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1 नवंबर, 2020|10:10|IST

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रोजगार पर टिका सारा दारोमदार

बिहार के चुनाव में दस लाख नौकरियों का नाम क्या आया, राजनीति का रंग बदल गया। पहले तो जमकर हीला हवाली हुई। मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री, दोनों ने दलील दी कि राज्य सरकार के पास इतने लोगों को वेतन देने का भी पैसा नहीं है। उप-मुख्यमंत्री ने तो साफ कहा कि इतने लोगों को वेतन देने पर 58,415.06 करोड़ रुपये का नया खर्च होगा। इसमें पुराने कर्मचारियों के तनख्वाह और भत्ते जोड़ लें, तो कुल खर्च 1,11,189 करोड़ रुपये हो जाता है। सरकार के पास यह पैसा तो है नहीं यानी यह वायदा पूरा हो ही नहीं सकता, बस हवा-हवाई है।
लेकिन सिर्फ एक ही दिन बाद जब भारतीय जनता पार्टी का संकल्प पत्र आया, तो वहां 19 लाख रोजगार देने का वायदा था। तर्क है कि ये रोजगार हैं, सरकारी नौकरियां नहीं, लेकिन तब सवाल यह भी है कि क्या राज्य के मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री को एक दिन पहले तक यह खबर नहीं थी कि भाजपा क्या चुनावी वायदा करने जा रही है? खैर, मसला सिर्फ यह है कि इस चुनाव में रोजगार कितना बड़ा मुद्दा बनेगा। 
बिहार हो या देश का कोई और हिस्सा, यह सवाल उठना ही है कि रोजगार का मतलब क्या सरकारी नौकरी या निजी नौकरी ही है या जो लोग अपना रोजगार करेंगे, उनका श्रेय भी सरकार के ही खाते में जाना है। लॉकडाउन शुरू होते ही जिस तरह काम-धंधे ठप हुए और निजी क्षेत्र में लाखों लोगों की नौकरियां चली गईं, उसके बाद इस साल अचानक सरकारी नौकरी की महत्ता बढ़ने लगी है। आपके आसपास ऐसे तमाम लोग मिल जाएंगे यह कहते हुए कि सरकारी नौकरी की बात ही और होती है। प्राइवेट का क्या भरोसा? 
सीएमआइई के प्रमुख महेश व्यास इस मसले पर लगातार नजर रखते हैं। उनके लिए भी यह एक पहेली ही है कि जब सरकारी नौकरियों के लिए इतनी ललक है, और सरकारी सेवाओं में लोगों की कमी लगातार दिख रही है, तब सरकारें आखिर ज्यादा लोगों को नौकरी देती क्यों नहीं हैं? और एक समाज के तौर पर भी हम यह तर्क क्यों बर्दाश्त कर लेते हैं कि सरकार के पास पैसा नहीं है, इसलिए वह आवश्यक सेवाओं के लिए स्टाफ रखने का बुनियादी काम भी पूरा नहीं करेगी? 
अब इससे मुकाबले के दो रास्ते हैं। एक, सरकार अपनी फिजूलखर्ची पर लगाम लगाए और दूसरा, वह अपनी कमाई बढ़ाए। फिजूलखर्ची रोकने के दर्जनों उपाय अलग-अलग आयोग सुझा चुके हैं, लेकिन रस्म निभाने से आगे कोई ठोस काम होता दिखता नहीं है। कमाई बढ़ाना भी कोई आसान राह नहीं है खासकर कोरोना महामारी केसमय। सरकार की ज्यादातर कमाई टैक्स से आती है, टैक्स वसूली तभी होगी, जब लोगों की आय  या व्यापार में कमाई अच्छी हो रही हो।  
अब कुछ अच्छी खबरें जरूर आ रही हैं। जितनी कंपनियों के दूसरी तिमाही के नतीजे अभी तक आ चुके हैं, उनके आधार पर कहा जा रहा है कि अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट रही है। सिर्फ दशहरे के दिन मुंबई, गुजरात और कुछ दूसरे शहरों में कुल 200 मर्सिडीज कारें बिक गईं। यह पिछले दशहरे से ज्यादा है। मारुति ने नवरात्रि में 96,700 गाड़ियां बेच लीं और कंपनी को उम्मीद है कि दीपावली तक उसका धंधा चमकता ही रहेगा। कुल मिलाकर, दूसरी तिमाही में कंपनी ने इस साल की कुल बिक्री का 41 प्रतिशत हासिल किया है। पिछले साल यही आंकड़ा 38.6 प्रतिशत पर था। सारी कार कंपनियों को जोड़ लें, तो नवरात्रि और दशहरे में करीब 2,00,000 कारें बिक चुकी हैं। इसी समय में हमारे देश के लोग ऑनलाइन पोर्टल्स पर हर मिनट डेढ़ करोड़ रुपये के मोबाइल फोन खरीद रहे थे। लॉकडाउन की वजह से बाजारों में हलचल भले ही कम हो, लेकिन ऑनलाइन शॉपिंग करने वालों की गिनती पिछले साल से 85 प्रतिशत बढ़ी है और इन्होंने जो खरीदारी की, वह भी पिछले साल से 15 प्रतिशत ऊपर ही है। नवरात्रि में ही करीब चार अरब डॉलर यानी करीब सवा लाख करोड़ रुपये की ऑनलाइन शॉपिंग हुई है। व्यापारियों को उम्मीद है कि दिवाली तक पिछले साल के मुकाबले कम से कम 85 प्रतिशत कारोबार तो वापस आ ही जाएगा। 
उधर, औद्योगिक उत्पादन के इंडेक्स यानी आईआईपी और कोर सेक्टर के आंकड़े भी उम्मीद जगा रहे हैं। मार्च में लॉकडाउन लगते ही 22 प्रतिशत और उसके बाद अप्रैल में 66.6 प्रतिशत तक गिरने के बाद से आईआईपी में लगातार सुधार दिख रहा है। अगस्त आते-आते  67.6 प्रतिशत कंपनियों का ही उत्पादन पिछले साल से नीचे रह गया और इनमें भी सिर्फ 10 प्रतिशत हैं, जिनका उत्पादन आधे से कम रहा। कंपनियों के तिमाही रिपोर्ट कार्ड से दिख रहा है कि खासकर छोटे शहरों और गांवों से मांग बढ़ी है। दूसरी तरफ, कोरोना के बावजूद अप्रैल से अगस्त के बीच ही भारत में 35.73 अरब डॉलर का सीधा विदेशी निवेश आया है, जो न सिर्फ पिछले साल से 13 प्रतिशत ज्यादा है, बल्कि एक नया रिकॉर्ड भी है। 
अब सवाल यह है कि क्या इस सबका फायदा नौजवानों, महिलाओं को नौकरी के रूप में मिलेगा? अगर यह संकेत माने जाएं, तो जवाब हां में ही होना चाहिए, लेकिन अब दो नए सवाल खड़े हो रहे हैं। एक यह कि कोरोना की विदाई कब होगी? दूसरा सवाल यह है कि नए दौर में सरकारी नौकरियों की गुंजाइश बचेगी कितनी? ऐसे में, नौकरी देने या रोजगार देने की जिम्मेदारी या तो बड़ी निजी कंपनियों पर आ जाती है या फिर खुद पर यकीन करनेवाले उद्यमियों पर। हर एक पढ़ाए एक की तर्ज पर शायद नया नारा बन सकता है, जिसमें खुद का काम शुरू करके अपने साथ दो-चार और लोगों के लिए भी कमाई का इंतजाम करनेवालों को प्रेरित किया जा सके। 
बहुत सी बड़ी कंपनियों से खबर है कि कोरोना काल में जो तनख्वाह काटी गई थी, वो वापस हो गई है। कुछ कंपनियों ने तो जो पैसा काटा था, वो भी लौटा दिया है, लेकिन जिन लोगों की नौकरियां चली गईं, उनके वापस लिए जाने की खबर तो अभी सुनाई नहीं पड़ी है। एक पेशेवर नेटवर्किंग साइट के हिसाब से पिछले साल के मुकाबले 12 प्रतिशत ज्यादा नौकरियां तो होंगी, लेकिन नौकरी के लिए मुकाबला पिछले साल से 30 प्रतिशत ज्यादा मुश्किल हो गया है। यही नहीं, बहुत से लोगों को अपना काम बदलना पड़ेगा। कुल मिलाकर, रोजगार आनेवाले समय में चुनावी राजनीति का भी बड़ा सवाल बनेगा या नहीं, इसका जवाब शायद बिहार चुनाव नतीजों के बाद ही सामने आएगा। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinin column 02 november 2020