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अच्छे मानसून में भी उदास हैं किसान

देविंदर शर्मा, कृषि विशेषज्ञ

समय से तीन दिन पहले मानसून केरल पहुंच चुका है। यह खबर खेती-किसानी के लिए ही अच्छी नहीं है, बल्कि अर्थव्यवस्था के तमाम क्षेत्रों का उत्साह व उम्मीद जगाने वाली भी है। इस साल मानसून सामान्य रहेगा। यानी यह लगातार तीसरा साल होगा, जब मानसूनी बारिश अच्छी बरसेगी। हमारी खेती करीब-करीब मानसून पर टिकी है। ऐसे में, अगर फसल अच्छी होती है, तो एक अच्छी आर्थिकी की नींव तैयार होगी। दिवंगत चतुरानन मिश्र बतौर कृषि मंत्री संभवत: इसीलिए मानसून को ‘वास्तविक कृषि मंत्री’ कहते थे।

लगातार दो साल 2014 और 2015 में सूखा झेलने के बाद मानसून देश के ज्यादातर हिस्सों पर उदार रहा है। यह कृषि के लिए शुभ संकेत है, क्योंकि 60 फीसदी खेती योग्य भूमि मानसूनी बारिश पर निर्भर है। सामान्य बारिश होने से सिंचाई के इलाकों में डीजल और बिजली पर निर्भरता कम हो जाती है, जिससे किसानों की लागत घट जाती है। इसके अलावा, सामान्य मानसूनी बारिश पेयजल की भारी कमी से जूझ रहे उत्तर व मध्य भारत की सूखी जमीन के लिए भी राहत लेकर आती है। यहां 91 प्रमुख जलाशयों की जल भंडारण क्षमता बढ़ जाने से सिंचाई और पेयजल की निरंतर आपूर्ति में काफी मदद मिलती है।

यह सही है कि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने ‘सामान्य वर्षा’ की भविष्यवाणी की है, जिसका अर्थ है कि इस बार दीर्घकालिक औसत की 97 फीसदी बारिश होगी। मगर इसमें एक पेच है। आशंका यह भी है कि इस वर्ष 44 फीसदी कम या सामान्य से कमतर बूंदें गिर सकती हैं। ‘सामान्य वर्षा’ की भविष्यवाणी निश्चय ही अर्थव्यवस्था को सुखद एहसास दे रही है, पर बारिश में औसत कमी का देश के बड़े हिस्से पर असर पड़ सकता है। पिछले साल भी ‘सामान्य बारिश’ की भविष्यवाणी की गई थी, लेकिन कम से कम 40 फीसदी जिलों में अपेक्षाकृत कम बरसात हुई। जैसे, महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्रों में क्रमश: 32 और 28 फीसदी कम बूंदें बरसीं। गुजरात के सौराष्ट्र व कच्छ, बिहार के कुछ हिस्से, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में भी पिछले साल कम बारिश हुई थी।

हालांकि देश के कुछ हिस्सों में कम बारिश के बाद भी 2017-18 में 27.95 करोड़ टन अनाज के रिकॉर्ड उत्पादन की उम्मीद है। इसमें चावल-उत्पादन में वृद्धि का काफी बड़ा योगदान है। इसकी खेती भी मानसूनी बारिश की तीव्रता और प्रसार पर निर्भर करती है। अनुमान है कि इस साल देश भर में 11.15 करोड़ टन चावल की पैदावार हुई है, जबकि 2016-17 में यह उपज 10.97 करोड़ टन थी। अच्छे मानसून के कारण दालों का भी रिकॉर्ड 2.45 करोड़ टन उत्पादन हुआ है। हालांकि इसके कारण किसानों की आमदनी में कमी भी आई है।

साल-दर-साल रिकॉर्ड उपज से निश्चय ही खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और खाद्य महंगाई दर को काबू करने में मदद मिलती है, मगर त्रासदी यह है कि देश में चाहे सामान्य मानसून रहे या सूखे की स्थिति, किसानों की दशा बदस्तूर खस्ताहाल ही बनी रहती है। पिछले 20 वर्षों का ही आकलन करें, तो ज्यादातर साल सामान्य मानसून रहने के बाद भी किसानों की आमदनी लगातार कम हुई है। साफ है कि मानसून अच्छा हो या खराब, किसानों पर घिरे संकट के अंधेरे बादल नहीं छंटने जा रहे। नीति आयोग का अध्ययन भी बताता है कि 2011-12 और 2015-16 के दरम्यान किसानों की वास्तविक औसत आमदनी हर साल आधा फीसदी से भी कम यानी 0.44 प्रतिशत बढ़ी है। इन पांच वर्षों में 2014 और 2015 ही सूखे के वर्ष थे, जबकि बाकी के तीनों साल लगभग सामान्य बारिश के गवाह रहे। इसीलिए यह सवाल पूछा ही जाना चाहिए कि जब सामान्य मानसून बाकी अर्थव्यवस्था में उत्साह बढ़ाने का काम करता है, तो घोर बदहाली में जी रहे किसानों को किसी तरह की राहत देने में यह विफल क्यों रहता है? 
साल 2016 और 2017 में भी अच्छे मानसून होने और रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन के बावजूद किसानों की आर्थिक दशा काफी प्रभावित हुई थी। देश के कई हिस्सों में हमने उन्हें टमाटर, आलू, प्याज और लहसून सड़कों पर मजबूरन फेंकते हुए देखा था। दाल का ही उदाहरण लें। इसकी उपज में वृद्धि होने के कारण मंडियों में किसानों के हाथों में कम पैसे आए। दालों की कीमतें औसतन 20 से 45 फीसदी गिरने का आकलन कई अध्ययनों में किया गया है। जबकि 2014 और 2015 में सूखे के दौरान भी किसानों के लिए कई फसलों का कृषि मूल्य लाभदायक रहा था। यह भ्रमित कर देने वाला तथ्य है, जो साफ-साफ सकल खाद्य कुप्रबंधन की ओर इशारा कर रहा है। दुर्भाग्य से यह कुप्रबंधन आज भी बना हुआ है।

विडंबना दूसरी यह है कि सामान्य मानसून वाले वर्ष को हमेशा आर्थिक विकास के एक सहारे से अधिक नहीं देखा जाता। एक अच्छा मानसून निश्चय ही किसानों के उस दर्द को कम करता है, जो सूखे में उन्होंने भुगता था, मगर उद्योग जगत को सामान्य मानसून से जैसी उछाल मिलती है, वैसी कृषि में कभी नहीं देखी गई है। अन्यथा मुझे कोई कारण नहीं दिखता कि देश के 17 राज्यों के कृषि परिवार की औसत आय महज 20 हजार रुपये सालाना हो। जबकि आबादी के लिहाज से ये परिवार देश की लगभग आधी जनसख्या हैं। यह स्थिति साफ-साफ बता रही है कि नीतिगत स्तर पर हम सूखे से जूझ रहे हैं। नीतियों का यह सूखा इतना जबर्दस्त है कि अच्छा मानसून भी किसानों की आय बढ़ाने में सफल नहीं हो पा रहा। इसके लिए किसान कतई दोषी नहीं हैं। वे तो पैदावार बढ़ाने के लिए जी-जान लगा देते हैं। दरअसल, यह अक्षमता हमारे नीति-निर्माताओं की है, जो मुश्किलों में घिरे खेतिहर समुदाय के चेहरे पर हंसी लाने में अब तक नाकाम रहे हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Devinder Sharma article in Hindustan on 31 may