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ट्रंप की अफगान उलटबांसी के बाद

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जब सक्रिय हो जाते हैं, तो उनसे किसी भी तरह की कूटनीतिक पहल हो सकती है। अमेरिका-तालिबान वार्ता से जुड़ा नया घटनाक्रम कुछ ऐसा ही है, जो हमें हैरत में डालता है। खुद ट्रंप ने इसका खुलासा बीते 7 सितंबर की रात अपने एक के बाद कई ट्वीट से किया। देखा जाए, तो ट्रंप की अफगान नीति यह समझने का एक ज्वलंत उदाहरण है कि कोई नीति आखिर कितनी अस्थिर हो सकती है।

अगर हम समझना चाहें कि डोनाल्ड ट्रंप अब आगे क्या कर सकते हैं, तो हमारे लिए यह जानना उपयोगी होगा कि अफगानिस्तान में अमेरिका की मौजूदगी को लेकर उनकी क्या सोच है। ट्रंप राष्ट्रपति के रूप में अपने चयन से पहले अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की उपस्थिति के खिलाफ थे। वह चाहते थे कि अमेरिकी सेना अपने मुल्क वापस लौट आए। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने अपनी सरकार की अफगान नीति को तैयार करने में आठ महीने खर्च किए, और उसके बाद व्यक्तिगत जिम्मेदारी लेते हुए 21 अगस्त, 2017 को वर्जीनिया के फोर्ट मायर से इसकी घोषणा की। 

तब उन्होंने कहा था कि वह तीन बुनियादी निष्कर्षों पर पहुंचे हैं, जहां अमेरिका को भी पहुंचना होगा- 'सम्मानजनक और टिकाऊ हल' की तलाश, ‘तुरंत निकलने’ से परहेज और यह मानना कि अफगानिस्तान और उसके आस-पास के क्षेत्रों में अमेरिका ‘सुरक्षा खतरों’ का सामना कर रहा है। ट्रंप ने तब यह भी कहा था कि अफगानिस्तान में अमेरिका की मौजूदगी ‘समय आधारित’ नहीं, बल्कि ‘शर्त आधारित’ होगी, और यह अमेरिकी वर्चस्व के सभी तत्वों को ‘एक’ करेगी। ट्रंप ने पाकिस्तान को चेतावनी भी दी थी कि ‘अपराधियों और आतंकियों को पनाह देना यदि उसने जारी रखा, तो उसके पास खोने के लिए काफी कुछ होगा’। हालांकि तालिबान का खैरख्वाह बनने के लिए पाकिस्तान को चेताते हुए वह आतंकी संगठनों और इस गुट के बीच दूरी बताने को लेकर खासा सतर्क दिखे थे। साफ था कि राष्ट्रपति ट्रंप ने अफगानिस्तान के लिए राजनीतिक समझौते की जो संभावना खोजी, उसमें तालिबान को भी शामिल करने की बात थी।

अमेरिका की मंशा तालिबान पर सैन्य दबाव बढ़ाने की तो थी, लेकिन पाकिस्तान पर भी यह दबाव बनाना था कि वह उन्हें सुरक्षित पनाह न दे, ताकि तालिबान अफगान हुकूमत के साथ वार्ता की मेज पर बैठ सकें। मगर पाकिस्तान को दी गई सख्त चेतावनी काम नहीं आई और न ही अमेरिकी सैन्य व खुफिया मदद हासिल करने वाले अफगान सुरक्षा बल तालिबान को पीछे धकेलने में सफल रहे। ट्रंप को अफगानिस्तान में विरासत में मिला सैन्य गतिरोध जारी रहा, क्योंकि राष्ट्रपति अशरफ गनी और मुख्य कार्यकारी अब्दुल्ला के नेतृत्व में बनी ‘नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट’ भी दिशाहीन रही और इसके तमाम प्रतिनिधि अलग-अलग सुर अलापने लगे।

पाकिस्तान को यदा-कदा चेतावनी देने के बावजूद  साल 2018 की शुरुआत तक ट्रंप ने अगस्त, 2017 के अपने बयान से पूरी तरह किनारा कर लिया था। यहां तक कि अमेरिका ने उस बुनियादी रुख को भी पीछे छोड़ दिया, जिसकी यह अनिवार्य शर्त थी कि अमेरिका-तालिबान वार्ता से पहले तालिबान को अफगान सरकार में शामिल होना होगा। इससे यह साफ हो गया कि ट्रंप प्रशासन कूटनीतिक हताशा की स्थिति में है और ‘नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट’ को बीच मझधार में छोड़ना चाहता है। इससे भी अधिक वह इस सच को भुलाने को तैयार बैठा था कि संघर्ष के दिनों में तालिबान ने अफगानिस्तान में 2,300 से अधिक अमेरिकी सैनिक मार गिराए थे। याद रहे कि अमेरिका को पहले तालिबान से कोई समस्या नहीं थी। छत्तीस का यह आंकड़ा तो तब शुरू हुआ, जब इस गुट ने अल कायदा से अपने रिश्ते जोड़े और 9/11 के बाद ओसामा बिन लादेन को सौंपने से इनकार कर दिया।

दस महीने तक चली इस शांति वार्ता के दौरान यही दिखा कि तालिबान एकसूत्री मांग पर आगे बढ़ रहा है- अमेरिकी सैनिकों की हर हाल में वापसी और अफगान सरकार में शामिल होने से इनकार। आखिरकार, अमेरिका ने तालिबान के आगे घुटने टेक दिए। अमेरिका इसके लिए भी तैयार था कि अगर तालिबान अपने नियंत्रण वाले इलाकों में आतंकी गुटों को कार्रवाई करने के लिए पनाह न देने का आश्वासन दे, तब भी वह समझौता कर लेगा। लेकिन तालिबान ने उसकी यह बात भी नहीं मानी। यह अमेरिका का समर्पण था। 
इस आत्म-समर्पण का कारण स्वाभाविक तौर पर अमेरिकी तंत्र था। दरअसल, राष्ट्रपति ट्रंप को कैंप डेविड में कूटनीतिक नाटक की अध्यक्षता का प्रलोभन दिया गया, ताकि तालिबान को ‘नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट’ में शामिल किया जाए और उसे संघर्ष-विराम के लिए सहमत किया जा सके। मगर उन्होंने तालिबान द्वारा अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना पर हमले का जोखिम न उठाने का फैसला किया, जबकि उसके प्रतिनिधि कैंप डेविड में मौजूद थे।

अब ट्रंप के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उनके पास वास्तव में कोई विकल्प है? वह तालिबान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान को व्यापक बनाने और पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए डूरंड रेखा पार करने की कार्रवाई तब तक नहीं करेंगे, जब तक कि वह असलियत में अपनी बातों को लेकर गंभीर नहीं होंगे। और, ऐसा होने की बहुत ज्यादा संभावना नहीं है। इसीलिए आने वाले दिन तालिबान के लिए शायद ही कठिन होंगे। अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों में धीरे-धीरे कटौती भी की जा सकती है। यह सब कुछ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि अफगानिस्तान का राजनीतिक वर्ग क्या रुख अपनाता है। वह अपनी अक्षमता कायम रखेगा या फिर उसे सुधारेगा? यह दुखद है कि न तो हामिद करजई और न ही अशरफ गनी अफगानिस्तान को जोड़कर रखने और उसके तमाम विरोधाभासों को समेटने के लिए एक बेहतर नेतृत्व साबित हो सके हैं। इसीलिए अफगानिस्तान की अस्थिरता फिलहाल जारी रहेगी।

इन परिस्थितियों में भारत को अपने हितों की रक्षा के लिए यर्थाथवादी नीतियां अपनानी होंगी। नई दिल्ली को अफगान सरकार के साथ अपने मैत्रीपूर्ण रिश्ते तो आगे बढ़ाने ही होंगे, तालिबान से भी बातचीत का विकल्प खुला रखना होगा। कूटनीतिक दुनिया का आखिर यही तो दस्तूर है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan blog on 11 september