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पाकिस्तान को मिला एक और जिन्ना

विभूति नारायण राय पूर्व आईपीएस अधिकारीविभूति नारायण राय पूर्व आईपीएस अधिकारी

अपनी आत्मकथा रोजेज इन दिसंबर  में मोहम्मद अली जिन्ना के तत्कालीन सचिव एमसी छागला ने एक दिलचस्प संस्मरण दर्ज किया है कि 1923 के चुनावों के दौरान उम्मीदवार जिन्ना और वह जब थककर हैम सैंडविच और कॉफी के लिए किसी रेस्तरां में बैठे ही थे कि एक बुजुर्ग मुस्लिम समर्थक छोटे से बच्चे के साथ उन्हें ढूंढ़ता हुआ पहुंच गया। छागला रोचक अंदाज में अपनी उस दुविधा का बयान करते हैं, जिसमें एक तरफ तो वह दुआ कर रहे थे कि उस भोले-भाले दढ़ियल प्रशंसक को पता न लगे कि उसका नायक सूअर के मांस से बना खाद्य खा रहा है, दूसरी ओर उनकी चिंता यह भी थी कि जिन्ना ललचाई आंखों से प्लेट की तरफ देखने वाले बच्चे को हैम सैंडविच का कोई टुकड़ा न बढ़ा दें।

समकालीनों के संस्मरणों और बाद के जीवनीकारों की पुस्तकों में ऐसे तमाम प्रसंग हैं, जिनके चलते जिन्ना किसी कट्टरपंथी की जगह एक ढुलमुल-यकीन मुसलमान के रूप में अधिक नजर आते हैं। क्या यह विलक्षण संयोग नहीं है कि मध्ययुगीन धार्मिक प्रतीकों का सहारा लेने वाले  और भीतर से गहरे आस्तिक महात्मा गांधी ने अपने राजनैतिक कार्यक्रमों से पहली बार भारत में किसी सेकुलर राज्य की नींव डाली और उनके बरक्स विलायत से शिक्षा प्राप्त, पश्चिमी परिधान पसंद करने वाले और अपनी सोच में पूरी तरह से आधुनिक जिन्ना इतिहास में अकेले व्यक्ति हैं, जो एक बिल्कुल नया और धर्माधारित राष्ट्र-राज्य बनाने में कामयाब हुए? एक दौर में हिंदू-मुस्लिम एकता के हामी रहे जिन्ना अंतत: एक पृथक मुस्लिम राष्ट्र-राज्य के निर्माता बने।

पाकिस्तान के हालिया चुनावों में बरसों से जमे-जमाए दलों को किनारे करके सत्ता कब्जाने वाले इमरान खान के अंतर्विरोध उन्हें दक्षिण एशिया का एक नया जिन्ना बना सकते हैं। इमरान भी पश्चिम में पले-बढ़े हैं। एक दिलफेंक आशिक मिजाज नौजवान के रूप में उनके किस्से लोगों ने चटखारे लेकर पढ़े हैं। ऐन आम चुनाव के वक्त प्रकाशित उनकी दूसरी बीवी रेहम खान की आत्मकथा में उनके विवाहेत्तर संबंधों का जैसा नख-शिख वर्णन है,उसे पढ़कर तो शायद ही कोई कट्टरपंथी उन्हें माफ करेगा। लगभग दो दशक पहले एक अंग्रेज अमेरिकी औरत सीता व्हाहट ने इमरान के खिलाफ कैलिफोर्निया की अदालत से एक मुकदमा भी जीत लिया था, जिसके अनुसार उसकी बेटी के पिता वही थे। खुद रेहम के अनुसार, उनकी शादी के दो महीने बाद इमरान ने दुनिया को इसकी खबर होने दी थी।

इमरान के घोषित विचार तालिबान जैसे कट्टरपंथी संगठनों को लेकर भी अंतर्विरोधों से भरे रहे हैं। आम जानकारी है कि वह राजनीति में पाक सेना और मुख्य तौर पर पूर्व आईएसआई प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल हमीद गुल की निर्मिति हैं। हमीद गुल को तालिबान के गठन व शुरुआती दौर में अफगानिस्तान में उसकी सफलता का श्रेय जाता है। अपने गुरु की सीख और फौज की रणनीतिक जरूरतों के मुताबिक इमरान मुख्य धारा के बिरले नेता रहे, जो जेहादियों से सहानुभूति छिपाते नहीं थे। 2014 में जब नवाज शरीफ की सरकार ने तालिबान से वार्तालाप या मुजाकरात का दौर शुरू किया, तब तालिबान ने अपना प्रतिनिधित्व करने वालों की प्रस्तावित सूची में इमरान खान का नाम भी दिया था। यह अलग बात है कि दुनिया भर में प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं के डर से इमरान ने वह प्रस्ताव ठुकरा दिया। खैबर पख्तूनख्वा  सूबे में तो उनकी पार्टी की सरकार ने जेहादियों की मां कहलाने वाली संस्था मदरसा दारुल उलूम हक्कानिया को 275 मिलियन डॉलर की मदद अपने बजट से की है। इमरान पाकिस्तानी इलाकों में आतंकियों पर अमेरिकी ड्रोन हमलों के सबसे बड़े मुखालिफ रहे हैं। दिसंबर 2014 में पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुए आतंकी हमलों के बाद ही जेहादियों के समर्थन का उनका स्वर कुछ मद्धिम पड़ा। 

बतौर प्रधानमंत्री अपने पहले राष्ट्रीय प्रसारण में उन्होंने मध्यकालीन इस्लामी प्रतीकों का इतना ज्यादा प्रयोग किया कि पाकिस्तानी टीवी चैनलों के प्रसिद्ध इस्लामी टिप्पणीकार ओरिया मकबूल जान को भी मानना पड़ा कि इतना तो कोई मौलाना भी अपनी तकरीर में नहीं करेगा। इमरान ने हजरत मोहम्मद के जमाने के मदीना नगर राज्य की व्यवस्था पाकिस्तान में कायम करने का वादा किया है, पर कुछ महीने पत्नी की तरह रहकर उन्हें करीब से देखने वाली रेहम की मानें, तो इस्लाम के बारे में उनकी जानकारी या उसमें उनकी आस्था काफी हद तक संदिग्ध है। इस मामले में उनकी तुलना जिन्ना से की जा सकती है। इस्लाम का सहारा लेकर पाकिस्तान हासिल करने वाले भीतर से आधुनिक, मगर बाहर से मध्ययुगीन जिन्ना की दुविधा नए राष्ट्र के निर्माण के तीन दिन पहले 11 अगस्त, 1947 को ही सामने आ गई, जब उन्होंने नेशनल असेंबली में कहा कि अब पाकिस्तान में सभी पाकिस्तानी होंगे और राज्य, धर्म के आधार पर नागरिकों से भेदभाव नहीं करेगा, पर तब तक देर हो चुकी थी। बड़े खून-खराबे के बाद हुए विभाजन के बाद एक धर्माधारित राज्य में यह संभव ही नहीं था। 

इमरान के सामने भी यह चुनौती सत्ता संभालने के एक हफ्ते के भीतर आ चुकी है। दुनिया भर में अलग-थलग पड़ने का खतरा झेल रहे पाकिस्तान की उनकी सरकार ने जैसे ही भारत से बातचीत की पेशकश की, कट्टरपंथी टूट पड़े। आखिर वह भी तो नवाज शरीफ के भारत से संबंध सुधारने की कोशिशों का मोदी का यार है गद्दार है-गद्दार है  कहकर मजाक उड़ाते थे। इसी तरह, अमेरिका से संबंध सुधारने की उनकी कोशिश भी कट्टरपंथियों के गले नहीं उतरेगी। उनकी सरकार के सामने पहली ठोस चुनौती तहरीक लब्बैक पाकिस्तान की तरफ से आ भी गई है। उसके नेता खादिम हुसैन रिजवी ने मांग की है कि वह हजरत मोहम्मद के चित्रों की प्रस्तावित प्रदर्शनी को रोकने के लिए हॉलैंड सरकार को कहें और न मानने पर तीसरा विश्व युद्ध छेड़ दें या कम से कम उसके साथ सारे राजनयिक और वाणिज्यिक रिश्ते खत्म कर दें। ऐसा न करने पर उन्होंने 29 अगस्त को लाहौर से इस्लामाबाद तक मार्च की घोषणा भी कर दी है। रिजवी के पिछले मार्च का इस्तेमाल इमरान और उन्हें सत्ता में लाने वाली सेना ने नवाज सरकार को अस्थिर करने के लिए किया था। यह देखना दिलचस्प होगा कि इस भस्मासुर से वह अब खुद कैसे निपटते हैं?

मोहम्मद अली जिन्ना से अद्भुत समानताओं वाले इमरान खान को यह समझना होगा कि धार्मिक कट्टरता ऐसा शेर है, जिस पर सवारी करने को चढ़ा तो जा सकता है, मगर उतरते समय वह सवार को ही खा सकता है। संभवत: भारत को भी उनके अनुभव से कुछ सीखने का मौका मिलेगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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  • Web Title:Former IPS Officer Vibhuti Narayan Rai article in Hindustan on 28 august