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6 अप्रैल, 2020|11:24|IST

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मजबूत होते रिश्तों की नई इबारत

अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का संबोधन कई मामलों में खास था। उन्होंने न सिर्फ इस देश की एकता, संस्कृति और विरासत को याद किया, बल्कि भारत के साथ अमेरिका की बढ़ती नजदीकियों की भी चर्चा की। उन्होंने अपनी प्राथमिकता भी खूब गिनाई; फिर चाहे वह आपस में मिलकर इस्लामी आतंकवाद से मुकाबला करना हो, या सैन्य क्षेत्र में काम करना या फिर अंतरिक्ष-विज्ञान को गति देना।

एक 'चाय वाले' के सत्ता के शिखर पर पहुंचने को उन्होंने यहां के लोकतंत्र की ताकत बताया। दोनों देशों के शासनाध्यक्षों की मित्रता कितनी अनूठी है, इसका पता तो ट्रंप के भारत दौरे से पहले ही चल गया था। उन्होंने यहां आने से पूर्व कहा था कि कारोबार के क्षेत्र में अच्छा बर्ताव न करने के कारण भारत के साथ समझौता करना मुश्किल है, मगर प्रधानमंत्री मोदी मेरे अच्छे दोस्त हैं। 

हालांकि ऐसा कहते समय ट्रंप यह बिसरा बैठे कि भारत एक जीवंत लोकतंत्र है, और आम लोगों की अपेक्षाएं ही यहां के प्रधानमंत्री प्रदर्शित करते हैं। मगर सोमवार को अपने स्वागत समारोह में उन्हें शायद इसका एहसास हो गया होगा कि देशहित में भारत किस कदर मित्रता का सम्मान करता है। अहमदाबाद का कार्यक्रम इसी का एक उदाहरण था।

राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत को कितनी तवज्जो दी है, इसका पता इससे भी चलता है कि ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम में किए गए वादे को पूरा करने के लिए उन्होंने अपनी तमाम व्यस्तताओं को किनारे कर दिया। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इस समय उम्मीदवारों का ध्यान घरेलू नीतियों और स्थानीय बहसों पर होता है। फिर भी, ट्रंप ने 30 घंटे से अधिक का समय भारत में बिताना पसंद किया। इसमें अगर आने-जाने में लगने वाले वक्त को भी जोड़ लें, तो यह पूरी यात्रा करीब ढाई दिनों की होती है। हम इसे अमेरिका 

में भारतवंशियों की बढ़ती राजनीतिक ताकत का संकेत भी मान सकते हैं। वहां लगभग 40 लाख अप्रवासी भारतीय रहते हैं। वहां उच्च पदों पर काम करने के कारण इनका हमेशा ही सामाजिक रुतबा रहा है, लेकिन अब स्थानीय राजनीति में भी इनका प्रभाव बढ़ता जा रहा है।

मुमकिन है कि इस यात्रा के बहाने ट्रंप भारतवंशियों को लुभाने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन जिस तरह से उन्होंने अपने संबोधन में दिल खोलकर भारत की तारीफ की, उसका दायरा सिर्फ राष्ट्रपति चुनाव तक सीमित नहीं हो सकता। अगर ऐसा होता, तो यहां के तमाम धर्मों के लोगों को मिल-जुलकर रहने और भारत की समृद्धि में अपना योगदान देने की बात वह नहीं कहते। शायद भारत आने से पहले उन्हें यहां के घरेलू हालात के बारे में बताया गया हो। मगर उनके स्वागत में जिस तरह से देश की सांस्कृतिक झलक उन्हें दिखाई गई, उनका भ्रम टूट गया होगा। वह समझ गए होंगे कि चंद विवादों से इस देश की बुनियाद नहीं दरक सकती।  

आतंकवाद के खिलाफ भी राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी दृढ़ता दिखलाई। इस्लामी आतंकवाद का जिस कामयाबी से अमेरिका ने मुकाबला किया है, वह वाकई एक नजीर है। अल कायदा और आईएस की कमर तोड़ना और उनके सरगनाओं को मार गिराना आसान नहीं था। अच्छी बात है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत के साथ मिलकर आतंकवाद से लड़ने की बात कही। यह बताता है कि मित्र देशों की सूची में वह भारत को पर्याप्त तवज्जो दे रहे हैं और यह मान रहे हैं कि इस्लामी आतंकवाद से अमेरिका जिस तरह पीड़ित रहा है, भारत भी उसी पीड़ा से गुजर रहा है।

सामरिक साझीदार के रूप में भी भारत की दोस्ती को अमेरिकी राष्ट्रपति ने याद किया। दोनों देशों के बीच बढ़ते सामरिक रिश्तों का विशेष जिक्र यह संकेत है कि अमेरिका 1950 के दौर को फिर से जीना चाहता है, जब भारत के साथ उसके काफी बेहतर संबंध थे। आज बेशक नई दिल्ली और वाशिंगटन में कई मुद्दों पर मतभेद हैं, लेकिन शीतयुद्ध से पहले तक दोनों देशों में अच्छी छनती थी। उस दौर में अमेरिका ने भारत की आजादी के लिए ब्रिटेन पर दबाव बनाया था। मगर बाद के वर्षों में भारत ने गुटनिरपेक्ष की नीति अपनाई और मित्र देशों की खोज में अमेरिका की नजदीकी पाकिस्तान से बढ़ी। हालांकि आज पाकिस्तान की हकीकत अमेरिका भी जान गया है। इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ जंग में राष्ट्रपति ट्रंप का पाकिस्तान के हुक्मरानों को साथ लेना (परोक्ष रूप से उन पर दबाव बनाना) यही संकेत कर रहा था।

भारत और अमेरिका की बढ़ती नजदीकी कितनी महत्वपूर्ण है, यह बताने की जरूरत नहीं है। दोनों देशों में जिस तरह से अब तकनीक (विशेषकर सैन्य क्षेत्र में) का भी आदान-प्रदान होने लगा है, वह गौर करने लायक है। फिर भी, हमारे निकट पड़ोस की अस्थिरता हमारे लिए चिंता का सबब है। अगर काबुल से अमेरिका ठोस प्रबंध किए बिना निकल आता है, तो स्थिर अफगानिस्तान का हमारा सपना बिखर सकता है। सुखद है कि प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप तक यह संदेश पहुंचाने में सफलता पाई है। हालांकि दक्षिण एशिया के अपने पड़ोसी देशों को भी हमें यह भरोसा देना होगा कि अमेरिकी दोस्ती के लिए हम पड़ोसी धर्म नहीं भूल रहे और न ही उनके हितों को नजरंदाज कर सकते हैं। 

द्विपक्षीय व्यापार को लेकर भी हमें अपनी मुश्किलें अमेरिका के सामने रखनी होंगी। अमेरिका ने भारत ही नहीं, तमाम देशों के कुछ उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ा दिए हैं। फिर, वह हमें विकसित अर्थव्यवस्था भी मानने लगा है। यह सब हमारे हित में नहीं है। उम्मीद है कि आज जब दोनों शासनाध्यक्षों के बीच नई दिल्ली में औपचारिक बातचीत होगी, तो यह मसला भी उठेगा। भारत ने बेशक पर्याप्त प्रगति की है, लेकिन अब भी हमारी अर्थव्यवस्था का अमेरिकी आर्थिकी से कोई मुकाबला नहीं है। राष्ट्रपति ट्रंप अगर यह बात समझ सकें, तो यह इस दौरे की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion colum of 25th february