तो मेरे मित्र कृष्णमाचारी के संशोधन द्वारा, जिसे मैं स्वीकार करता हूं, पूरी हो गई है। इस समय मैं स्वयं अच्छी तरह नहीं समझ रहा कि क्या इस खंड का यह अर्थ है कि यह कालावधि इस संविधान की शुरुआत से शुरू होगी या नई संसद के प्रथम निर्वाचन की तारीख से आरंभ होगी। हालांकि, इस समय तो मैं यही कह सकता हूं कि इस मामले पर मसविदा समिति विचार करेगी और आवश्यक होगा, तो वह इस प्रकार का संशोधन पेश करेगी कि यह कालावधि प्रथम संसद के प्रथम अधिवेशन से आरंभ होगी। 
मेरे मित्रों, मुनिस्वामी पिल्लै और मनमोहन दास ने जो युक्तियां पेश की हैं, उनके विषय में मुझे खेद है कि उस संशोधन को स्वीकार करना मेरे लिए संभव नहीं है। उनकी प्रस्थापना यह है कि वे इस खंड को वर्तमान रूप में छोड़ने के लिए तैयार हैं, पर संसद को यह शक्ति देना चाहते हैं  कि वह दस वर्ष की कालावधि को बढ़ाकर इस खंड को बदल सकती है। अब हमने यह मामला सर्वप्रथम इस संविधान में रखा है और मैं नहीं समझता कि हमें इस विषय में किसी परिवर्तन की अनुमति देनी चाहिए, जब तक कि संविधान ही संशोधित न कर दिया जाए।
मैं अनुसूचित जातियों के सदस्यों द्वारा कही गई बातों के विषय में एक-दो शब्द कहना चाहता हूं, जो कुछ आवेशपूर्ण और जोरदार शब्दों में इस अनुच्छेद द्वारा निश्चित सीमा के विषय में बोले हैं। मुझे कहना होगा कि उनके लिए शिकायत का कारण नहीं है, क्योंकि दस वर्ष की सीमा रखने का निश्चय उन्हीं की सहमति से किया गया है। मैं स्वयं अधिक समय के लिए जोर डालना चाहता था, क्योंकि मैं समझता हूं कि जहां तक अनुसूचित जातियों का संबंध है, उनके साथ अन्य अल्पसंख्यकों के समान व्यवहार नहीं होता है। उदाहरण के लिए, जहां तक मुझे पता है, मुसलमानों के लिए विशेष आरक्षण 1892 में आरंभ हुआ था; कहना चाहिए कि उस समय श्रीगणेश हो गया था। अत: मुसलमान लगभग 60 साल तक विशेषाधिकारों का उपयोग करते रहे हैं। ईसाइयों को यह विशेषाधिकार 1920 के विधान में मिला था और उन्होंने 28 वर्ष तक उसका उपभोग किया है। अनुसूचित जातियों को यह विशेष आरक्षण केवल 1935 के विधान में मिला है। इस विशेष आरक्षण का आरंभ कार्यरूप में 1937 में हुआ, जब वह संविधान लागू हुआ। उनके लिए यह दुर्भाग्य की बात है कि वे इससे लाभ केवल दो वर्ष तक उठा सके, क्योंकि वास्तव में 1939 से अब तक या 1946 तक विधान विलंबित रहा और अनुसूचित जातियां उन विशेषाधिकारों से लाभ नहीं उठा सकीं, जो उन्हें 1935 के अधिनियम में मिले थे, और मेरे विचार में सदन के लिए यह बिल्कुल उचित होता और उदारता होती कि वह अनुसूचित जातियों को इन आरक्षणों के विषय में अधिक समय दे देती, किंतु जैसा कि मैंने कहा, यह सब सदन ने स्वीकार किया।
...मेरे विचार में अब उपबंधों को बदलना ठीक नहीं है। यदि दस वर्ष के अंत में अनुसूचित जातियां यह देखें कि उनकी स्थिति सुधरी नहीं है या वे इस कालावधि को और बढ़ाना चाहती हैं, तो इस संरक्षण को प्राप्त करने के लिए उपाय ढूंढ़ना उनकी शक्ति या बुद्धि से परे की वस्तु नहीं होगी।
...अनुसूचित आदिम जातियों के लिए मैं और भी लंबा समय देने के लिए तैयार हूं, किंतु जो लोग अनुसूचित जातियों अथवा अनुसूचित आदिम जातियों के आरक्षणों के विषय में बोले हैं, उन्होंने ऐसी बाल की खाल निकाली है कि यह चीज दस वर्ष के पश्चात समाप्त हो ही जानी चाहिए। मैं तो उन्हें एडमंड वर्क के शब्दों में यही कहना चाहता हूं कि महान साम्राज्य तथा छोटे दिमाग एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। 
    (संविधान सभा में दिए गए उद्बोधन से )  

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