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25 जनवरी, 2020|7:41|IST

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इतने से नहीं रुकेगा जलवायु परिवर्तन

sopan joshi  science and environment journalist

हमारी दुनिया को तहस-नहस होने से रोकने के लिए दो सप्ताह से एक बैठक चल रही थी। जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के लिए संयुक्त राष्ट्र का सालाना सम्मेलन स्पेन की राजधानी मैड्रिड में शुक्रवार को पूरा हो गया। मगर इसकी चर्चा कम ही हो रही है। पर्यावरण के संकटों से हम ऐसे घिरते जा रहे हैं कि अब एक नए पंचांग की जरूरत है। इसमें ऋतुओं को फूल खिलने और सावन बरसने से नहीं जाना जाएगा। इसमें  सूखे-अकाल और लू-लपाटे का मौसम होगा (ग्रीष्म), बाढ़-जलभराव और डेंगू जैसे रोगों का समय होगा (वर्षा), दिवाली के पटाखे और पराली जलाने से होने वाले वाले धुएं का समय (शरद)। इसी कड़ी में हेमंत ऋतु को जलवायु परिवर्तन पर सालाना सम्मेलन के लिए जाना जा सकता है। अगर ऐसा कैलेंडर बनता भी है, तो उसमें जल्दी ही संशोधन करने पड़ेंगे। जलवायु परिवर्तन से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। इसका और बढ़ना तय है।

जब ऐसा होगा, तब मुंबई और बांग्लादेश जैसे निचले इलाकों में पानी भरेगा। बड़ी संख्या में पलायन भी होगा। ये लोग कहां जाएंगे? कौन सा नागरिकता कानून, कौन सी दीवार जान बचाने के लिए भागते इन लोगों को रोक पाएगी? कितने शरणार्थियों के लिए नजरबंदी कैंप बनेंगे? विज्ञान की दुनिया में अब कोई शक नहीं बचा है कि जलवायु परिवर्तन हो रहा है। इसका कारण है, औद्योगिक विकास के लिए जलाए गए कोयले और पेट्रोलियम का हवाई कार्बन कचरा। जलवायु के कार्बन द्वारा गरम होने की बात किसी न किसी रूप में विज्ञान को 150 साल से पता है। लेकिन हम अपने विकास के लिए खोद-खोदकर कोयला और पेट्रोलियम निकालकर जला रहे हैं इस गुमान में कि हमारे पास सभी समस्याओं के समाधान हैं। 

पृथ्वी के इतिहास में अनेकानेक प्रजातियों ने अपार सफलता पाई है और फिर अपनी सफलता के बोझ में दबकर वे विलुप्त भी हुई हैं। आज तक 99 प्रतिशत से ज्यादा प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं, ज्यादातर मनुष्य के प्रकट होने पहले ही। हमारे असीम विकास ने इस विलुप्ति की आग को बहुत तेज कर दिया है। जल्द ही इसकी आंच हम तक आएगी, जिसमें विज्ञान की दुनिया को कोई संशय नहीं है। यह तो निरा अंधविश्वास है कि हम सब जानते हैं और अपने आप को सदा-सदा बचा पाएंगे। विकास के जिस विनाश की ओर हम अधीरता से बढ़ रहे हैं, उसकी रोकथाम के लिए ही हर साल नवंबर-दिसंबर में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र का सम्मेलन होता है। इन अंतरराष्ट्रीय बैठकों में खूब चिंता जताई जाती है, दुनिया भर के नेता पृथ्वी को बचाने की बात करते हैं। फिर कूटनीतिज्ञ यह कहते हुए कुछ करने से बच निकलते हैं कि इसके लिए जरूरी बलिदान दूसरे देशों को देना चाहिए, वे तो सिर्फ विकास चाहते हैं। 

इस बार हल्ला जरा पहले ही हो गया। 23 सितंबर को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र ने शिखर वार्ता रखी थी। पाल वाली एक नौका में अंधमहासागर पार करके इसमें 16 साल की किशोरी ग्रेटा थनबर्ग भी पहुंची थीं। उनका चेहरा जलवायु परिवर्तन की रोकथाम का अभियान बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसमें 15 मिनट शरीक हुए और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा कि बातचीत का समय अब खत्म हो चुका है, अब काम का समय है। जिस सम्मेलन में सही में जलवायु परिवर्तन पर बातचीत होनी थी, सौदेबाजी और समझौते होने थे, उससे लोगों का ध्यान हट गया। हालांकि ग्रेटा थनबर्ग अभी मैड्रिड में हैं और उन्हें एक प्रसिद्ध पत्रिका ने साल का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्व माना है। इस सम्मेलन की हवा फुस्स होने का एक और कारण है- दो बार हुआ स्थानांतरण। पिछले साल ब्राजील के आग्रह से यह तय हुआ था कि 2019 की बैठक वहां होगी।

किंतु लगभग एक साल पहले वहां एक नए राष्ट्रपति चुने गए, जिनका नाम है जायर बोलसोनारो। यह नाम याद रखने लायक है, क्योंकि वह किसी भी तरह के पर्यावरण संरक्षण प्रयास के विरोधी हैं। उन्होंने सत्ता में आते ही सम्मेलन की मेजबानी में असमर्थता जताई। कहा, ब्राजील की अर्थव्यवस्था संकट में है। वह धन्ना सेठों का मार्ग प्रशस्त करने के लिए कुख्यात हैं, ताकि प्राकृतिक संसाधनों का उन्मुक्त दोहन हो सके। इसके बाद दक्षिण अमेरिकी देश चिली ने अपनी राजधानी सैंटियागो में इस सम्मेलन के आयोजन का बीड़ा उठाया। दो महीने पहले चिली में आर्थिक असमानता को लेकर एक व्यापक आंदोलन छिड़ गया। सरकार की नीतियों के विरोध में लाखों लोग सड़कों पर उतर आए। कुछ जगह हिंसा भी हुई। चिली की सरकार ने अक्तूबर में सम्मेलन की मेजबानी से इन्कार कर दिया।

दो महीने में जैसे-तैसे बैठक का जिम्मा स्पेन ने लिया। चूंकि हड़बड़ी में आयोजन हुआ, इसलिए इस सम्मेलन की जिस तरह सालाना चर्चा होती है, वैसी भी न हो सकी। आज मानव प्रजाति के सामने जलवायु परिवर्तन से बड़ा विषय कोई नहीं है। यह विषय इतना विराट है, इतना अमूर्त है कि सामान्य लोगों की समझ के परे है। यह सब इतना असहज है कि सहज भाषा में, बोलचाल के रूपकों में इसका वर्णन असंभव है। इसके लिए न तो हमारी भाषाओं में उपयोगी संदर्भ हैं और न ही हमारी कल्पना में। देखने-सुनने, इंद्रियों द्वारा सिर्फ मौसम का बोध हो सकता है। जलवायु इंद्रीय ज्ञान से परे है। उसका मतलब है, हमारे पूरे ग्रह पर पंचतत्व का आपसी संबंध। इसमें सभी निर्जीव चीजें भी शामिल हैं और कुल वनस्पति व प्राणी भी। हम सभी को मौसम समझ में आता है, जिसमें उतार-चढ़ाव होता ही रहता है।

जब दिल्ली का तापमान जाड़े में शून्य के पास और गरमी में 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, तब पृथ्वी के तापमान में आने वाले एक-डेढ़ डिग्री परिवर्तन हमें तुच्छ लगते हैं। जब वैज्ञानिक आगे दिख रहे खतरे बताते हैं, तब हमें उन पर विश्वास नहीं होता। लेकिन इस अभूतपूर्व चुनौती को समझने का प्रयास करने की बहुत जरूरत है। सिर्फ मनहूसियत या खतरे के भाव से नहीं। आज हमारी सफलता ने हमारा प्रभाव सारी पृथ्वी तक फैला दिया है। यही हमारा घर है। इसमें आ रहे बदलावों को समझना असल में अपने घर-परिवार को समझने का कर्म है। यह कठिन तो है, लेकिन करने लायक काम है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Editorial of Hindustan Hindi Newspaper 14th of December 2019 Edition by Science and Environment Journalist Sopan Joshi