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नोटा : बौद्धिक विलासिता की उपज

विजय कुमार चौधरी

उच्चतम न्यायालय के तीन सदस्यीय पीठ ने 21 अगस्त को चुनाव आयोग द्वारा राज्यसभा चुनाव में नोटा (इनमें से कोई नहीं) विकल्प के प्रावधान की अधिसूचना को रद्द कर दिया। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के साथ एएम खानविलकर और वाई चंद्रचूड़ के पीठ ने कहा कि नोटा का विकल्प बौद्धिक रूप से आकर्षक दिखता है, पर गहन समीक्षा में यह धराशाई हो जाता है। यानी अब राज्यसभा चुनावों में नोटा का विकल्प नहीं रहेगा। इस फैसले ने नोटा विकल्प की उपयोगिता की तरफ एक बार फिर लोगों का ध्यान आकर्षित किया है।

उच्चतम न्यायालय में यह याचिका पिछले वर्ष अगस्त महीने में गुजरात के राज्यसभा चुनाव पर कांग्रेस के मुख्य सचेतक एसएम परमार ने दायर की थी और नोटा के विकल्प को खत्म करने का अनुरोध किया था। उनके वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि नोटा विकल्प का होना कोई वैधानिक अनिवार्यता नहीं है और इसका लागू रहना एक तरह से भ्रष्टाचार का नुस्खा ही निकालना होगा। उस समय भारतीय जनता पार्टी ने भी नोटा के विकल्प देने के विरुद्ध ही मत जाहिर किया था। पर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने नोटा के विकल्प पर रोक लगाने से इनकार करते हुए इस मामले को एक संवैधानिक प्रश्न के रूप में लिए जाने का निर्देश दिया था। इसी क्रम में तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई कर अपना फैसला सुनाया है।

वर्ष 2009 में चुनाव आयोग ने चुनावों में नोटा का विकल्प उपलब्ध कराने संबंधी अपनी मंशा से उच्चतम न्यायालय को अवगत कराया था। बाद में नागरिक अधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ ने भी नोटा के समर्थन में एक जनहित याचिका दायर की। जिस पर 27 सितम्बर, 2013 को न्यायालय ने मतदाताओं को नोटा का विकल्प देने का निर्णय किया था। हालांकि बाद में चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि नोटा के मत गिने तो जाएंगे पर इसे रद्द मतों की श्रेणी में रखा जाएगा। इस तरह से स्पष्ट ही था कि इसका चुनाव के नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। पिछले दिनों दिल्ली के साथ चार राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में पहली बार मतदाताओं को नोटा का विकल्प उपलब्ध हुआ। इसी के साथ दुनिया में भारत 14वां देश बन गया जहां मतदाताओं को नोटा के विकल्प उपलब्ध हैं।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले का चौंकाने वाला पहलू यह है कि न्यायालय ने राज्यसभा के चुनावों को अप्रत्यक्ष चुनाव मानते हुए इस विकल्प को खारिज कर दिया। परंतु इसने प्रत्यक्ष चुनावों के सिलसिले में इसे एक तरह से जायज ही करार दे दिया। यह समझ से परे है कि जिन तथ्यों के आधार पर अप्रत्यक्ष चुनाव में नोटा का उपयोग वांछनीय नहीं है तो प्रत्यक्ष चुनाव में इसे कैसे उचित माना जा सकता है? फैसले में यह भी कहा गया है कि प्रजातंत्र की ताकत नागरिकों के विश्वास पर आधारित है। इसकी नीव शुचिता, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा पर आधारित होती है, जिसे चुनावी प्रक्रिया के कारण दूषित होने से बचाया जाना चाहिए। फिर प्रत्यक्ष चुनाव में नोटा का विकल्प इस कसौटी पर कैसे खरा उतर सकता है?

नोटा के प्रावधान को लागू हुए लगभग पांच वर्ष हो चुके हैं और इसी बीच लोकसभा व कई विधानसभाओं के चुनाव हुए हैं। इन चुनावों में नोटा का विकल्प अधिक से अधिक मात्र दो प्रतिशत के लगभग मतदाताओं ने ही किया है। इस बीच तो नोटा के उपयोग के तरीके भी अलग-अलग ढंग से परिभाषित होने लगे हैं। एक जगह तो नोटा पार्टी ही बना ली गई है। स्पष्ट है कि नोटा का विकल्प किसी समस्या अथवा परिस्थिति का समाधान नहीं हो सकता। यह केवल विरोध और आक्रोश प्रदर्शित करने का एक हथियार मात्र बन सकता है। ऊपर से, चुनाव आयोग द्वारा इसे अवैध मतों की श्रेणी में रख देने से इसका कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है।

अगर नोटा विकल्प ही अधिकांश लोगों की पसंद बन जाय तो फिर उस चुनाव के नतीजे क्या होंगे? अधिकतर मतदाताओं द्वारा सभी उम्मीदवारों को नापसंद कर देने का परिणाम क्या होगा? आखिर में इन्हीं में से तो कोई अल्पमतों के आधार पर जीत ही जाएगा, भले ही उसकी जमानत ही क्यों न जब्त हो जाए। इस विकल्प का औचित्य क्या है? चुनाव का अर्थ ही चुनने की प्रक्रिया होती है। चुनाव से तात्पर्य तो किसी व्यक्ति के चयन से होता है। किसी एक या सभी उम्मीदवारों को खारिज कर देना तो चुनाव का लक्ष्य अथवा उद्देश्य ही नहीं हो सकता है। चुनावों में अगर मतदातागण उम्मीदवारों को चुनने के बजाय खारिज ही करते चले जाएंगे तो आखिर जनप्रतिनिधि चुने कैसे जाएंगे और यह प्रजातांत्रिक व्यवस्था चलेगी कैसे? चुनाव की प्रणाली या प्रक्रिया में कुछ दोष हो सकते हैं जिनके निदान या निवारण की आवश्यकता से इंकार नहीं किया जा सकता है लेकिन अगर दोषदर्शिता इस स्तर की हो जाय कि पूरी प्रणाली और व्यवस्था ही दूषित होने लगे अथवा अर्थहीन हो जाए तो इसका कोई मतलब ही नहीं बचेगा।

नोटा के समर्थक व्यक्ति या संगठन एक सकारात्मक अभियान चला सकते हैं जिसके तहत विभिन्न चुनावों से पहले उपयुक्त और योग्य उम्मीदवारों की पहचान कर उन्हें उम्मीदवार बनने के लिए प्रेरित किया जा सके। अगर चुनाव में नोटा समर्थकों की दृष्टि में योग्य उम्मीदवार खड़े होंगे तो फिर नोटा की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। इसके अलावा इन व्यक्तियों व संगठनों को सकारात्मक भूमिका निभाते हुए जिम्मेवार नागरिकों को चुनावी प्रक्रिया से पूरी सक्रियता से जोड़ने का अभियान चलाना चाहिए। यह किसी भी सूरत में नकारात्मक मानसिकता से उपजे नोटा के विकल्प का पक्ष लेने से बेहतर होगा। वैसे भी किसी सामाजिक या राजनीतिक प्रक्रिया को खारिज करके या उससे दूर रहकर उसे प्रभावित नहीं किया जा सकता है। अगर चुनावी प्रक्रिया की कमियों और बुराइयों को दूर करना है तो इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना होगा। इसलिए समाज के सभी जागरूक नागरिकों का यह फर्ज है कि चुनाव प्रक्रिया से अपने आप को पूर्ण रूप से जोड़े और समय के साथ इसमें उपजे हुए दूषणकारी तत्वों को दूर करने का प्रयास ईमानदारी से करें। अच्छे लोग राजनीतिक कार्यों में रुचि लेंगे और आगे बढ़ेंगे तभी तो राजनीति में शुचिता व ईमानदारी को बढ़ावा मिलेगा। वरना नोटा का विकल्प मात्र बौद्धिक विलासिता की उपज के रूप में ही निष्प्रभावी रह जाएगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 

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  • Web Title:editorial hindustan column for 29 august by Vijay Kumar Chaudhary