DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

जहां दफन कर दी गई अतीत की तल्खी

हरजिंदर हेड-थॉट, हिन्दुस्तान

यह ऐसी जगह है, जिसकी चर्चा अब भारत और पाकिस्तान, दोनों में बहुत ज्यादा नहीं होती। हालांकि लाहौर के गुरुद्वारा शहीद गंज से दोनों ही मुल्क बहुत कुछ सीख सकते हैं। पाकिस्तान के सबसे पुराने शहर के नौलखा बाजार में बने इस गुरुद्वारे के पिछली लगभग ढाई सदी के इतिहास में ऐसा बहुत कुछ है, जो हमें बताता है कि अतीत के तल्ख विवादों से कैसे निपटा जाता है?
कहा जाता है कि पुराने लाहौर में, जहां यह गुरुद्वारा है, वहां कभी एक मस्जिद हुआ करती थी, जो शायद 1653 के आस-पास कभी बननी शुरू हुई थी। यह उस समय की बात है, जब मुल्क के बादशाह शाहजहां ने अपने शहजादे दारा शिकोह को सूबेदारी सौंपकर लाहौर भेजा था। इस मस्जिद को अब्दुल्ला खान ने बनवाया था, जो कभी दारा शिकोह के खानसामा थे, बाद में वह तरक्की पाते हुए शहर कोतवाल बन गए। दिल्ली दरबार के सत्ता-संघर्ष में जब दारा शिकोह के छोटे भाई औरंगजेब ने सबको परास्त कर दिया, तो कहानी बदल गई। यह वह दौर था, जब मुगलों और सिख फौजों में लंबी लड़ाई शुरू हो चुकी थी। कहते हैं, तब यही वह जगह थी, जहां सिखों को पकड़कर लाया और प्रताड़ित किया जाता था। सिख इतिहासकार बताते हैं कि यहां पर बड़ी संख्या में सिखों को लाकर मारा गया। कहते हैं, इस मस्जिद के सामने चौराहे पर सिखों के स्थानीय नेता भाई तारू सिंह को औरंगजेब के सूबेदार मीन मन्नू ने अपने सामने इतना प्रताड़ित करवाया कि उनकी जान चली गई। 
बाद में जब पंजाब में सिखों का शासनकाल शुरू हुआ, तो इस चौराहे का नामकरण शहीद तारू सिंह चौक कर दिया गया। जहां मस्जिद थी, उसी परिसर में गुरुद्वारा शहीद गंज बनाया गया। 1849 में महाराजा रणजीत सिंह के निधन के बाद जब पंजाब का शासन ब्रिटिश फौज के हाथ आ गया, तो चीजें एक बार फिर बदलने लगीं। 1850 में लाहौर निवासी नूर मोहम्मद खुद को मस्जिद का मुतवल्ली घोषित करते हुए इस पर कब्जे के लिए अदालत पहंुच गए, लेकिन अदालत उनके तकार्ें से सहमत नहीं हुई। 1883 तक उन्होंने कई अदालतों का दरवाजा कई बार खटखटाया, लेकिन हर बार उनकी अपील खारिज हो गई। इसके बाद के लंबे दौर तक गुरुद्वारा महंत हरनाम सिंह के संरक्षण में रहा। 
नई सदी आई, तो पंजाब में गुरुद्वारा सुधार आंदोलन शुरू हो गया। लंबे आंदोलन के बाद सिख गुरुद्वारा ऐक्ट बना और गुरुद्वारे का प्रबंधन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन समिति के पास आ गया। इस बीच 1935 में लाहौर जिला अदालत में उस जगह को मस्जिद घोषित करने के लिए एक और याचिका डाली गई, लेकिन इस बार भी अदालत ने कहा कि वहां यथास्थिति को बरकरार रखा जाना चाहिए। कहा जाता है कि इसके बाद गुरुद्वारा प्रबंधक समिति ने उस इमारत को गिराकर गुरुद्वारा बनाने का काम बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया। सिख इतिहास में इसके अलावा कोई दूसरा उदाहरण नहीं है, जब किसी धर्मस्थल को गिराकर गुरुद्वारा बनाया गया हो। दूसरी तरफ यह भी कहा गया कि इमारत एक तो जर्जर थी और दूसरे,  वह सिखों की धार्मिक प्रक्रियाओं के अनुकूल नहीं थी, इसलिए उसका पुनरोद्धार का काम किया जा रहा है। सच जो भी हो, शहर में खबर फैलते ही दंगा भड़क उठा। कई लोगों की जान गई और कफ्र्यू लगाना पड़ा। 
यह मामला 1940 में बंबई हाईकोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ के सामने फिर से रखा गया। फैसले में अदालत ने माना कि कभी वहां मस्जिद थी, लेकिन याचिकाकर्ता एक तो ऐसा कोई प्रमाण नहीं पेश कर पाए कि वहां कभी नमाज अता की जाती थी, दूसरे इस जगह का कब्जा सिख समुदाय के पास 171 साल से था, इसलिए यथास्थिति को बरकरार रखा गया।
जब पाकिस्तान बना, तो कुछ लोगों को लगा कि अब यह यथास्थिति बदल जाएगी। गुरुद्वारा शहीद गंज समेत पाकिस्तान के तमाम गैर इस्लामिक धर्मस्थलों के मामले इस नए बने इस्लामिक मुल्क में औकाफ विभाग के हवाले कर दिए गए। लेकिन यह विभाग भी स्थिति को नहीं बदल पाया। 1950 में इसके लिए लाहौर उच्च न्यायालय में एक याचिका इस उम्मीद से डाली गई कि इस बार इस्लामिक मुल्क की अदालत कुछ नया फैसला देगी। लेकिन याचिका फिर खारिज हो गई। भारत-पाकिस्तान के रिश्तों के उतार-चढ़ाव और दोनों देशों के बीच हुए युद्धों के बीच कई याचिकाएं आई और गईं, लेकिन हर बार अदालत इसी नतीजे पर पहुंची कि मौजूदा कानून बदलाव की इजाजत नहीं देते।
अयोध्या में बाबरी विध्वंस के दो साल बाद इस गुरुद्वारे के पुन:निर्माण की इजाजत मांगी गई। यह खबर आई, तो कुछ संगठनों ने इसका विरोध किया। धरना, जुलूस, प्रदर्शन जैसी चीजें शुरू हो गईं। दिलचस्प यह है कि नौलखा बाजार के स्थानीय दुकानदार, जो लगभग सभी मुसलमान थे, पुन:निर्माण के पक्ष में खड़े हो गए। बेशक उन्हें यह दिख रहा था कि अगर यहां काफी संख्या में तीर्थयात्री आते हैं, तो उनकी दुकानदारी चमकेगी। लेकिन उनके इस रवैये ने उन लोगों की दुकानदारी खत्म कर दी, जो इससे अपनी राजनीति चमकाना चाहते थे। आंदोलन भी धीरे-धीरे खत्म हो गया। लंबे समय तक टालने के बाद आखिर पाकिस्तान सरकार ने पुन:निर्माण की इजाजत दे दी और 2004 में गुरुद्वारा शहीद गंज की दो मंजिला सफेद इमारत बुलंद हो गई। यह उस दौर में हुआ, जब पाकिस्तान से गुरुद्वारों और मंदिरों पर कब्जा करने और उनकी इमारत गिराने की खबरें भी आती रहीं। आसिफ अली जरदारी जब राष्ट्रपति थे, तो उन्हें ऐसे सौ मंदिरों और गुरुद्वारों की सूची सौंपी गई थी, जिन पर कब्जा कर लिया गया। लेकिन गुरुद्वारा शहीद गंज के साथ इस दौरान भी कुछ नहीं हुआ। 
पाकिस्तानी अखबार डॉन  की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह गुरुद्वारा जिस इलाके में है, वहां लोहे का सामान बनाने की कई वर्कशॉप हैं। दिन में इन्हीं वर्कशॉप की ठक-ठक के बीच गुरुद्वारे का निशान साहिब लहराता रहता है और शाम को जब ठक-ठक बंद होती है, तो वहां गुरुद्वारे से गुरुवाणी के शब्द गूंजते हैं। गुरुद्वारा शहीद गंज सिर्फ एक गुरुद्वारा नहीं, एक स्मारक भी है, जहां अतीत की तल्खी को इतिहास में दफन कर दिया गया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:editorial hindustan column for 6 december