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केंद्र से क्यों खफा हैं दक्षिणी राज्य

एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार

दक्षिणी राज्य 15वें वित्त आयोग की शर्तों को लेकर काफी नाराज हैं। उनका आरोप है कि केंद्र संविधान की संघीय भावना का उल्लंघन कर रहा है। इस मुद्दे पर विचार-विमर्श के लिए पिछले हफ्ते तिरुवनंतपुरम में जुटे आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल व पुडुचेरी के प्रतिनिधियों का लहजा तो काफी तल्ख था। तमिलनाडु, ओडिशा और तेलंगाना के मुख्यमंत्रियों ने भी इस मसले पर केंद्र सरकार को अलग से चिट्ठियां लिखी हैं, जिनमें उन्होंने अपनी चिंता का इजहार किया है। वित्त आयोग की शर्तों से नाराज राज्यों की अगली बैठक विशाखापट्टनम में हो सकती है, जिसमें शामिल होने के लिए पश्चिम बंगाल, पंजाब और दिल्ली के अलावा भाजपा शासित मुख्यमंत्रियों को भी न्योता भेजा गया है। लेकिन टकराव मूलत: केंद्र और दक्षिणी राज्यों के बीच ही है।
सांविधानिक प्रावधानों के तहत हरेक पांच साल पर वित्त आयोग का गठन किया जाता है, ताकि यह तय किया जा सके कि केंद्र व राज्यों के बीच और राज्य-राज्य के बीच राजस्व के बंटवारे की रूपरेखा कैसी होनी चाहिए? दरअसल, राजस्व सामूहिक रूप से इकट्ठा किया जाता है और फिर उसके बंटवारे का एक फॉर्मूला तय होता है। इस संदर्भ में शर्तें तय करते समय वित्त आयोग किसी भी राज्य के राजस्व प्रदर्शन के अलावा कई अन्य मानदंडों पर भी गौर करता है। विवाद इन शर्तों को लेकर ही है। वित्त आयोग अक्सर राज्य की आबादी और उसकी आय के फासले को ध्यान में रखता है। इससे राजस्व बंटवारे की बड़ी शर्त अधिक गरीबी हो जाती है।
दक्षिणी राज्यों की मुख्य आपत्ति वित्त आयोग के इस फैसले को लेकर है कि उसने 2011 की आबादी को अपना आधार बनाया है, जबकि अब तक 1971 की जनसंख्या को ही मानदंड माना जाता रहा है। वैसे 14वें वित्त आयोग ने 2011 की जनसंख्या को 10 फीसदी अतिरिक्त महत्व दिया था, पर इस बार राजस्व बंटवारे में 2011 की आबादी को ही पूर्णत: आधार बनाया जाएगा। दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में अच्छा काम किया है। जैसे, 1971 से 2011 के बीच दक्षिण में ‘स्थानापन्न प्रजनन दर’ 2.1 या इससे भी कम रही है। दरअसल, यह दर इस बात से तय होती है कि प्रति महिला कितने बच्चों ने जन्म लिया? इससे यह पता चलता है कि स्थानानांतरण के बगैर एक पीढ़ी की जगह दूसरी पीढ़ी की जनसंख्या में कितनी बढ़ोतरी हुई? इस लिहाज से उत्तर प्रदेश और बिहार के मुकाबले दक्षिणी राज्यों की जनसंख्या वृद्धि कम रही है। ऐसे में, इन राज्यों को लग रहा है कि आबादी के नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन के लिए उन्हें वित्त आयोग ‘दंडित’ कर रहा है।
ऐसा आकलन है कि 1971 से 2011 के बीच तमिलनाडु और केरल की आबादी क्रमश: 56 और 75 फीसदी बढ़ी, जो देश के सभी राज्यों में सबसे कम हैं। दूसरी तरफ, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश की जनसंख्या दोगुनी हो गई। चूंकि लोकसभा में सदस्यों की राज्यवार संख्या का आधार 1971 की आबादी है, इसलिए दक्षिणी राज्य आर्थिक संसाधनों के बंटवारे की बुनियाद भी उसी को बनाने की मांग कर रहे हैं। आलोचकों का यह भी कहना है कि 15वें वित्त आयोग ने अपनी शर्तों में उन विषयों को भी शामिल कर लिया है, जो उसके दायरे में आते ही नहीं। जैसे, शर्तों में यह भी शामिल है कि ‘न्यू इंडिया 2022’ के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं में राज्यों के प्रदर्शन का भी आयोग मूल्यांकन करेगा। इसे राज्यों पर केंद्र प्रायोजित योजनाएं थोपने के रूप में देखा जा रहा है।    
तमिलनाडु ने पूर्व में ऐसी अनेक केंद्रीय योजनाओं का यह कहते हुए विरोध किया था कि वे योजनाएं अब बेमानी हो चुकी हैं या फिर राज्य के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने के अनुकूल नहीं हैं। जैसे, केंद्र की नि:शुल्क चावल वितरण योजना का उसने यह कहते हुए विरोध किया था कि वह इससे कहीं बेहतर योजना पहले से अपने राज्य में चला रहा है। अगला मसला ‘लोक-लुभावन’ कार्यक्रमों की समीक्षा का है। चूंकि नेताओं द्वारा चुनावों के वक्त मुफ्त में बिजली देने या उपहार बांटने से जुड़े कार्यक्रमों और राज्यों द्वारा कर्ज माफी को लोक-लुभावन माना जाता है, इसलिए वित्त आयोग इनकी भी समीक्षा करना चाहता है। लेकिन राज्य इसका जोरदार विरोध कर रहे हैं। उनकी दलील है कि ऐसी योजनाएं राज्य के आर्थिक विकास और सामाजिक उत्थान में मददगार साबित होती हैं। जैसे, मीड-डे मील योजना और बकरी व गाय बांटने की योजनाओं ने ग्रामीण आबादी के जीवन स्तर में सुधार किया है।
दक्षिणी राज्यों का आरोप है कि आयोग की शर्तों ने वित्तीय अनुशासन के महत्व को घटा दिया है। उनके मुताबिक, इन शर्तों ने राजस्व आवंटन को अधिक जनसंख्या वाले प्रांतों की तरफ झुका दिया है। दक्षिणी राज्य केंद्र के इस दावे को भी खारिज करते हैं कि 14वें वित्त आयोग में अभूतपूर्व कदम उठाते हुए कुल राजस्व का 42 फीसदी हिस्सा राज्यों को हस्तांतरित कर दिया था, जो कि पूर्व के वित्तीय वर्ष के आवंटन में 10 प्रतिशत का इजाफा था। राज्यों का कहना है कि यह ‘अधिक धन’ आवंटन नहीं था, बल्कि ‘अधिक संगठित’ कोष का आवंटन था। केंद्र सरकार का कहना है कि उसका खुद का राजस्व दायरा सीमित है और दक्षिणी राज्यों को रक्षा व राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में बढ़े खर्चे को भी ध्यान में रखना पड़ेगा। मगर दक्षिण के राज्य इस दलील से संतुष्ट नहीं हैं। उनका सवाल है कि यदि बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए केंद्र सरकार ने 80,000 करोड़ रुपये दिए, तो इसमें गलती किसकी है?
बहरहाल, दक्षिणी राज्यों के वित्त मंत्रियों की इस बैठक ने, जिनमें से अनेक एनडीए के बाहर के दल हैं, केंद्र को बेचैन तो किया ही है। इसीलिए प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री ने उनकी चिंताओं को ‘अनावश्यक’ बताया है। प्रधानमंत्री मोदी ने तो पिछले दिनों चेन्नई में एक बैठक में बेहतर जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को पुरस्कृत करने की बात भी कही। लेकिन दक्षिणी राज्य विभिन्न आकलनों से यह दिखा रहे हैं कि उन्हें राजस्व का नुकसान होने जा रहा है।
साफ है, 15वें वित्त आयोग की शर्तों के विरोध की वजह आर्थिक तो है ही, राजनीतिक भी है। राज्य इसे अपने अधिकारों के अतिक्रमण के रूप में देख रहे हैं। अगले आम चुनाव में अब बस एक साल बचा है। ऐसे में, क्षेत्रीय दल और विरोधी पार्टियां संघवाद का मुद्दा उठाएंगी ही। यह मसला चुनाव में अहम भूमिका निभाएगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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