hindustan cyber sansar column on 9th November - कौन भड़का रहा है बेवजह विवाद DA Image
13 नबम्बर, 2019|12:46|IST

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कौन भड़का रहा है बेवजह विवाद

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एक नक्शे के आने से आग कैसे भड़कती है, यह नेपाल में कालापानी विवाद ने स्पष्ट कर दिया है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित कालापानी उस त्रिकोण पर है, जहां चीन और नेपाल की सीमाएं मिलती हैं। काली नदी का उद्गम स्थल है यह इलाका। नदी के पार नेपाल का दार्चूला जिला है, और इस पार भारत का हिस्सा धारचूला। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के अंतर्गत आने वाला धारचूला नगर पंचायत है। 1962 के युद्ध के बाद से इस जगह पर इंडो-तिब्बत पुलिस की तैनाती रहती है। तिब्बत की तरफ जाने वाला लिपुलेख दर्रा यहां से 17 किलोमीटर की दूरी पर है। ऐसी सामरिक रूप से अहम जगह के बारे में शनिवार को भारत का पुराना वाला नक्शा नए सिरे से प्रकाशित हुआ, तो नेपाली मीडिया ने बवाल मचा दिया। 


नेपाली मीडिया में बैठे कुछ लोगों ने दावा किया कि भारत ने नए नक्शे में नेपाली हिस्से वाले दार्चूला को निगल लिया है। इस रिपोर्ट के बाद स्वाभाविक था कि सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक आग लगती। केपी शर्मा ओली सरकार भी व्यापक विरोध को लेकर दबाव में थी। वे तमाम दावे किए जाने लगे, जिससे काली नदी के भारत वाले हिस्से को नेपाली भूभाग मान लेने की गलतफहमी आम नेपालियों में पैदा हो गई। नेपाल सरकार ने नक्शा जारी होने के पांच दिनों बाद बुधवार को बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि नेपाल सरकार अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमा की रक्षा के वास्ते कृत संकल्प है, मित्र देशों से सीमा संबंधी किसी विवाद को हम ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर सुलझाने का प्रयास करेंगे।


सवाल यह है कि यही बयान ओली सरकार की ओर से 24 घंटे में क्यों नहीं आए? क्या ठंडे बस्ते में पडे़ इस विषय को जान-बूझकर फैलने दिया गया? इस बयान से ओली सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि कालापानी विवादित विषय है। इधर भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने स्पष्ट किया कि नए नक्शे में नेपाल से लगे किसी भी सीमाई इलाके को हमने संशोधित नहीं किया है। इस नक्शे में पूरी सटीकता के साथ भारतीय भूभाग को चित्रित किया गया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का स्पष्ट आशय था कि नक्शे के पुनर्प्रकाशन में किसी तरह की गलती नहीं हुई है।


कालापानी विवाद कोई साठ साल पुराना है। 1961, 1997 और 1998, ये तीन ऐसे कालखंड हैं, जो कालापानी विवाद की दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। नेपाल : स्ट्रैटजी फॉर सर्वाइवल के लेखक और जाने-माने अमेरिकी स्कॉलर लियो इ रोज ने माना था कि यह नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का पुराना एजेंडा रहा है। सितंबर 1961 में जब कालापानी विवाद उठा था, उस समय तत्कालीन सरकारों ने तय किया था कि द्विपक्षीय बातचीत के आधार पर इसे हम सुलझा लेंगे। 


दरअसल, नेपाल की दावेदारी पश्चिमी सीमा से लगे साढ़े पांच वर्ग किलोमीटर वाले ‘लिपु गद’ को लेकर है। वह चाहता है कि सामरिक महत्व वाला लिपुलेख दर्रा, इस बहाने उसके हिस्से में आ जाए, ताकि तिब्बत के लिए सबसे निकट का मार्ग नेपाल को हासिल हो जाए। इससे उलट भारतीय सर्वे अधिकारी 1830 का नक्शा पेश करते रहे हैं, जिसमें पिथौरागढ़ तब के अल्मोड़ा जिले में आता था। कालापानी और पिथौरागढ़ 1830 के दौर में अल्मोड़ा जिला प्रशासन द्वारा नियंत्रित होता था, ये सारे दस्तावेजी प्रमाण उभयपक्षीय बातचीत में प्रस्तुत होते रहे हैं। 


इसके पूर्व 4 मार्च,1816 को मकवानपुर में नेपाल की ओर से चंद्रशेखर उपाध्याय और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से जनरल डेविड ऑक्टरलोनी ने सुगौली संधि के दस्तावेज एक-दूसरे को सौंपे थे। ये कागजात भी 1961 के बाद की उभयपक्षीय बैठकों में रखे जाते रहे हैं। मगर सुगौली संधि की तमाम शर्तों पर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के नेता किंतु-परंतु लगाते रहे। त्रिभुवन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ज्ञानेंद्र पौडेल ने 2013 में प्रकाशित एक रिसर्च पेपर में यह स्वीकार किया कि नेपाल-भारत के बीच 54 स्थानों पर जो सीमा विवाद है, उसकी जड़ें सुगौली संधि में हैं। प्रोफेसर पौडेल ने यह ज्ञान दिया कि इस विवाद को निपटाने के लिए हम संयुक्त राष्ट्र की मदद क्यों न लें? इससे समझा जा सकता है कि नेपाल का थिंक टैंक पहले से एक खतरनाक इरादे की पृष्ठभूमि तैयार कर रहा था।
अब तक कालापानी विवाद नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का मुखर एजेंडा रहा है, मगर अब नेपाली कांग्रेस के लिए भी यह राजनीति चमकाने का अवसर बनता जा रहा है। नेपाली कांग्रेस के सांसद दिल संग्रोला ने बयान दिया है कि नेपाल की जनता कालापानी, लिपुलेख और लिपिंया धुरा को भारतीय नक्शे में देखना स्वीकार नहीं करेगी। पर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचंड’ के बयान को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। पश्चिमी नेपाल के दांग में पत्रकारों से बात करते हुए प्रचंड ने कहा, ‘कालापानी पर एकतरफा फैसला लिया गया था। ओली सरकार और राजनीतिक दल इसे गंभीरता से लें।’ अर्थात आग कहां से फैली है, उसे ढूंढ़ने के वास्ते इधर-उधर जाने की आवश्यकता नहीं है।
लेकिन क्या वाकई नेपाली भूभाग के प्रति भारत की नीयत खराब रही है? जिसने वास्तव में जमीन हड़पी है, उसके विरुद्ध बोलने की नेपाल में हिम्मत नहीं है। नेपाल में जो लोग इस आग को हवा दे रहे हैं, वे कम से कम कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट देख लें। नेपाल के चार उत्तरी जिले संखुवासभा, रसुवा, सिंधुपाल्चोक और हुमला में 36 हेक्टेयर भूमि चीन हड़प चुका है। चार साल पहले, नेपाली कैलेंडर के अनुसार, ‘साउन 5 गते 2072’ से नेपाल सरकार के राष्ट्रीय सचिवालय, ‘सिंह दरबार’ में यह रिपोर्ट धूल फांक रही है। रिपोर्ट देने वाले सर्वेयर ने 11 ऐसे स्थानों की फेहरिस्त मंत्रालय को भेजी, जिस पर प्रधानमंत्री कार्यालय चुप्पी साध गया। क्योंकि वह चीन से सीधा टकराना नहीं चाह रहे थे। 
सवाल यह है कि इस अनावश्यक आग को भड़काने के पीछे केवल चीनपरस्त प्रतिक्रियावादी कैसे हो सकते हैं? पाक दूतावास क्या कर रहा है? उसे कश्मीर के नए नक्शे को लेकर दर्द है, तो नेपाल के बरास्ते इस दर्दे-दिल को साझा क्यों न करे? खुफिया एजेंसियों को पता करना चाहिए कि काठमांडू स्थित पाक राजदूत मजहर जावेद किस हद तक कश्मीर के सवाल पर नेपाल के नौजवानों को गुमराह करते रहे हैं?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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