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अभी और बढ़ेंगे तेल के दाम

सौरभ चंद्र, पूर्व पेट्रोलियम सचिव, भारत सरकार

लगातार बढ़ रहे डीजल तथा पेट्रोल के दाम एक बार फिर सुर्खियों में हैं। आम जनता चिंतित भी है और परेशान भी। आखिर इस वृद्धि की वजह क्या है? इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने के लिए उपभोक्ताओं द्वारा पंपों पर भुगतान किए जाने वाले मूल्यों का विश्लेषण आवश्यक है। 

असल में, देश की बड़ी तेल-विक्रय कंपनियां तेल-शोधन और शोधित पदार्थों का विक्रय, दोनों काम करती हैं। शोधन कारखानों यानी रिफाइनरी से पेट्रोल और डीजल ‘रिफाइनरी ट्रांसफर प्राइस’ (आरटीपी) पर खरीदा जाता है। आरटीपी की गणना जरूर रुपये में की जाती है, लेकिन यह पेट्रोल और डीजल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों (जो डॉलर में गणना की जाती है) पर आधारित होती है। यह विश्व बाजार में कच्चे तेलों के दामों के आधार पर तय नहीं की जाती। इस प्रकार, आरटीपी अंतरराष्ट्रीय दामों और रुपया-डॉलर विनिमय दर, दोनों से प्रभावित होता है। हाल के दिनों में डॉलर की तुलना में रुपये में तेज गिरावट हो रही है। इसका सीधा असर आरटीपी में वृद्धि के रूप में देखने को मिल रहा है।

पेट्रो पदार्थों की मूल्य-वृद्धि में टैक्स की भी बड़ी भूमिका होती है। डीजल और पेट्रोल केंद्र और राज्यों के राजस्व के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। केंद्र इन पर उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) लगाता है, जो वर्तमान में पेट्रोल पर 19.48 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 15.33 रुपये प्रति लीटर है। इसके अलावा, पंपों पर उपभोक्ता वैट भी चुकाते हैं। ऐसे में, क्या इनके बढ़े दामों को नियंत्रित करने के लिए कुछ किया जा सकता है? 

सबसे पहले बात कीमत बढ़ने के मुख्य कारक अंतरराष्ट्रीय बाजार में मूल्य-वृद्धि की। अभी अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रो पदार्थों की कीमतों के बढ़ने की वजह भू-राजनीति है। अमेरिका ने ईरान पर 4 नवंबर, 2018 से प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। इस घोषणा के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता का एक दौर शुरू हो गया है। किसी भी बाजार में अनिश्चितता मूल्यों को अस्थिर करती है। विशेष रूप से जब आपूर्ति और मांग का रिश्ता एक महीन संतुलन पर टिका हुआ हो। इसमें सट्टेबाजों की चांदी हो जाती है। अभी यही हो रहा है, जिसका नुकसान भारत जैसे देशों को उठाना पड़ रहा है, क्योंकि हमारी अंतरराष्ट्रीय दामों को प्रभावित करने की क्षमता अत्यंत सीमित है।

हां, डॉलर के मुकाबले रुपये के अवमूल्यन को रोकने के लिए कारगर कदम जरूर उठाए जाने चाहिए। इसमें रिजर्व बैंक की भूमिका महत्वपूर्ण है। हमें निर्यात को प्रोत्साहित करना होगा और आयात नियंत्रित करने होंगे, ताकि व्यापार घाटा को कम किया जा सके। डॉलर-रुपये की सट्टेबाजी पर भी अंकुश लगाना होगा। 2013 में इस प्रकार के कुछ कदम उठाए भी गए थे, जिसका सकारात्मक असर हुआ था।

पेट्रो पदार्थों की मूल्य-वृद्धि में खासा भूमिका निभाने वाले उत्पाद शुल्क की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। यह भारत सरकार के राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। साल 2014-15 में हमने इससे 99,184 करोड़ रुपये राजस्व कमाए थे, तो 2015-16 में 1,79, 591 करोड़ रुपये। 2016-17 में यह आंकड़ा बढ़कर 2,42,691 करोड़ रुपये हो गया था और 2017-18 में घटकर 2,29,019 करोड़ रुपये। पिछले वित्तीय वर्ष में पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी दो रुपये प्रति लीटर कम किया गया था, जिसका प्रभाव 2017-18 के राजस्व संग्रह पर पड़ा है। लिहाजा इस वर्ष के शुरुआती महीनों के राजकोषीय घाटे को देखते हुए एक्साइज ड्यूटी में कमी की संभावना सीमित है।

रही बात वैट की, तो यह राज्य सरकारों द्वारा वसूली जाती है। समझना चाहिए कि एक्साइज ड्यूटी एक नियत शुल्क है, पर वैट नहीं। राज्यवार यह अलग-अलग दरों पर वसूली जाती है। अभी पेट्रोल पर 39.54 प्रतिशत की अधिकतम वैट मुंबई में है। हालांकि अधिकांश राज्यों में यह 25 प्रतिशत से अधिक है। इसी तरह, डीजल पर वैट की अधिकतम दर (28.31 प्रतिशत) आंध्र प्रदेश में है। वैट की दरों में कटौती की जा सकती है, खासकर जब इसको ‘केंद्रीय उत्पाद शुल्क’ और डीलरों के कमीशन पर भी लागू किया जाता है। 

वैट राज्यों के लिए राजस्व का आसान साधन है। इसमें जुटाने में उसे खर्च या प्रयत्न बहुत कम करना पड़ता है। पूर्व में जब केंद्र द्वारा केंद्रीय उत्पाद शुल्क कम किया गया था, तब अधिकांश राज्य सरकारों ने बिक्री कर या वैट में कटौती की सलाह को अनदेखा कर दिया था। अब राहत देने की बारी राज्य सरकारों की है। प्रजातंत्र में दबाव समूह और जनमत की खासा महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि वैट की गणना से केंद्रीय उत्पाद शुल्क और डीलरों को दिया जाने वाला कमीशन हटा लिया जाता है, तब भी ग्राहक को चार से पांच रुपये प्रति लीटर की राहत मिल सकती है। मगर सवाल यह है कि क्या राज्य सरकारें इसके लिए तैयार होंगी?

अभी पेट्रोल, डीजल, प्राकृतिक गैस, विमानों के ईंधन और कच्चे तेल को जीएसटी के बाहर रखा गया है। इनको जीएसटी में लाने की चौतरफा मांग हो रही है। भविष्य में प्राकृतिक गैस तथा विमान ईंधन को जीएसटी में शामिल कर भी लिया जाए, मगर पेट्रोल और डीजल को शायद ही इसमें शामिल किया जाएगा। इन पर कर की दर इतनी अधिक है कि वे जीएसटी की वर्तमान दर के ढांचे में नहीं आएंगे। इनके लिए एक नई उच्च दर लानी पड़ेगी। यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो फिर राजस्व का भारी घाटा होगा। 

दरअसल, पेट्रोलियम ऐसी कॉमोडिटी है, जिस पर दुनिया में सबसे ज्यादा राजनीति होती है। इसकी कीमत मांग-आपूर्ति के संतुलन के अलावा भू-राजनीति और भू-आर्थिकी पर भी निर्भर करती है। भारत में हालांकि शोधन की क्षमता मांग से अधिक है और पेट्रोलियम उत्पाद का हम ‘नेट एक्सपॉर्टर’ यानी शुद्ध निर्यातक हैं, मगर कच्चे तेल की लगभग 82 प्रतिशत की पूर्ति आयात से ही होती है। यही वजह है कि जब कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय दाम बढ़ते हैं, तो पेट्रोल और डीजल की कीमत भी उसी दिशा में चल पड़ती है।

बहरहाल, मौजूदा परिस्थितियों का गुणा-गणित यही कहता है कि उपभोक्ताओं को आने वाले दिनों में पेट्रो पदार्थों की अधिक कीमत चुकाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। केंद्र और राज्यों की आर्थिक सेहत को देखते हुए करों में कटौती करके दाम कम करना व्यावहारिक नहीं लग रहा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Former Petroleum Secretar Saurabh Chandra article on 06 september