अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

अन्य पिछड़े वर्गों का वह नायक

Surinder Singh Jodhka

संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर को जिस तरह अनुसूचित जाति और जनजातियों को आरक्षण देने का श्रेय दिया जाता है, उसी तरह बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल ने ओबीसी यानी अन्य पिछड़े वर्ग को मान्यता देने का काम किया है। उन्हीं के नेतृत्व में साल 1979 में तत्कालीन मोरारजी देसाई सरकार ने एक आयोग का गठन किया था, जिसका उद्देश्य सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करना था। इस आयोग ने ओबीसी को पहचानकर उन्हें सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने की सिफारिश अपनी रिपोर्ट में की थी, जिसे विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने लागू किया। इसे लेकर देश भारी राजनीतिक उठापटक का गवाह बना था। 

यह बिल्कुल सही है कि सियासी गुणा-भाग करके मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू की गई थी, लेकिन बीपी मंडल ने जिस तरह से इसे तैयार किया, वह अपने आप में एक बड़ा काम था। इसमें तमाम जातियों के आंतरिक विभेद को पहचानने में कामयाबी मिली। हालांकि यह विभेद अब भी कायम है। आज भी सामाजिक नीतियों में जाति एक बड़ा मसला बना हुआ है। स्थानीय स्तर पर पहचान की राजनीति तेजी से मजबूत हो रही है। अन्य पिछड़ा वर्ग और जाति आधारित पदानुक्रम भी तेजी से बदल रहे हैं। यही वजह है कि संसद को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को सांविधानिक दर्जा देने की जरूरत पड़ी है। आयोग को मिला यह दर्जा सिर्फ नीति के स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सियासी महत्व भी है। 

बीपी मंडल ने जो मसले उठाए थे, उन पर आज फिर से गौर किया जाना जरूरी है। उन्होंने एक दृष्टि दी थी। मगर हुआ यह है कि पिछले कुछ वर्षों में आरक्षण पाने को लेकर एक अलग तरह का माहौल दिखने लगा है। ओबीसी आरक्षण के आस-पास नए तरह की सियासी लामबंदी हो रही है। लोगों को लगता है कि इसके सहारे सिस्टम में उनकी राजनीतिक और आर्थिक भागीदारी बढे़गी। इसे खासतौर से मध्यवर्गीय लोग हिकारत भरी नजरों से देखते हैं और इसकी आलोचना भी वे खूब करते हैं। मगर हमें यह आकलन भी करना चाहिए कि इससे देश में किस तरह की नागरिकता विकसित हो रही है? बिना पक्षपात के जब तक हम इस पर खुलकर बात नहीं करेंगे, बात आगे नहीं बढ़ेगी। इसके लिए हमें नए आंकड़ों की जरूरत होगी, हमें विशेषज्ञों के विश्लेषण भी चाहिए और वास्तविक जमीनी हकीकत का ब्योरा भी। मंडल आयोग के दौर में अन्य पिछड़ा वर्ग को लेकर जो सवाल उभरे थे, उसके हल के लिए यह जरूरी है कि  हर दस वर्ष या नियत समय पर हालात का आकलन हो। फिर यह तय किया जाए कि किसको आरक्षण चाहिए और किसे नहीं? मगर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ऐसा नहीं होने दे रही।

इसका एक सकारात्मक पहलू भी है। मंडल रिपोर्ट के लागू होने के बाद तंत्र में अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों की भागीदारी बढ़ी है, जिससे लोकतंत्र समृद्ध हो रहा है। जब तक प्रतिस्पद्र्धा का माहौल नहीं बनेगा, लोगों को बराबरी का मौका नहीं मिल सकता। मगर इसका स्याह पक्ष यह है कि देश पर जाति-व्यवस्था की पकड़ मजबूत हो रही है। कौम, प्रांत और बिरादरी के आधार पर हम इन लोगों को आर्थिक-राजनीतिक ढांचे से बाहर करने की कोशिश कर रहे हैं। इससे इनका विकास काफी प्रभावित होता है। आंबेडकर जिस भाईचारे की दुहाई देते रहे, वह आज तक कायम नहीं हो पाया। इसके उलट, कौम व जाति की पहचान और ज्यादा मजबूत हो गई है। नए भारत को बनाने के लिए ‘डेमोक्रेटिक सिटिजनशिप’ यानी लोकतांत्रिक नागरिकता पर आधारित भारतीयता की जरूरत है। लेकिन लोग अब जाति के आधार पर और अधिक बंटने लगे हैं। जो लोग जाति की जकड़न से बाहर आ गए थे, वे भी अब वापस उसी में लौटने लगे हैं। इससे समाज में भेदभाव बढ़ा है। एकता की भावना गायब होती जा रही है।

बीपी मंडल ने ओबीसी के लिए आरक्षण की सिफारिश जरूर की थी, पर उनका उद्देश्य इन जातियों में मौजूद पिछड़ेपन को दूर करना था। वह ‘डेमोक्रेटिक सिटिजनशिप’ के पक्ष में थे। मगर पिछले कुछ वर्षों से असमानता तेजी से सिर उठाने लगी है। इसे रोकने के लिए कुछ खास पहल करनी होगी। जैसे, हमें शिक्षा में ज्यादा निवेश करना होगा। विकसित या विकासशील देशों का पहला काम शिक्षा को बेहतर बनाना ही होता है। अगर सभी तबकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, तो फिर आरक्षण की कई व्यवस्थाएं खुद ध्वस्त हो जाएंगी। इसी तरह, आर्थिक तंत्र भी है। अगर हमारे नीति-नियंता यह सोच रहे होंगे कि इस मामले में निजी कंपनियां अपने तईं कुछ करेंगी, तो वे गलत हैं। ‘कॉरपोरेट इकोनॉमी’ यानी कॉरपोरेट दुनिया की अर्थव्यवस्था में ओबीसी की भागीदारी काफी कम है। अधिकारी वर्ग में तो उनकी संख्या उंगलियों पर गिनने लायक है। इस विषमता को दूर करना होगा, जिसके लिए हमारे नीति-नियंताओं को संजीदगी दिखानी होगी। 

बीपी मंडल ने असमानता झेल रहे वंचित समुदायों को आवाज देने की कोशिश की थी। लेकिन आज उस आवाज को बांट दिया गया है, क्योंकि निचले स्तर पर भी पहचान की राजनीति मजबूत हुई है। बेशक इससे एक हद तक वंचितों को कुछ फायदा पहुंचा है, पर एक सीमा से बाहर यह राजनीति खतरनाक भी है। ऐसी सियासत लोगों को बांटती है और उनमें तनाव बढ़ाती है। पहचान के अंदर उप-पहचान की प्रवृत्ति बढ़ाती है। इसी के चलते दलितों के अंदर महादलित की अवधारणा ने आकार लिया है। समावेशी विकास में सबको साथ लेकर चलने की जरूरत होती है। समाज के किसी भी तबके का कमजोर रहना हमारे विकास के मॉडल को खतरा पहुंचा सकता है। हमें एक समग्र नीति की दरकार है, फिर नियमित तौर पर इनके विकास का आकलन भी करना होगा। आयोग हर दस वर्ष में आंकड़े जारी करे और उसी आधार पर यह तय हो कि किसे कितने आरक्षण की जरूरत है? ओबीसी को समान धरातल पर लाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी ही होगी। पर क्या हमारे सियासतदां ऐसा कर पाएंगे?
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:editorial hindustan column for 25 august by Surinder Singh Jodhka