DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

नई रणनीति, नई सोच की जरूरत

अफसर करीम, रक्षा विशेषज्ञ

घाटी इन दिनों सीमा पार गोलीबारी या फिर आतंकी हमलों से हलकान है। हर दो-तीन दिनों पर कहीं-न-कहीं कोई घटना घट रही है। लगता है, पाकिस्तान का मनोबल काफी बढ़ गया है। ऐसा मुमकिन भी है, क्योंकि इस साल अकेले जनवरी में उसने हमें जितना नुकसान पहुंचाया है, उतना 2017 पूरे वर्ष में हुआ था। मंगलवार को ही महाराजा हरि सिंह अस्पताल पर गोलीबारी करके लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी अपने एक साथी को भगाने में सफल रहे, जबकि यह इलाका श्रीनगर के मध्य में है। अगर ऐेसी जगहों पर वारदात करके भी आतंकी भागने में सफल हो रहे हैं, तो साफ है कि हम रणनीतिक चूक कर रहे हैं। 

श्रीनगर में अस्पताल पर हुआ हमला बताता है कि हमारी सुरक्षा व खुफिया एजेंसी किस कदर विफल रही है। लश्कर के लड़ाके अपने इरादे में न सिर्फ सफल रहे, बल्कि हमें यह भनक तक नहीं मिली कि वे किधर भागे? इससे यह भी पता चलता है कि स्थानीय लोग हमें उनके बारे में खबर देने को तैयार नहीं हैं। हम चाहें, तो इसकी वजह उनका डर बता सकते हैं, पर एक कारण यह भी हो सकता है कि वो हमसे नाराज हों। यह स्थिति फौज या सुरक्षा बलों के लिए ठीक नहीं है। 

यह तस्वीर तभी बदलेगी, जब ईमानदर राजनीतिक प्रयास होंगे। केंद्र व राज्य सरकार को मिलकर पहल करनी चाहिए, ताकि लोगों को कुछ राहत मिल सके और वे हमारे साथ खड़े हो सकें। दुखद है कि ऐसा कुछ होते नहीं दिख रहा। अलबत्ता सर्जिकल स्ट्राइक की धमकी दी जा रही है। शब्दों से पाकिस्तान को डराने की कोशिश हो रही है। इससे उसकी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। सीमा पर जवाबी फायरिंग भी उसे ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा सकती। 
तो फिर समाधान क्या हो? मेरा मानना है कि जब तक पाकिस्तान के उन ठिकानों को नष्ट नहीं किया जाएगा, जो आतंकियों के पनाहगाह हैं, तब तक हमारे ऊपर सीमा पार हमले होते रहेंगे। हमारे हुक्मरानों को यह समझना होगा कि कश्मीर को लेकर रक्षात्मक नीति कामयाब नहीं रही है। यह सही है कि हम घाटी में दाखिल होने वाले आतंकियों का सफाया कर रहे हैं, पर यह हमारे लिए ज्यादा फायदेमंद नहीं। अगर वे हमारी सीमा में घुसकर हमारे लोगों या फौजी-जवानों को मार दें और फिर            हम उनका सफाया करें, तो इसमें हमारा नुकसान ही ज्यादा है। 

यही बात सीमा पार से होने वाली गोलीबारी के बारे में भी कही जा सकती है। वे हमारे सैनिकों को मारते हैं और हम उनके। इस सिलसिले का कोई नतीजा नहीं निकलने वाला, क्योंकि जो हथियार हमारे पास है, वह उनके पास भी है। इसलिए जब तक हम कोई ऐसा ‘हथियार’ इस्तेमाल नहीं करेंगे, जिसका जवाब उसके पास न हो, तब तक हम प्रभाव नहीं छोड़ पाएंगे। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित ट्रैनिंग कैंप को नष्ट करना ऐसी ही एक कार्रवाई हो सकती है, जिस दिशा में हमारी सरकार को सोचना चाहिए। पाकिस्तान के खिलाफ नई रणनीति बनाना वक्त की जरूरत है।

जैसे ही पाकिस्तान के घर में घुसकर मारने की कार्रवाई शुरू होगी, उसका पूरा अमला इसके बचाव में जुट जाएगा। अभी वह इसलिए हमसे ज्यादा खौफ नहीं खा रहा, क्योंकि उसे पता है कि सीमा पर बाड़ेबंदी तक ही हमारी फौज जा सकती है। इसी रक्षात्मक नीति को बदलने का मैं हिमायती हूं। एक या दो दफा सर्जिकल स्ट्राइस करना बेअसर होगा, यदि हम लगातार पाकिस्तान पर दबाव न बनाएं। इसका सुबूत सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भी पाकिस्तानी हमलों का न रुकना है। यह स्थिति बदलनी चाहिए, और ऐसा तभी होगा, जब पाकिस्तान को दुरुस्त किया जाएगा। कश्मीर की लड़ाई कश्मीरियों के साथ नहीं, पाकिस्तान के साथ है, लिहाजा हमें पहले उस पर कार्रवाई करनी चाहिए। पाकिस्तान के शिथिल होते ही कश्मीर की आग खुद बुझ जाएगी।

मुझे यहां 1971 का वह माहौल याद आ रहा है, जब मैं घाटी में बतौर लेफ्टिनेंट कर्नर तैनात हुआ था। उस समय हमने पाकिस्तान को जंग में हराया था। वह लड़ाई बांग्लादेश के अस्तित्व को लेकर हुई थी, जिसमें पाकिस्तानी फौज को हमारे सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा था। उस जंग के बाद कश्मीर का मिजाज बिल्कुल बदला हुआ था। वहां हमने देखा कि कश्मीर के लोग हमारे साथ खुलकर मिल रहे थे और हमारा तहे दिल से स्वागत कर रहे थे। उन्हें पता था कि पाकिस्तान उन्हें उकसाने की स्थिति में नहीं है। नियंत्रण रेखा पर भी पाकिस्तानी फौज की बंदूकें खामोश थीं।

तब आलम यह हुआ करता था कि अगर पाकिस्तानी जवान सीमा की ओर बढ़ते भी, तो पूछने पर यही कहा करते कि वे भारत की तरफ नहीं बढ़ रहे, बस पेट्रोलिंग कर रहे हैं। साफ था कि वे इसलिए शांत थे, क्योंकि जंग में मात खाने की वजह से उनका मनोबल जमींदोज था। इसीलिए आज भी जब तक हम बड़ी कामयाबी हासिल नहीं करेंगे, तब तक न तो पड़ोस शांत होगा और न वह घाटी के लोगों को हमारे साथ निडर होकर रहने देगा।

आज के हालात खुद हमारे पैदा किए हुए हैं। 1980 के आसपास पाकिस्तान ने छद्म युद्ध की तैयारी शुरू कर दी थी और 1988-89 में उसने कार्रवाई शुरू भी कर दी। मगर हम बस रक्षात्मक मुद्रा में उन कार्रवाइयों से बचने की कोशिश करते रहे। कभी उसके खिलाफ आक्रामक रवैया नहीं अपनाया। 

अब भी ज्यादा देर नहीं हुई है। हमें बातचीत कम और ‘एक्शन’ (कार्रवाई) ज्यादा करना चाहिए। पाकिस्तान पर दबाव बनाना जरूरी है। इसके लिए हमें नया एक्शन प्लान अपनाना होगा। केंद्र व राज्य सरकार के अलावा केंद्रीय व राज्य के सुरक्षा बलों को भी इस योजना में शामिल किया जाना चाहिए। सियासत के संकीर्ण चश्मे से कश्मीर समस्या को देखना व्यर्थ है। सवाल किसी एक पार्टी का नहीं, बल्कि देश की गरिमा व सम्मान का है। हमें अपना घर सुधारना है और पाकिस्तान का दखल भी रोकना है। इसके कई तरीके हो सकते हैं। बस हमारे नीति-नियंताओं को मिल-जुलकर काम करना होगा। कश्मीर समस्या का समाधान जरूर निकलेगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:afshar Kareem article in Hindustan on 08 february