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काश एक नई उड़ान शुरू हो पाती

हर्षवर्धन, पूर्व प्रबंध निदेशक, वायुदूत

करीब ढाई साल पहले 15 अगस्त, 2016 को लाल किले से प्रधानमंत्री ने गर्व से भरा एक एलान किया था। उन्होंने अपनी सरकार की उपलब्धि गिनाते हुए कहा था कि एअर इंडिया मुनाफे में आ गई है। मगर पिछले दिनों खबर आई कि सरकार ने इस एयरलाइन्स की 76 फीसदी हिस्सेदारी बेचने का मन बना लिया है। इसके लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया गया है। कंपनी में रणनीतिक विनिवेश करने की बात कही गई है। इसके अलावा, मुनाफे में चल रही एअर इंडिया एक्सप्रेस और संयुक्त उद्यम एअर इंडिया एयर ट्रांसपोर्ट सर्विसेज लिमिटेड यानी एआईएटीएसएल की हिस्सेदारी बेचने के लिए भी ईओआई जारी किए गए हैं। महज ढाई साल में ऐसा फैसला चौंकाने वाला है। 

हालात जिस तरफ जाते दिख रहे थे, उससे लगता है कि इसका पहले से मन बना लिया गया था कि एअर इंडिया का निजीकरण किया जाएगा। पिछले डेढ़ साल से जिस तत्परता से इस दिशा में दौड़ लगाई जा रही थी, वे स्पष्ट संकेत थे कि इसे बचाने की गंभीर कोशिश नहीं होने वाली। इसमें कोई शक नहीं कि एअर इंडिया की आर्थिक सेहत लगातार बिगड़ रही है। मगर सच यह भी है कि इसके लिए एअर इंडिया प्रबंधन से ज्यादा जिम्मेदार सरकारें रही हैं। हालिया वर्षों में लिए गए ज्यादातर नीतिगत निर्णय यही बता रहे हैं कि इसे मुश्किलों से निकालने की संजीदगी कभी नहीं दिखाई गई। 

कहा गया है कि इस पर लगभग 50 हजार करोड़ रुपये बकाया है, जिसमें से आधा नए खरीदार को हस्तांतरित किए जाएंगे। इसका अर्थ है कि करीब 25 हजार करोड़ रुपये का कर्ज सरकार माफ कर रही है। यह भी अपने आप में एक चौंकाने वाला कदम है। दुनिया में कहीं भी इस तरह का उदाहरण नहीं दिखता। एअर इंडिया के पास रियल एस्टेट एसेट (जमीन-जायदाद) काफी अधिक है, फिर भी उसे कौड़ियों के भाव में बेचा जाएगा, साथ ही 25 हजार करोड़ रुपये कर्ज-माफी का तोहफा भी दिया जाएगा। जब जीरो नेटवर्थ वाली निजी क्षेत्र की कंपनी सत्यम कंप्यूटर्स दिवालिया हुई थी, तो बाकायदा एक टीम बनाकर उसे बचाया गया था, मगर हजारों करोड़ों रुपये की परिसंपत्ति वाली एअर इंडिया को बचाने के लिए इस तरह का कोई प्रयास नहीं किया गया। 

हम एअर इंडिया को हमेशा से एक राष्ट्रीय संपत्ति मानते आए हैं। इसे राष्ट्रीय गौरव के साथ जोड़कर देखा जाता रहा है। इसने दुनिया भर में भारतीयता, भारतीय संस्कृति और इससे कहीं बढ़कर भारतीय कौशल को एक पहचान दी है। इसके इतिहास, इसकी भूमिका को हम नहीं भूल सकते। जब भी कहीं कोई आपदा आई, एअर इंडिया की सेवा ली गई। सैन्य जरूरतों में भी इसका इस्तेमाल किया गया। इसका अपना कूटनीतिक महत्व भी है। अभी भारत से इजरायल के बीच की उड़ान सिर्फ यही विमान सेवा दे रही है। इसलिए बहुत मुमकिन है कि आने वाले समय में हम इसके इस योगदान और इसकी इस कूटनीतिक भूमिका से वंचित हो जाएं। इस विमान सेवा को सिर्फ व्यावसायिक नजरिये से देखना गलत होगा। हमें एक और बात याद रखनी चाहिए कि जब किसी सार्वजनिक कंपनी के निजीकरण का शोर मचने लगता है, तो उसके कर्मचारी हताश हो जाते हैं। इससे उनके काम और कौशल पर बुरा असर पड़ता है। 

पहले यह चर्चा थी कि सरकार इसकी रियल एस्टेट परिसंपत्ति को अलग रखेगी और सिर्फ ऑपरेशनल यानी संचालन से जुड़ा हिस्सा बेचेगी। मगर ईओआई को देखकर जाहिर होता है कि अब वह संभावना खत्म कर दी गई है। स्पष्ट है, इसका जो भी नया खरीदार आएगा, उसकी रुचि इसकी जमीनी परिसंपत्तियों में ज्यादा होगी, क्योंकि ऑपरेशन के मोरचे पर इसे कई दुश्वारियों का सामना करना पड़ रहा है। अमूमन यही देखा गया है कि जब कोई निजी कंपनी किसी सार्वजनिक उपक्रम को खरीदती है, तो उसकी मंशा परिसंपत्तियों को बेचकर पैसे बनाने में ही ज्यादा होती है। विदेश संचार निगम लिमिटेड यानी वीएसएनएल का हश्र जगजाहिर है। यही डर एअर इंडिया के साथ भी है। 

इस विमान सेवा को अब भी बचाया जा सकता था। पिछले कुछ वर्षों में इसकी सेहत थोड़ी ही सही, पर संभली है। इतना ही नहीं, कई बड़ी-बड़ी निजी कंपनियां हैं, जिन पर एअर इंडिया से अधिक कर्ज है, फिर भी उन्हें कर्ज आसानी से मिल जाता है। जबकि एअर इंडिया तो सिर्फ 50 हजार करोड़ की कर्जदार है, और वह राशि भी इसकी कुल परिसंपत्ति के आगे कहीं नहीं ठहरती। इसे और कर्ज दिया जा सकता था। हमारे पास कई ऐसे उदाहरण हैं, जिसमें मामूली परिसंपत्ति वाली निजी कंपनियों को हद से अधिक कर्ज दिए गए। बैंकों को बढ़ता डूब कर्ज इसी का नतीजा है। मगर एअर इंडिया के मामले में यह दरियादिली नहीं दिखाई जा रही है, जबकि इसके कर्ज की वसूली इसकी परिसंपत्तियों से भी हो सकती है। 

अब देखना यह है कि इसे खरीदने कोई निवेशक सामने आता है या नहीं? यह तो साफ है कि ऑपरेशनल क्षमता के लिए नहीं, बल्कि इसकी रियल एस्टेट एसेट के लोभ में ही कंपनियां आएंगी। फिलहाल यह साफ नहीं है कि इसे रोकने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाएंगे? एक सवाल यह भी है कि यदि निवेशक कंपनी छह-आठ महीने बाद ही इसकी संपत्तियों को बेचकर अपना कारोबार समेट ले, तो उसे रोकने की क्या गारंटी है? कुल मिलाकर, एअर इंडिया जैसे सार्वजनिक उपक्रम का बिकना सरकारी उपक्रमों की कार्य-कुशलता की विफलता मानी जाएगी। उम्मीद यही है कि आने वाले दिनों में महाराजा से जुड़ी कुछ अच्छी खबर हमें मिले। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Harshavardhana article in Hindustan on 02 april