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शांति-दूत खोजता पश्चिम एशिया

अगर अमन-चैन की जरूरत दोनों तरफ महसूस की जा रही थी, तो गाजा में हमने जो तबाही देखी, वह महज अप्रिय सच्चाई थी। इजरायल-फलस्तीन से आ रही तस्वीरों के बाद अब दुनिया को जल्द ही इस सवाल का जवाब भी खोजना...

शांति-दूत खोजता पश्चिम एशिया
Amitesh Pandeyराजमोहन गांधी, इतिहासकार एवं शिक्षाविद्Thu, 30 Nov 2023 10:58 PM
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अगर अमन-चैन की जरूरत दोनों तरफ महसूस की जा रही थी, तो गाजा में हमने जो तबाही देखी, वह महज अप्रिय सच्चाई थी। इजरायल-फलस्तीन से आ रही तस्वीरों के बाद अब दुनिया को जल्द ही इस सवाल का जवाब भी खोजना होगा कि संघर्ष-विराम के बाद आखिर क्या? युद्ध-विराम के तीसरे दिन (26 नवंबर) जब प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अचानक इजरायली सैनिकों के बीच गाजा पहुंचे, तो उन्होंने उनसे (और वहां मौजूद सभी से) यही कहा कि हम अंत तक, यानी जब तक जीत नहीं मिल जाती, इसे जारी रखेंगे। अपनी बात आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा, इस युद्ध में हमारे तीन लक्ष्य हैं- हमास को खत्म करना, अपने सभी बंधकों को वापस ले जाना और यह सुनिश्चित करना कि गाजा फिर से इजरायल के लिए खतरा न बने। नेतन्याहू ने यह भी दावा किया कि इजरायल के पास अपने लक्ष्यों को पाने के लिए जरूरी ताकत, इच्छाशक्ति और संकल्प है।
रिपोर्टें कहती हैं, इजरायल की योजना गाजा पट्टी के 20 लाख से अधिक फलस्तीनियों को दक्षिण में स्थित मिस्र के सिनाई सूबे में धकेलकर या मिस्र के बिल्कुल करीब, पर गाजा के भीतर ही समुद्र किनारे कुछ वर्गमील क्षेत्र में समेटकर गाजा पट्टी से भविष्य में आने वाले खतरे को खत्म करना है। उल्लेखनीय है, गाजा पट्टी वह इलाका है, जो करीब 140 वर्गमील क्षेत्र में फैला है और हमास के नियंत्रण में है।
जाहिर हैै, यह जातीय नरसंहार और बंदी शिविरों के निर्माण करने जैसा होगा, पर क्या दुनिया इसे होने दे सकती है? निस्संदेह, 27 अक्तूबर को फ्रांस सहित 120 देशों ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में उस प्रस्ताव के पक्ष में वोट डाले, जिसमें इजरायल से उत्तरी गाजा पर अपने हमले रोकने को कहा गया था। मगर यदि नेतन्याहू 90 प्रतिशत या पूरी तरह से गाजा को खाली करने का आदेश देते हैं, तो मिस्र या अन्य अरब देश, ईरान या तुर्की, या संयुक्त राष्ट्र अथवा ब्रिक्स या दुनिया की अन्य कोई ताकत क्या भौतिक रूप से इसमें दखल देगी? इन सभी ने 7 अक्तूबर की घटना पर इजरायल की प्रतिक्रिया (युद्ध) और उसकी प्रकृति की निंदा की थी।
इस सवाल का जवाब हम नहीं जानते, लेकिन कुछ देशों पर वाकई हस्तक्षेप का तेज दबाव पड़ सकता है। इसके अलावा, हमें इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि कुछ मामलों में साल 2023 का अंत उन मौकों से अलग हो सकता है, जब दुनिया चुपचाप फलस्तीनियों को अपने ही घर व जमीन से जबरन भगाने का उपक्रम देखती रही है। पहला कारण, फलस्तीनियों को याद होगा कि 7 अक्तूबर को उन्होंने इजरायली प्रतिबंधों से ऊपर उठने की इच्छाशक्ति और क्षमता दिखाई, हालांकि उस दिन उन्होंने बड़ी क्रूरता का प्रदर्शन किया था। दूसरा, अगर फलस्तीनियों के साथ एक बार फिर समान व्यवहार किया जाता है, और दुनिया उनको इंसान नहीं, बल्कि जानवर या उससे भी बदतर समझती है, तो उनमें नाराजगी काफी बढ़ जाएगी, और भविष्य में फिर किसी ऐसे मौकों पर गंभीर प्रतिक्रिया सामने आ सकती है। तीसरा, यह उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है कि इजरायल और पश्चिमी दुनिया, दोनों की आबादी में अब ऐसा मजबूत वर्ग है, जो फलस्तीन की एक सुरक्षित और सम्मानजनक मातृभूमि की जरूरत को शिद्दत से समझता है। फलस्तीनी अधिकारों के लिए यूरोप और अमेरिका की सड़कों पर बड़ी संख्या में विभिन्न धर्मों व नस्लों के लोगों का प्रदर्शन अब आसानी से भुलाया नहीं जा सकता। अलबत्ता, उनकी संख्या बढ़ ही सकती है। और, यही बात संभवत: उन कई इजरायलियों के लिए भी कही जा सकती है, जो अब फलस्तीनियों के स्वतंत्र राष्ट्र के अधिकार को स्वीकार करने लगे हैं।
आने वाले दिनों में डोनाल्ड ट्रंप बेशक कुछ भी कहें या करें, लेकिन 9 दिसंबर को उन्होंने जो कहा, और जिसका वीडियो 10 दिसंबर को सीएनएन  ने प्रसारित किया, वह इजरायल के पक्ष में अमेरिकियों के घटते समर्थन का संकेत माना जा सकता है। डोनाल्ड ट्रंप ने उस वीडियो में कहा था, इतने सारे लोग मर रहे हैं, इजरायली और यहूदी लोगों के प्रति फलस्तीनी नफरत जैसी कोई नफरत नहीं है, और शायद इसके समाधान का दूसरा तरीका भी है। 
क्या एक महीने पहले तक ट्रंप अपना यह आखिरी वाक्य कह सकते थे? और, हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले ही इजरायल के अपनी रक्षा के अधिकार को उचित माना है, लेकिन उनकी सरकार ने विदेश मंत्रालय के माध्यम से, सुरक्षित व मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर ‘संप्रभु, स्वतंत्र और व्यवहार्य फलस्तीन’ के लिए इजरायल के साथ शांति से ‘सीधी बातचीत’ का आह्वान भी बार-बार किया।
तकरीबन 20 साल पहले इलिनोइस यूनिवर्सिटी में एक अतिथि भारतीय राजनीतिक विचारक ने साफ-साफ बताया था कि भारत-पाकिस्तान की तुलना में इजरायल-फलस्तीन विवाद को सुलझाना कहीं आसान है। इसके लिए हमें दोनों में समानताएं देखनी चाहिए। कई फलस्तीनी इस बात से नाराज हैं कि इजरायल का गठन उस जमीन पर बस्तियों के माध्यम से किया गया है, जो सदियों से फलस्तीनियों की थी। जबकि, कई इजरायली भी अपने पड़ोस में, यहां तक कि अपनी सीमा के भीतर फलस्तीनियों के अस्तित्व से नाराज हैं। ठीक इसी तरह, आज ऐसे कई भारतीय हैं, जो एक ऐसी दुनिया की कल्पना करते हैं, जिसके नक्शे में पाकिस्तान का कोई अस्तित्व न हो। बेशक, एक या दो क्रिकेट मैचों के लिए, पाकिस्तान हमारी दुनिया में फिर से प्रवेश कर सकता है, लेकिन उसे जल्द ही साफ-सुथरे तरीके से बाहर भी निकलना होगा। उसे दुनिया की हमारी तस्वीर बिगाड़ने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हम पाकिस्तान के बिना भी अपने जीवन का आनंद ले सकते हैं। कई पाकिस्तानी भी ऐसी दुनिया पसंद नहीं करेंगे, जिसमें भारत या भारतीय हों। फिर भी, भारत और पाकिस्तान, दोनों हकीकत हैं। इजरायल और फलस्तीन की सच्चाई भी हमें इसी तरह से स्वीकार करनी होगी।
लिहाजा, क्या कोई ताकतवर शांतिदूत हमारे बीच है? यह आज का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। इसी तरह, क्या कोई इतना मजबूत देश या प्रभावशाली राष्ट्रों का समूह है, जो इजरायलियों और फलस्तीनियों के बीच स्वीकार्य सह-अस्तित्व की दिशा में इजरायल व फलस्तीन के संघर्ष-विराम को आगे बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा हो? क्या इस दुनिया में कोई नेतृत्व यह करेगा? हमें इन सवालों के जवाब तलाशने होंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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