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समझौते से बनती हमारी उम्मीदें

शशांक  पूर्व विदेश सचिव

साढ़े छह दशक के बाद यह पहला मौका था, जब उत्तर कोरिया और अमेरिका के शासनाध्यक्ष बातचीत की मेज पर थे। मंगलवार को सिंगापुर के सेंटोसा द्वीप पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग-उन की यह मुलाकात बता रही थी कि दोनों मुल्क 1950-53 की कोरियाई जंग से बहुत आगे निकल आए हैं। हालांकि बीते कुछ महीनों में ऐसे कई मौके भी आए, जब लगा कि दोनों के बीच तकरार चरम पर पहुंच गई है। एक-दूसरे को ‘देख लेने’ के स्तर तक बयानबाजी की गई, और बातचीत रद्द कर दिए जाने का बाकायदा ट्विटर से एलान कर दिया गया। मगर मंगलवार को दोनों नेताओं की गर्मजोशी यह संकेत दे रही थी कि बीते दिनों के तमाम ‘मतभेद’ संभवत: बातचीत की तैयारी के पहलू थे। 

यह मुलाकात उम्मीद से कहीं अधिक सफल रही है। इसकी सफलता इन दोनों नेताओं के लिए जरूरी थी। अमेरिका के लिए यह सिर्फ विदेश नीति का मसला नहीं था। इसकी सफलता उसकी घरेलू नीति से भी जुड़ी हुई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप परंपरा से हटकर चलने के हिमायती हैं। उनकी मंशा यही रही होगी कि जो उपलब्धि अमेरिका के किसी पूर्व राष्ट्रपति ने हासिल नहीं की, वह उनके खाते में आए। बैठक की विफलता उनकी घरेलू सियासत पर बुरा असर डालती। उनके लिए जरूरी था कि अगले चुनाव आने तक वह सफलता की सीढ़ी चढ़ते दिखाई दें। इसीलिए उन्होंने किम जोंग-उन को वार्ता की मेज तक लाने के लिए साम, दाम, दंड और भेद, तमाम तरीके आजमाए।

उत्तर कोरिया को भी इस समझौते की अहमियत पता थी। उसकी आशंका यह थी कि जिन-जिन देशों ने अमेरिका की मर्जी के खिलाफ अपने परमाणु व मिसाइल कार्यक्रम विकसित किए, उनको उसका मूल्य चुकाना पड़ा है। इसका एकमात्र अपवाद दक्षिण अफ्रीका है, जिसने अपने परमाणु जखीरे को स्वयं नष्ट कर दिया था। हालांकि यह भी सच है कि अगर उत्तर कोरिया पर अमेरिका कोई सैन्य कार्रवाई करता, तो बदले में उसे भी काफी नुकसान उठाना पड़ता। संभवत: दुनिया परमाणु युद्ध का गवाह बनती। मगर तब भी खलनायक प्योंगयांग ही साबित होता। उत्तर कोरिया एक छोटा मुल्क है और वहां सुविधाएं अपेक्षाकृत कम हैं। लोगों के पास खाने के लिए नहीं है। वहां से मानवाधिकार के उल्लंघन की भी खबरें आती रहती हैं। लिहाजा किम जोंग-उन भी समझ रहे होंगे कि सिर्फ परमाणु ऊर्जा और मिसाइल विकास कार्यक्रम के बूते वह अपने देश को बहुत दूर तक नहीं ले जा सकते। उन्हें एक खतरा दक्षिण कोरिया और अमेरिका की दोस्ती में भी दिखा होगा, जिनकी ताकत कोरियाई प्रायद्वीप में बढ़ रही है। ऐसे में, यदि वह कोई सख्त रुख अपनाते, तो संभव है कि उनके लिए स्थिति और प्रतिकूल हो जाती। मंगलवार को उन्हें सफलता का एकमात्र मौका दिखा होगा। 

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक समझौते की शर्तें बाहर नहीं आई थीं, पर जिस ‘कॉम्प्रिहेंसिव एग्रीमेंट’ की बात पत्रकार वार्ता में दोनों नेताओं ने की, उसमें उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु व मिसाइल कार्यक्रम को नियंत्रित करने की बात जरूर मानी होगी। यह किस हद तक हो सकेगा, इसका जवाब तो भविष्य के गर्भ में है। मगर यदि यह मौका छूट जाता, तो विश्व और खासकर एशिया में परमाणु-स्थिति बहुत नाजुक हो जाती। इस समझौते से विश्व बिरादरी ने जरूर राहत की सांस ली होगी। हालांकि जापान की चिंता अपनी जगह बनी रहेगी। उसकी परेशानी यह होगी कि यदि समझौते में उत्तर कोरिया ने सिर्फ अमेरिका को अपनी जद में लेने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों को नष्ट करने का भरोसा दिया होगा, तब भी उसके पास ऐसी मिसाइलें बची रहेंगी, जिनसे जापान को खतरा हो सकता है। इसीलिए उसने भी ऐसी किसी प्रक्रिया में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाने के प्रयास तेज कर दिए होंगे।

भारत ने जरूर इस समझौते में अपने लिए उम्मीदें देखी होंगी। मेरा मानना है कि उत्तर कोरिया का विश्व बिरादरी में शामिल होना दो तरह से नई दिल्ली के लिए फायदेमंद है। पहला यह कि उत्तर कोरिया अब कहीं अधिक भारत की फिक्र करेगा। दरअसल,  उत्तर कोरिया और पाकिस्तान की दोस्ती का मसला काफी पहले से उठता रहा है। कहा जाता है कि उत्तर कोरिया ने परमाणु तकनीक पाकिस्तान से ही हासिल की है, जबकि बदले में उसे मिसाइल तकनीक सौंपी। परमाणु व मिसाइल तकनीक के इस लेन-देन में चीन की भी सहमति रही है। उत्तर कोरिया की पाकिस्तान की करीबी हमारी सुरक्षा को नुकसान पहुंचा सकती है। अच्छी बात है कि पिछले दिनों जब विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह प्योंगयांग गए थे, तो वह इस भरोसे के साथ वापस लौटे कि भारत की सुरक्षा के साथ उत्तर कोरिया किसी तरह का कोई समझौता नहीं करेगा।
 
दूसरे हित आर्थिक हैं। उत्तर कोरिया और चीन की दोस्ती किसी से छिपी नहीं है। कई उत्तर कोरियाई नागरिक चीन की कंपनियों से जुड़े हैं और कामगार की भूमिका में हैं। चीन ने भी उत्तर कोरिया में मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट (विनिर्माण कारखाना) बना रखा है। ऐसे में, अगर उत्तर कोरिया पर से प्रतिबंध हटता है, तो वहां पर नए अवसर बढ़ेंगे। भारत इस मौके का फायदा उठा सकता है। नई दिल्ली जहां प्योंगयांग की मदद कृषि, आईटी और दवा निर्माण के क्षेत्र में कर सकती है, तो बदले में वहां के खनिज संसाधन भी पा सकती है। ऐसे संसाधन वहां भारी मात्रा में उपलब्ध हैं, जो अब तक चीन को मिलते रहे हैं। चूंकि बीजिंग से हमारी दोस्ती परवान चढ़ रही है, इसलिए भविष्य के लिए उत्तर कोरिया से भी उम्मीद जगती है। जापान के साथ भी हमारे रिश्ते आगे बढ़ सकते हैं।

भारत से बेहतर संबंध का महत्व उत्तर कोरिया भी समझ रहा होगा। इतिहास गवाह है कि जिन दिनों उत्तर और दक्षिण कोरिया के संबंध तनावपूर्ण थे, तब भारत ने उस विवाद को सुलझाने में मदद की थी। 1961 में जिस गुटनिरपेक्ष आंदोलन का जन्म हुआ है, उसका भी एक पहलू कोरियाई जंग था। साफ है, उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंध जैसे-जैसे खत्म होंगे, हमारे रिश्ते प्योंगयांग से मधुर होते जाएंगे, जिसका फायदा हमें खूब मिलेगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:former Foreign Secretary Shashank article in Hindustan on 13 june