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चीन में दमन से अमन की रणनीति

देवाशीष चौधरी

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 17 जनवरी, 2017 को दावोस में विश्व आर्थिक मंच के सम्मेलन को संबोधित करते हुए उस वक्त के अंतरराष्ट्रीय हालात की व्याख्या चार्ल्स डिकेंस की प्रसिद्ध पंक्ति ‘यह सबसे अच्छा समय था, यह सबसे बुरा समय था’ के जरिए की थी। यह पंक्ति किसी खास दौर के विरोधाभासों का बयान करने के लिए उपयुक्त है। विडंबना है कि ह्यूमन राइट वाच की ताजा रिपोर्ट आने के बाद चीनी प्रांत झिंजियांग के बारे में भी यही कहा जा सकता है। रिपोर्ट बताती है कि झिंजियांग में चेन क्वांगुओ के पार्टी सचिव बनने के बाद से उइगर समुदाय इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है, जबकि दूसरी तरफ, सुरक्षा के तमाम बड़े ताम-झाम और अत्याधुनिक निगरानी प्रणाली संकेत देते हैं कि ‘ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट’ जैसी उइगर-ताकतें चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी हैं। ऐसे में झिंजियांग की सच्चाई को परखना जरूरी हो गया है।

5 जुलाई, 2009 के उरुमकी दंगों से पहले तक झिंजियांग में अलगाववादी हिंसा का कोई बड़ा निशान नहीं था। 1990 के दशक में हिंसा की छिटपुट घटनाएं जरूर हुई थीं, मगर झिंजियांग  2008 तक अमूमन शांत ही था। उसी वर्ष तिब्बत अशांत हुआ और ल्हासा में दंगे भड़के। 2013 और 2015 के बीच हिंसक घटनाओं में फिर से तेजी आई। मार्च 2016 में झिंजियांग के तत्कालीन पार्टी सचिव झांग चुंशियन ने दावा किया कि झिंजियांग में ‘हिंसक आतंकवाद’ में तेजी से कमी आई है और सरकार ने सुरक्षात्मक उपाय मजबूत किए हैं। मगर झांग की वहां से अचानक विदाई हो गई, जिसके बाद सवाल उठने लगे कि केंद्रीय नेतृत्व झिंजियांग पर आखिर कैसा शासन करना चाहता है और सख्त नीतियां अपनाकर सरकार क्या हासिल करना चाहती है?

2011 के शुरुआती महीनों में हुई कथित ‘जैस्मीन क्रांति’ के बाद झिंजियांग के सामाजिक प्रबंधन के लिए ऐसे कई संगठन बनाए गए, जिनका मकसद संदिग्ध तत्वों, धर्मगुरुओं, अपराधियों, अलगाववादियों और आतंकियों पर नजर रखना था। झिंजियांग और चीन के दूसरे हिस्सों में 2013-14 के दौरान हुई सिलसिलेवार हिंसक घटनाओं के बाद झिंजियांग सरकार ने इस क्षेत्र में सुरक्षात्मक हालात सुधारने के लिए कई कदम उठाए। केंद्रीय नेतृत्व ने उइगर अलगाववादियों के खिलाफ ‘जंग’ की घोषणा की और शी जिनपिंग ने इन्हें पकड़ने के लिए ‘तांबे और स्टील की दीवार बनाने’ और ‘जमीन से आसमान तक नेट’ लगाने के आदेश दिए। इस बीच, चेन क्वांगुओ ‘जातीय नीति के नए प्रवर्तक’ के रूप में चर्चित हो चुके थे। वह तिब्बतियों पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) का नियंत्रण मजबूत बनाने के नए तरीके ईजाद कर चुके  थे। तिब्बत में उनकी सफलता ही वजह थी कि उइगर अलगाववादियों का वास्तविक और काल्पनिक खतरा खत्म करने की जिम्मदारी उन्हें दी गई।

इसके बाद, केंद्रीय और क्षेत्रीय हुकूमतों ने कई ऐसे कानून बनाए, जिनके तहत उइगर की सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियां अपराध के दायरे में आ गईं। इनमें चीन का आतंकवाद निरोधी कानून (दिसंबर, 2015), झिंजियांग उइगर स्वायत्त क्षेत्र (एक्सयूएआर) का आतंकवाद निरोधी कानून (अगस्त, 2016) और एक्सयूएआर रेगुलेशन ऑन डी-रेडिकलाइजेशन (मार्च, 2017) उल्लेखनीय हैं। ये कानून स्थानीय प्रशासन को निगरानी और सेंसरशिप का असीमित अधिकार देते हैं। इन कानूनों के तहत उइगर विचारों और उनके कार्यक्रमों पर नजर तो रखी ही जाने लगी, नकाब व बुरका पहनने, दाढ़ी बढ़ाने, बच्चों के धर्म से जुड़े नाम रखने आदि को आपराधिक व्यवहार बताकर उन पर पुलिसिंग शुरू हो गई।
चेन ने झिंजियांग में ‘कनवीनियंस पुलिस स्टेशन’ की स्थापना की, ताकि सरकार अधिक से अधिक निगरानी और स्थानीय समुदायों पर नियंत्रण रख सके। इस स्टेशन के पास दंगा रोकने के अत्याधुनिक उपकरण भी हैं और आवाज व चेहरा पहचानने वाले सॉफ्टवेयर जैसी अत्याधुनिक निगरानी व्यवस्था भी। चेन प्रशासन ने ‘डबल लिंक्ड हाउसहोल्ड’ सिस्टम की भी शुरुआत की, जो एक-दूसरे के घर में ताक-झांक की अनुमति देता है। स्थानीय आंदोलनों को दबाने के लिए झिंजियांग अधिकारियों ने बड़ी संख्या में उइगरों के पासपोर्ट जब्त किए और विदेशों में पढ़ रहे ज्यादातर उइगर नौजवानों को वापस मुल्क लौटने का फरमान सुनाया। कहा जाता है कि इनमें से अनेक छात्रों को वापस लौटने के बाद हिरासत में लिया गया और फिर उनका पता नहीं चला।

झिंजियांग में उइगरों के संदिग्ध व्यवहारों पर नजर रखने वाला साइबर निगरानी तंत्र भी है। यह उइगरों द्वारा किए जाने वाले तमाम इंटरनेट कम्युनिकेशन इकट्ठे करता है। पर्सनल कम्युनिकेशन की निगरानी, स्मार्टफोन पर नजर, निजी गाड़ियों पर जीपीएस व रेडियो फ्रिक्वेंसी आइडेंटिटी टैग की अनिवार्यता भी आम कर दी गई है। पिछले साल से तो झिंजियांग पुलिस लोगों के डीएनए जमा करने की योजना पर भी खासी सक्रिय है। यहां 2017 की शुरुआत में ‘काउंटर-टेररिज्म ट्रेनिंग स्कूल’ और ‘एजुकेशन ऐंड ट्रांसफॉर्मेशन ट्रेनिंग सेंटर’ की स्थापना की गई, जहां हर उम्र के हजारों उइगर और अन्य मुस्लिम समुदायों को दोबारा पढ़ाई के लिए भेजा गया।

जिस ह्यूमन राइट वाच रिपोर्ट की आज चर्चा हो रही है, वह 58 लोगों के इंटरव्यू पर आधारित है। इनमें से पांच ऐसे हैं, जो इन शिक्षा शिविरों में कैद थे, जबकि 38 उन लोगों के परिजन हैं, जो अब भी इन शिविरों में बंद है। जातीय खांचे से देखें, तो इंटरव्यू देने वाले 32 कजाक थे, 23 उइगर, एक हुई और एक-एक उज्बेक व किर्गीज। वाच की रिपोर्ट यह भी बताती है कि नया दमनकारी शासन अब अन्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों के सामाजिक जीवन पर बंदिशें लगा रहा है।

केंद्रीय शासन के शुरुआती दौर के बाद, प्रशासन का उद्देश्य विभिन्न मुस्लिम समुदायों के बीच खाई बनाना था। और चूंकि 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में झिंजियांग में अलगाववादी हिंसा शुरू हो चुकी थी, इसीलिए सरकार ने बड़ी आसानी से उइगरों को ‘परेशानी पैदा करने वाले लोग’ साबित कर दिया। बावजूद इसके अब भी यह नहीं कहा जा सकता कि ‘धार्मिक चरमपंथी व हिंसक अतिवादी मानसिकता और वैचारिक बीमारी को दुरुस्त करने की’ चेन की रणनीति सही है, क्योंकि दमन की यह रणनीति ही झिंजियांग के विभिन्न मुस्लिम गुटों को एकजुट कर सकती है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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  • Web Title:editorial hindustan column for 12 september