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21 जनवरी, 2020|2:55|IST

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क्यों आंदोलित हो रहा है पूर्वोत्तर

उस रात जब संसद में नागरिकता कानून में बदलाव के लिए चर्चा चल रही थी, तब गुवाहाटी की सड़कों पर यूनिवर्सिटी के छात्र विरोध में मार्च कर रहे थे। कुछ महीने पहले भी ऐसे विरोध-प्रदर्शन से असम में जनजीवन बाधित हो गया था। नारे वही थे, जोय आइ असम।  चिंता वही थी, ‘खिलोंजिया’ (मूल निवासी) के अधिकार।  जब आधी रात को लोकसभा ने संशोधन विधेयक पारित किया, तब असम के पड़ोसी राज्यों में भी विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए। भाजपा ने नागरिकता को फिर परिभाषित करने की नई कोशिश करके इस पुराने सवाल को जिंदा कर दिया है कि कौन स्थानीय है और कौन बाहरी? 

इस संशोधन का असम में सबसे मुखर और स्पष्ट विरोध चौंकाता नहीं है। असम के लोगों को ऐसा लग रहा है कि उन्हें किनारे कर दिया गया है। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि उन राज्यों में यह कानून लागू नहीं होगा, जो इनर लाइन परमिट या छठी अनुसूची के दायरे में आते हैं। असम के कुछ ही जिलों में छठी अनुसूची लागू है। छठी अनुसूची जनजातीय परिषदों को ज्यादा स्वायत्तता देती है। चूंकि असम इनर लाइन परमिट वाला राज्य नहीं है, इसलिए यह पूर्वोत्तर का अकेला ऐसा राज्य बन जाएगा, जहां बांग्लादेश से आए अवैध हिंदू शरणार्थी बसाए जा सकेंगे। केंद्रीय गृह मंत्री ने मणिपुर को आश्वस्त किया है कि उसे भी इनर लाइन परमिट व्यवस्था के दायरे में लाया जाएगा। 

स्वाभाविक है, ऑल असम स्टूडेंट यूनियन और अन्य अनेक नागरिक संगठन ठगा महसूस कर रहे हैं। जो असम समझौता हुआ था, उसमें सहमति बनी थी कि 1971 से पहले जो लोग असम में आ गए हैं, उन्हें नागरिकता दी जा सकती है, लेकिन अब भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार 2014 तक आए अवैध शरणार्थियों को भी नागरिकता देगी। अकेले असम में लाखों लोगों को नागरिकता मिल जाएगी। पूर्वोत्तर में 238 मूल जनजातियां ऐसी हैं, जो आस्था से हिंदू नहीं हैं। पूर्वोत्तर के सात राज्यों की जनजातियां परस्पर मिलकर रहने पर कमोबेश सहमत हैं, लेकिन बाहरी लोगों को यहां बसाने की किसी भी कोशिश के प्रति सभी सशंकित हैं। चिंता सभी बाहरी लोगों को लेकर है, धर्म यहां कतई मायने नहीं रखता। मिसाल के लिए, अरुणाचल प्रदेश बौद्ध चकमा को नागरिकता देना नहीं चाहता, मिजोरम ब्रू और रियांग को बसाना नहीं चाहता। ये तीनों जनजातियां बांग्लादेश से आई हैं। 

अपनी पहचान बनाए रखने की कोशिशों के कारण जहां पहले से ही अस्थिर माहौल हो, वहां नागरिकता संशोधन विधेयक नए प्रकार के दोष ही पैदा करेगा। पूर्वोत्तर में पिछले दो दशकों में कमोबेश जो शांति रही है, उसका क्या होगा? क्या नए राष्ट्रीय कानून से इन राज्यों के छोटे जनजाति समूहों की नींद उड़ जाएगी? क्या यह एक स्थाई चुनाव मुद्दा बन जाएगा?

भाजपा ने 2019 के राष्ट्रीय चुनावों में अपने घोषणापत्र में इस वादे को शामिल किया था। चूंकि लोकसभा में भाजपा के सांसदों की संख्या बढ़ी है, इसलिए पार्टी ने यह सोचा कि लोग इस विधेयक का समर्थन करेंगे। यह मानना वाजिब होगा कि असम के जिन मतदाताओं ने भाजपा सांसदों को चुना है, उन्होंने नागरिकता संशोधन विधेयक के समर्थन में मत दिया है। उन्हें शायद अब अपना कदम गलत लग रहा है। लोगों को लग रहा है कि भाजपा ने असम को बाकी राज्यों से अलग कर दिया, ताकि इस कानून के विरोध की कमर टूट जाए। साथ ही, सत्ताधारी पार्टी के लिए पूरे पूर्वोत्तर से जूझने की बजाय केवल असम से निपटना आसान हो जाए। लेकिन भाजपा ने इस कानून के असर का गलत आकलन कर लिया है। जनजातियों में ज्यादातर लोग ईसाई हैं, वे इस कानून को शक की निगाह से देख रहे हैं। उन्हें लगता है, कानून का मकसद बांग्लादेश से आए हिंदुओं को बसाना है। 

उधर पिछले साल, बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने नागरिकता संशोधन विधेयक को भाजपा की चुनावी रणनीति बताकर खारिज कर दिया था। आगे चुनाव में क्या होगा, यह कहना मुश्किल है, पर इसमें शक नहीं कि इससे पूर्वोत्तर में तनाव बढ़ेगा। त्रिपुरा का उदाहरण सामने है कि कैसे कुछ ही दशकों में यहां के मूल निवासी 32 प्रतिशत आबादी तक सिमट गए। राज्य को अब ऐसे लोग चला रहे हैं, जो पूर्वी पाकिस्तान या बांग्लादेश से आए हैं। त्रिपुरा में बांग्ला बोलने वाली आबादी बहुसंख्यक हो गई है। ऐसी स्थिति कमोबेश क्षेत्र के दूसरे राज्यों में भी है। 

मेघालय के शिलांग में ही दस गुणा दस वर्ग किलोमीटर का एक बड़ा इलाका है, जिसे यूरोपीय वार्ड कहा जाता है। यह छठी अनुसूची से बाहर है। इस इलाके में भारी आबादी है। कुछ इलाकों में झुग्गियां हैं, जहां बांग्लादेशी मूल के लोग ने कब्जे कर रखे हैं। कानून का विरोध करने वाले जानते हैं कि मेघालय में 1.70 करोड़ बांग्लादेशी हिंदू हैं, जिनका दावा है कि उन्हें उनके देश में सताया गया।  ऐसे लोग अब मेघालय और असम की बराक घाटी में बसना पसंद करेंगे, क्योंकि यहां बांग्ला बोलने वाली आबादी पहले से ही बड़ी संख्या में रह रही है। मेघालय ने समाधान के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है।

इस कदम के राजनीतिक निहितार्थ क्या हैं? इस कानून के जरिए असम में चुनाव जीतने की योजना है या निशाने पर पश्चिम बंगाल है? पश्चिम बंगाल में कुछ लाख हिंदुओं को नागरिकता देकर भाजपा स्थाई वोट बैंक बना लेगी। यह ममता बनर्जी की उस तृणमूल कांग्रेस से लड़ने का एक तरीका है, जो मुसलमानों का अत्यधिक संरक्षण कर रही है, क्योंकि वे राज्य में एक मजबूत वोट बैंक हैं। पश्चिम बंगाल 42 सांसद और असम 14 सांसद भेजता है। दिलचस्प यह कि दोनों ही राज्यों में 2021 में चुनाव होने हैं। 

पूर्वोत्तर में बढ़ते तनाव को देखकर लगता है कि केंद्र सरकार को सीमा से आगे जाकर इस इलाके में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। भारत में अनगिनत विविधताएं हैं। इस देश में शासन करने वालों में दूरदर्शिता व बड़ा दिल होना चाहिए, ताकि वे तमाम विभेदों का समावेश भी करें और पूर्वोत्तर के लोगों की भावनाओं का भी पूरा ध्यान रखें। 
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)