Editorial opinion of Hindustan Hindi Newspaper by Sudeep Chakraborty 7th of October Edition Attempt to change the plot in Bengal - बंगाल में कथानक बदलने की कोशिश DA Image

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बंगाल में कथानक बदलने की कोशिश

senior journalist sudeep chakraborty

पश्चिम बंगाल में यह खतरा लंबे समय से है कि जब यहां आग सुलगती है, तो तेज भड़कती है। राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी का कुप्रभाव और प्रस्तावित नागरिकता संशोधन विधेयक फिलहाल ऐसी ही ज्वाला है, जो यहां सब कुछ जला सकती है। इसमें कोई शक नहीं कि साल 2021 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और तृणमूल कांग्रेस के बीच टकराव का एक बड़ा मैदान बनेगा। यह भी स्पष्ट है कि इस राजनीतिक जंग में एनआरसी और प्रस्तावित नागरिकता विधेयक प्रमुख हथियार साबित होंगे। प्रस्तावित विधेयक में बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आने वाले गैर-मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता हासिल करने का मौका दिया जा सकता है, जिसकी ओर बीती 1 अक्तूबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कोलकाता दौरे के दौरान उस वक्त इशारा किया, जब वह एक इनडोर स्टेडियम में हजारों श्रोताओं को संबोधित कर रहे थे।

जनवरी में लोकसभा चुनाव के प्रचार के सिलसिले में जब बतौर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह बंगाल आए थे, तब अपने संबोधन से उन्होंने हिंदू आबादी की भावनात्मक नस को छुआ था। उन्होंने बताया था कि कैसे भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने पर पश्चिम बंगाल से गायों की तस्करी बांग्लादेश नहीं हो पाएगी, हिंदू शरणार्थियों को भारत की नागरिकता हासिल होगी, और बांग्लादेशियों की सीमा-पार से घुसपैठ रुक जाएगी। मई में जब लोकसभा चुनाव के नतीजों की घोषणा हुई, तो स्थानीय ध्रुवीकरण की वजह से भाजपा को 42 में से 18 सीटें हासिल हुईं, जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को महज दो सीटें मिली थीं। तृणमूल कांग्रेस को भाजपा से चंद सीटें (22 सीटें) ही अधिक मिलीं और 2014 के चुनाव के मुकाबले उसे 12 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव में भी यही हवा बनाए रखना चाहती है, ताकि वह तृणमूल कांग्रेस को मात दे सके। उल्लेखनीय है कि 2016 के विधानसभा चुनाव में कुल 295 सीटों में से तृणमूल को 211 और भाजपा को सिर्फ तीन सीटें मिली थीं।

मगर असम की तरह यहां भी धार्मिक ताना-बाना एक संवेदनशील मसला है, खासतौर से जब उसमें अवैध मुस्लिम बांग्लादेशी प्रवासियों को जोड़ दिया जाता है। यह भावना बंगाल के डीएनए में सौ से अधिक वर्षों से है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए। संभवत: कुछ लोगों को यह भी याद होगा कि बंगाल एक बार नहीं, बल्कि दो-दो बार विभाजित हुआ है। बंगाल का पहला बंटवारा मजहबी वजहों से हुआ था। जुलाई 1905 में हिन्दुस्तान के तत्कालीन वायसराय और गवर्नर जनरल जॉर्ज नथानिएल कर्जन ने हस्ताक्षर करके इस बंटवारे की स्वीकृति दी थी। तब बंगाल का दो हिस्सा किया गया था- मुस्लिम बहुल पूर्वी बंगाल और हिंदू बहुल पश्चिम बंगाल। 16 अक्तूबर, 1905 से यह फैसला प्रभावी हो गया। मगर इसके साथ-साथ भविष्य के संघर्ष का खाका भी तैयार हो गया। दरअसल, कुछ वर्षों से ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ राष्ट्रवादियों की नाराजगी बढ़ती जा रही थी, पर साथ-साथ मुस्लिम कुलीन वर्ग के साथ कई शिक्षित बंगाली हिंदुओं (उभरते कुलीन वर्ग) का टकराव भी शुरू हो गया था।

मुस्लिम कुलीन वर्ग का नेतृत्व ढाका के नवाब ख्वाजा सलीमुल्लाह कर रहे थे, जो बंगाल की राजनीति- आर्थिकी में कलकत्ता के प्रभुत्व को कम करना चाहते थे। इसी कारण से नवाब ने खुलकर वायसराय कर्जन के बंटवारे के प्रस्ताव पर हामी भरी। सलीमुल्लाह की राय थी, ‘पूर्वी प्रांत के लोग कलकत्ता की दासता से मुक्त होकर अब राहत और अच्छा महसूस कर रहे हैं।’ बंटवारे को मुफीद बताते हुए उन्होंने यह भी दावा किया था कि ‘पश्चिम बंगाल के पिछलग्गू बनकर यहां के बच्चों (हिंदू और मुसलमान, दोनों) को जितनी तवज्जो मिलती, अब उससे अधिक उन्हें मिला करेगी’। साल 1908 में तत्कालीन बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर  एंड्रयू फ्रेजर के प्रकाशित प्रशासनिक दस्तावेज में लिखा गया है, ‘(बंगाली हिंंदुओं के) अति शिक्षित वर्ग   का मानना है कि प्रशासन पर मुसलमान अब कहीं ज्यादा असरकारी हो सकते हैं और उनकी नियुक्ति भी पर्याप्त संख्या में होगी।’  हालांकि एक सच यह भी है कि नवाब ने सभी मुसलमानों को राहत पहुंचाने की बजाय पूर्वी बंगाल के मुस्लिम कुलीन वर्ग के विशेषाधिकारों का खास ख्याल रखा, और कर्जन प्रशासन ने उन्हें यह रुख बनाए रखने के लिए काफी कर्ज भी दिया था।

कर्जन के खाके में, बिहार और उड़ीसा को पश्चिमी बंगाल में जोड़कर बंगाल प्रांत बनाया गया था, और विशाल असम प्रांत को प्रशासनिक तौर पर उत्तरी और पूर्वी बंगाल में शामिल करके पूर्वी बंगाल का गठन किया गया था। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि ऐसा करने से पूर्वी बंगाल में 1.8 करोड़ मुस्लिमों की तुलना में 1.2 करोड़ हिंदू अल्पसंख्यक हो गए और पश्चिमी प्रांत में बांग्ला बोलने वाले (1.7 करोड़ लोग) गैर-बांग्ला (3.7 करोड़ लोग) से कमतर हो गए। कर्जन ने अपने एक सहयोगी को लिखा कि बंगाल का विभाजन बंगालियों की ‘श्रेष्ठता-भावना को कम करेगा और  उनके इरादे को खत्म करेगा, इसीलिए वे इस बंटवारे का विरोध कर रहे हैं’। हालांकि जनाक्रोश के कारण 1911 में बंगाल को फिर से एक बना दिया गया, लेकिन इसके बाद भी सूबे का दूसरा बंटवारा टल नहीं सका। यह विभाजन 1947 में हुआ, और इस बार भी कारण धर्म ही बना। यह प्रकरण और इससे ठीक पहले के तनावपूर्ण वर्ष दरअसल भाजपा के प्रतीक पुरुष श्यामा प्रसाद मुखर्जी की चिंता और क्षमताओं को भी जाहिर करते हैं, लेकिन यह एक अलग विषय है।

Note: (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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