Hindustan Editorial Column on 8th August - अलविदा सुषमा स्वराज DA Image

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अलविदा सुषमा स्वराज

हमारे बीच से सुषमा स्वराज का सदा के लिए चले जाना बहुत दुखद और अविस्मरणीय है। केवल सत्तारूढ़ भाजपा ने ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय राजनीति ने शालीनता और भलमनसाहत का एक आदर्श प्रतीक गंवा दिया। आज जब हम अपशब्द, अज्ञानता, अशालीनता से घिरे अनगिन नेताओं को देखने पर मजबूर हैं, तब सुषमा स्वराज की कमी और तीव्रता से खलने वाली है। हरियाणा राज्य में सबसे कम उम्र में विधायक और मंत्री बनने से लेकर विश्व में भारत की एक प्रतिनिधि छवि के रूप में सुस्थापित होने तक जब हम सुषमा स्वराज की बहुआयामी जीवन यात्रा को निहारेंगे, तो अनायास एहसास होगा कि देश की अंजुरी में एक शून्य बन गया। महज 20 की उम्र में देश की सर्वोच्च अदालत में वकालत शुरू करने वाली स्वराज का कद इतना ऊंचा हो गया था कि वह किसी परिचय की मोहताज नहीं थीं। करीब एक दशक विधायक और करीब तीन दशक तक सांसद, चार राज्यों से चुनाव लड़ने वाली राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य नेता, इंदिरा गांधी के बाद देश की दूसरी महिला विदेश मंत्री के नाम न जाने कितने कीर्तिमान दर्ज हैं। उनका जीवन विशेष रूप से युवा पीढ़ी के लिए सदा प्रेरणास्रोत रहेगा। तमाम राजनीतिक दलों में उनकी स्वीकृति और राजनीति से परे जाकर भी तरह-तरह से उनके योगदान की विवेचना जारी रहेगी।

अव्वल तो एक प्रखर वक्ता के रूप में उनकी पहचान थी। अपनी बात को बहुत संतुलित शब्दों में तथ्य और तर्क के साथ पुरजोर शैली में पेश करना, अपनी पार्टी और उसकी नीतियों का बढ़-चढ़कर बचाव करना, अपने भाषणों से भीड़ जुटा लेना और उसे शब्दपाश में बांधे रखना उन्हें खूब आता था। कई नेता मिल जाएंगे, जो अपने बात-व्यवहार से यह साबित कर देंगे कि राजनीति में भाषा का विशेष अर्थ नहीं होता, मगर इस मोर्चे पर सुषमा स्वराज विरल उदाहरण हैं। जब वह कर्नाटक में चुनाव लड़ने गईं, तो उन्होंने काफी कम समय में कन्नड़ सीख ली। वह नेता के रूप में बिचौलियों या चापलूसों से नहीं घिरीं। देश के संपन्नतम क्षेत्रों में एक दक्षिणी दिल्ली से भी चुनाव जीता और उस विदिशा से भी, जो कस्बाई-ग्रामीण क्षेत्र है। लोगों से उनकी भाषा में व्यवहार करते हुए तादात्म्य बना लेना उन्हें बेहतर आता था।

विदेश मंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी कभी दुनिया में देश की आवाज बने थे, लेकिन जब सुषमा स्वराज विदेश मंत्री बनीं, तो देश-विदेश के न जाने कितने जरूरतमंद भारतीयों की आवाज बन गईं। उस मूक-बधिर गीता की तो वह अभिभावक बन गईं, जो 15 साल से पाकिस्तान में इंतजार कर रही थी। विदेश में फंसे भारतीयों को बचाने की कथाएं बहुत हैं। यहां तक कि कई पाकिस्तानी भी होंगे, जो सुषमा स्वराज से गाढ़े समय में मिली मदद को नहीं भूलेंगे। उन्होंने साबित किया कि विदेश मंत्री भी सीधे जनसेवा कर सकता है, और ऐसा करते हुए उनका तकनीक कौशल तो विशेष रूप से उल्लेखनीय है। मंत्रालय की व्यस्त दिनचर्या के बीच ट्विटर पर निरंतर सक्रिय रहना, उसे सुशासन का एक सशक्त माध्यम बना लेना कोई उनसे सीखे। सभी दलों को यह प्रयास करना चाहिए कि ऐसे नेता देश को और मिलें और देश की सरकार को कोशिश करनी चाहिए कि उनकी अच्छी विरासत जारी रहे। यकीनन, उनकी कमी देर और दूर तक खलेगी।
 

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  • Web Title:Hindustan Editorial Column on 8th August