जारी रहेगी विरासत पर दावे की जंग

Oct 12, 2022 10:39 pm ISTPankaj Tomar राहुल वर्मा, फेलो, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च ,
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शिव सेना की विरासत की जंग को भले फौरी तौर पर सुलझाया गया है, लेकिन असली राजनीतिक लड़ाई अभी शेष है। निर्वाचन आयोग ने उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे, दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित...

जारी रहेगी विरासत पर दावे की जंग

शिव सेना की विरासत की जंग को भले फौरी तौर पर सुलझाया गया है, लेकिन असली राजनीतिक लड़ाई अभी शेष है। निर्वाचन आयोग ने उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे, दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित कर दिए हैं। दोनों ने अपनी-अपनी पार्टी के नाम में शिव सेना को भी शामिल किया है और बाला साहेब भी। जैसे, उद्धव ठाकरे के गुट का नाम शिव सेना उद्धव बाला साहेब ठाकरे है, तो एकनाथ शिंदे की पार्टी का बालासाहेबंची शिव सेना। हालांकि, शिव सेना का मूल चुनाव चिह्न (धनुष-बाण) किसी गुट को नहीं मिला है। उद्धव ठाकरे के पास ‘जलती मशाल’ है, तो एकनाथ शिंदे के पास ‘दो तलवार और एक ढाल’। उल्लेखनीय यह है कि दोनों गुटों को मिले चिह्न भी खास हैं। दरअसल, इतिहास बताता है कि दोनों चिह्न शिव सेना की राजनीतिक यात्रा में शामिल रहे हैं। 1968 के बृह्नमुंबई महानगरपालिका चुनाव (बीएमसी) में पार्टी के कुछ उम्मीदवारों ने ढाल और दो तलवार के चिह्न पर चुनाव लड़ा था, तो 1990 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में, जब शिव सेना का एकमात्र विधायक चुना गया था, उसे वह जीत मशाल के चुनाव चिह्न पर मिली थी।
देखा जाए, तो यह बड़ी लड़ाई थी भी नहीं। विरासत का असली फैसला राजनीतिक रूप से ही निकलेगा। लिहाजा, आने वाले दो-तीन वर्षों में, जब स्थानीय राजनीति परवान चढ़ेगी, तब यह पता चल सकेगा कि बाला साहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत आखिर किस गुट को मिली है। बहुत संभव है कि दोनों में से कोई एक पार्टी बचे। यानी, एक गुट मजबूती से आगे बढ़ेगा, तो दूसरा कमजोर होकर निढाल पड़ जाएगा। इन सबमें यह भी देखना होगा कि आखिर में राज ठाकरे किस गुट के साथ खडे़ होते हैं और किस तरह से वह आने वाली राजनीति को प्रभावित कर पाते हैं?

उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे, दोनों इस सच से वाकिफ हैं। संभवत: इसीलिए, दोनों नेताओं ने दशहरा के दिन अलग-अलग रैलियां कीं और एक-दूसरे पर शब्दों से तीखे प्रहार किए। उद्धव के पास विशेषकर मुंबई के संगठन के लोग हैं, तो शिंदे की ताकत महाराष्ट्र के अन्य जिलों के कार्यकर्ता हैं। निर्वाचन आयोग ने अब अपना फैसला दे दिया है, लेकिन शिव सेना की असली विरासत का फैसला तो अगले वर्ष होने वाले बीएमसी चुनावों से ही होगा।
बीएमसी पर पिछले करीब दो दशकों से शिव सेना का राज है। देश की इस सबसे अधिक साधन-संपन्न महानगरपालिका के आस-पास ही उसकी राजनीति घूमती रही है। मगर पिछले चुनाव में भाजपा व शिव सेना ने अलग-अलग चुनाव लड़े और दोनों के बीच सीटों का अंतर महज दो रहा। उस चुनाव में शिव सेना को जहां 84 सीटें मिली थीं, तो भाजपा ने 82 सीटों पर कब्जा किया था। यह संकेत है कि मुंबई में शिव सेना के पास जो ताकत होती थी, उसमें सेंध लग चुकी है। ऐसे में, अगर शिंदे गुट और भाजपा ने मिलकर इस बार बीएमसी में बाजी मार ली, तो उद्धव ठाकरे की सियासी राह काफी मुश्किल हो सकती है।

फिलहाल बीएमसी चुनावों की तीन तस्वीरें दिख रही हैं। पहली, बालासाहेबंची शिव सेना और भाजपा बहुत मामूली अंतर से चुनाव जीत जाएं। इससे शिव सेना की विरासत की जंग कुछ दिन और चल सकती है। दूसरा परिदृश्य, उद्धव ठाकरे को करारी मात मिल जाए, जिसके बाद उनकी आगामी राजनीति को काफी चोट पहुंचेगी। और, तीसरी तस्वीर यह कि उद्धव ठाकरे की पार्टी चुनाव जीत जाए। इससे उनका राजनीतिक कद तो बढ़ जाएगा, लेकिन विरासत की उनकी लड़ाई फिर भी खत्म नहीं होगी, क्योंकि राज्य की सत्ता बालासाहेबंची शिव सेना और भाजपा के पास है। ऐसे में, अगले दो साल तक (जब तक विधानसभा चुनाव नहीं होते) एकनाथ शिंदे का पलड़ा ही भारी जान पड़ता है, क्योंकि उद्धव ठाकरे पर लगाम लगाने की वह कोशिशें करते रहेंगे। उनकी राजनीतिक शैली भी काफी हद तक बाला साहेब से मिलती है। हालांकि, उद्धव ठाकरे को पूरी तरह खारिज करना भी सही नहीं होगा, जब तक कि बीएमसी के चुनाव नहीं हो जाते।
भाजपा दीर्घावधि की रणनीति के तहत यहां काम कर रही है। शिव सेना भले ही उसका पुराना साथी दल रहा हो, लेकिन विशेषकर नरेंद्र मोदी के केंद्र में सत्तासीन होने के बाद उसे यह एहसास हो चला है कि शिव सेना से उसे खास फायदा नहीं मिल रहा। यही कारण है कि भाजपा अपने दम पर पूरे महाराष्ट्र में विस्तार करना चाहती है, और इस काम में यदि शिव सेना के दोनों गुट कमजोर होते हैं, तब भी उसकी सेहत पर फर्क नहीं पड़ेगा। अलबत्ता वह और मजबूत होकर उभरेगी, क्योंकि तब राज्य में हिंदुत्ववादी राजनीति का एकमात्र केंद्र उसे ही समझा जाएगा।

इस पूरे घटनाक्रम में जिसे सबसे ज्यादा नुकसान होता दिख रहा है, वह है कांग्रेस। साल 2014 तक वह प्रदेश में सरकार का नेतृत्व करती थी, लेकिन अब चौथे नंबर की पार्टी बन गई है और उसका सिकुड़ना लगातार जारी है। यहां तक कि मौजूदा राजनीतिक हलचल में भी वह चर्चा से दूर है। ऐसा लगता है कि आने वाले समय में महाराष्ट्र की राजनीति के दो ही मुख्य केंद्र होंगे- एक भाजपा और दूसरा, एनसीपी (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी)। बाकी पार्टियां इनके ईद-गिर्द ही होंगी।
जाहिर है, महाराष्ट्र का मौजूद राजनीतिक घटनाक्रम जब तक शांत नहीं हो जाता, तब तक यह बता पाना मुश्किल है कि राष्ट्रीय राजनीति पर इसका क्या असर होगा? यहां से लोकसभा की 48 सीटें हैं और पिछले  आम चुनाव में, जब शिव सेना और भाजपा मिलकर चुनाव लड़ीं, तो गठबंधन को 41 सीटें मिलीं। शिव सेना का मूल मतदाता यदि उद्धव ठाकरे के पक्ष में मजबूती से खड़ा रहा, तो अगले लोकसभा चुनावों में भाजपा को यहां नुकसान हो सकता है। मगर भाजपा इस स्थिति के लिए खुद को तैयार भी कर रही है। वह आगामी चुनावों में शिव सेना के संगठनों पर निर्भर नहीं रहना चाहती, बल्कि मतदाताओं तक खुद पहुंचना चाहती है। अल्पावधि में नुकसान के बावजूद वह यहां खुद को लंबी दौड़ में देख रही है। महाराष्ट्र के पिछले छह महीने के घटनाक्रम उन पार्टियों के लिए भी सबक हैं, जिनकी राजनीति एक परिवार पर टिकी हुई है। यह बताता है कि अगर राजनीतिक अस्तित्व सिर्फ पारिवारिक कुनबे के भरोसे रहा, तो किसी न किसी दिन उसमें दरार पड़ सकती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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