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स्याह फैसले का सफेद पहलू

शशांक, पूर्व विदेश सचिव

अमेरिका में एच-4 वीजाधारकों को काम करने की अनुमति देने वाला प्रावधान अब खत्म किया जा रहा है। यह वीजा एच-1बी वीजाधारक के जीवनसाथी को दिया जाता है। यदि यह प्रस्ताव कांग्रेस (अमेरिकी संसद) में मंजूर हो जाता है, तो एच-1बी वीजाधारक की पत्नी या पति अमेरिका में काम नहीं कर सकेंगे। साफ है, यह फैसला भविष्य में अमेरिका जाने या अमेरिकी कंपनियों में काम करने का सपना पालने वाले भारतीयों को हतोत्साहित करने वाला है, जबकि एच-1बी वीजा के कोटे में पहले ही कटौती हो चुकी है। हालांकि अमेरिकी कंपनियां भी इसके असर से अछूती नहीं रहेंगी। फैसले से उन्हें भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में खासा धक्का लगने वाला है, इसीलिए वे भी इसका मुखर विरोध कर रही हैं। मगर उन्हें सफलता तभी मिलेगी, जब कांग्रेस में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट सांसद यह समझेंगे कि पुराने अधिनियम को खत्म करना अमेरिका की आर्थिक सेहत के लिए ठीक नहीं। इतना ही नहीं, अमेरिकी कंपनियों को अब एच-4 वीजाधारकों की जगह न सिर्फ नई नियुक्ति करनी होगी, बल्कि उन्हें उचित प्रशिक्षण भी देना पड़ेगा। जाहिर तौर पर इस काम में काफी समय लगेगा।

इस फैसले से एक और संदेश निकल रहा है। यह बताता है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप काफी जल्दी में हैं, इसलिए ताबड़तोड़ फैसले कर रहे हैं। साल 2020 में वहां राष्ट्रपति चुनाव होना तय है। ट्रंप संभवत: ऐसे फैसलों से चुनाव में सियासी फायदा उठाने की सोच रहे होंगे। 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में भी उन्होंने ‘अमेरिका को फिर से महान बनाने’ का भरोसा दिलाते हुए तमाम तरह के वायदे किए थे। यह अलग बात है कि उनमें से कई अब तक अधूरे हैं, और वह शायद उन्हें ही पूरा करने की जल्दबाजी में हैं।

अमेरिका को ऐसे फैसले इसलिए भी लेने पड़ रहे हैं, क्योंकि वहां का पारंपरिक उद्योग खत्म होता जा रहा है। ‘रस्ट बेल्ट’ यानी उन इलाकों का दायरा लगातार बढ़ रहा है, जहां उद्योग सिमट रहे हैं। रोजगार भी अब ज्यादातर पूर्वी व पश्चिम तटीय इलाकों में सीमित होते जा रहे हैं। संभवत: इसीलिए अमेरिकी मुखिया विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की खुली अर्थव्यवस्था वाली नीति से हटने की वकालत भी करते हैं। हालांकि संरक्षणवाद की ओर उनका इस कदर तेज कदम बढ़ाना दुनिया में ‘ट्रेड वार’ की शुरुआत भी करा सकता है।

ऊपरी तौर पर यह फैसला भले ही भारतीयों के खिलाफ दिखे, मगर मैं इसमें एक उम्मीद भी देख रहा हूं। मेरी नजर में भारतीय व अमेरिकी कंपनियां भारत के अंदर या उन देशों में, जहां ऐसा कोई प्रावधान न हो, मिलकर काम करें, तो दोनों को काफी फायदा हो सकता है। भारत में ‘मेक इन इंडिया’ या ‘स्किल डेवलपमेंट’ जैसे अभियान गति पकड़ सकते हैं। वहीं, दूसरे देशों में भी ऐसा कोई सिस्टम तैयार किया जा सकता है, जहां से अमेरिकी कंपनियों को कुशल हाथ मिल सकें और हमें रोजगार। ‘इंडो पैसिफिक रीजन’ (हिंद और प्रशांत महासागर का हिस्सा) या एशिया-अफ्रीका विकास गलियारा ऐसे ही क्षेत्र हैं। वैसे भी, चीन जिस तेजी से अपनी आर्थिक और सामरिक गतिविधियां आगे बढ़ा रहा है, उसके मद्देनजर भारत के लिए जरूरी है कि मित्र देशों के साथ मिलकर क्षेत्रीय संतुलन बनाए। 

अच्छी बात यह है कि हमारी सरकार ने इस दिशा में संस्थागत फ्रेमवर्क बना लिया है और राजनीतिक घोषणाएं भी कर रही है, लेकिन जमीन पर उतनी तेजी से काम होता नहीं दिख रहा। हालांकि हमारे पक्ष में एक बात यह भी है कि चीन अन्य देशों में जमीन आदि लीज पर लेकर काम करता है, लेकिन हम ऐसी नीतियों का पोषण नहीं करते। ऐसे में, हम एक ऐसा वैकल्पिक रास्ता तलाश सकते हैं, जिसमें मेजबान देशों के हितपोषण के साथ ही तकनीकी दक्ष हमारे नौजवानों को रोजगार भी मिलता रहे और यह संदेश भी जाए कि हम लोकतांत्रिक तरीके से एक पारदर्शी व्यवस्था के पैरोकार हैं। 

अमेरिकी प्रशासन के इस फैसले का असर भारत के साथ द्विपक्षीय रिश्तों पर भी पड़ सकता है। स्वाभाविक रूप से भारत सरकार पर जनता के इस सवाल का जवाब देने का दबाव बढ़ेगा कि अमेरिका के साथ ‘कूटनीतिक साझेदारी’ करने के बाद भी आखिर भारतीयों के साथ ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों उनकी नौकरियां छीनी जा रही हैं? अपने देश में हर वर्ष दो करोड़ आबादी देश की जनगणना का हिस्सा बनती है, पर दुर्भाग्य से रोजगार के आंकड़े आज भी सुखद नहीं हैं। इन दिनों यह मसला कुछ ज्यादा ही गरम है। अगले साल यहां भी आम चुनाव होने वाले हैं और विपक्ष बेरोजगारी के मुद्दे पर सरकार को घेरने का कोई अवसर नहीं छोड़ेगा। स्थानीय स्तर के साथ-साथ जब भारतीयों को विदेशों में भी काम नहीं मिलेगा, तो उनमें स्वाभाविक तौर पर गुस्सा पनपेगा। मौजूदा सरकार के लिए यह परेशानी का सबब बन सकता है। इसलिए हमारे हुक्मरानों को जल्द ही इस स्थिति से मुक्ति पाना होगा। वे चाहें, तो इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्रों में नौजवानों को काम देकर उन्हें संतुष्ट कर सकते हैं। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने यही नीति अपनाई थी। इस दिशा में तेजी से काम किए जाने की जरूरत है। इसके अलावा, अफगानिस्तान, म्यांमार, दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य पड़ोसी देश, ईरान आदि के साथ भी हमें अपने रिश्ते और मजबूत करने होंगे। तभी हम चीन से मिल रही चुनौतियों का सामना कर सकेंगे। 

क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) भी इस राह में हमारी मदद कर सकती है। आरसीईपी असल में आसियान के सभी 10 देशों और ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया व न्यूजीलैंड जैसे छह देशों के साथ होने वाला एक प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता है। अगर यह साकार हो जाता है, तो हम अमेरिका को भी मुक्त अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने और संरक्षणवाद को हतोत्साहित करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। कुल मिलाकर, राष्ट्रपति ट्रंप का ताजा फैसला अभी परेशान जरूर कर रहा है, पर यदि हम घर के भीतर और बाहर (पड़ोस में), दोनों जगह कुशल रणनीति बनाकर संजीदगी से काम करें, तो इसका लाभ भी उठा सकते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:former Foreign Secretary Shashank article in Hindustan on 27 April